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मुंबई में नई राजनीतिक दरारें दिखाती 'सफेद पट्टी'

यह साफ है कि जो भी चीज़ सामाजिक एकता को तोड़ती है, करीबी लोगों को फायदा पहुंचाने वाले पूंजीवाद (क्रोनी कैपटिलिज्म) को बढ़ावा देती है या सांप्रदायिक बंटवारे का फायदा उठाती है, वह एक ऐसा बारूद का ढेर बनाती है जो पूरे घर को जलाकर राख कर सकता है

मुंबई में नई राजनीतिक दरारें दिखाती सफेद पट्टी
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यह साफ है कि जो भी चीज़ सामाजिक एकता को तोड़ती है, करीबी लोगों को फायदा पहुंचाने वाले पूंजीवाद (क्रोनी कैपटिलिज्म) को बढ़ावा देती है या सांप्रदायिक बंटवारे का फायदा उठाती है, वह एक ऐसा बारूद का ढेर बनाती है जो पूरे घर को जलाकर राख कर सकता है। इसका समाधान बहुत सीधा है- अहिंसा के रास्ते पर लौटना और महात्मा गांधी व उनके सत्याग्रह के सिद्धांतों का समर्थन करना।

मुंबई में एक अजीब और अभूतपूर्व विवाद सामने आया है जिसमें सांप्रदायिक और भाषाई मतभेद शामिल हैं। ये मतभेद समुदायों को बांट रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि जब धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों से समझौता किया जाता है और राजनीतिक फायदे के लिए नफ़रत फैलाई जाती है तो क्या हो सकता है। हो सकता है कि 'वे' बनाम 'हम' का बंटवारा, जो बहुसंख्यकवादी राष्ट्रीय राजनीति का मुख्य हिस्सा बन गया है, उसने किसी खास समूह या समुदाय को निशाना बनाया हो लेकिन इन विभाजनों को बढ़ावा देने वाली नफरत ऐसी जगहों पर भी आग भड़का सकती है जो हैरान और स्तब्ध कर देने वाली हों।

इस बार यह बंटवारा जैन समुदाय के कुछ सदस्यों और मुंबई के स्थानीय निवासियों के समूहों के बीच एक भद्दे विवाद का रूप ले चुका है। स्थानीय लोग जैन धर्म की कुछ ऐसी परंपराओं और रीति-रिवाजों और विभिन्न पहलुओं की शिकायत कर रहे हैं जो सार्वजनिक जगहों की पवित्रता का उल्लंघन करते हैं और जैन धर्म को सचमुच सड़कों पर ले आते हैं। इन घटनाओं से जैन समुदाय आहत हुआ और हैरानी की बात है कि उसने बहुत तेज़ी से अपना आक्रामक रुख दिखाया है। इस प्रतिक्रिया से अहिंसा के कड़ाई से पालन करने के जैन धर्मावलंबियों के लंबे समय से चले आ रहे और प्रशंसित सैद्धांतिक रुख को झटका लगा है। यह बात सब जानते हैं कि महात्मा गांधी की विश्व-प्रशंसित अहिंसा और सत्याग्रह की विचारधारा, जैन धर्म के अत्यधिक और कठोर अहिंसा के आदर्शों से प्रेरित थी।

विवाद तब शुरू हुआ जब मुंबई की एक रिहायशी कॉलोनी में कु छ जैन अनुयायियों ने एक स$फेद पट्टी बनाई ताकि जैन मुनि इमारत में आने के लिए उस रास्ते पर चल सकें। सफ़ेद ऑयल पेंट से रंगी पट्टी पर काई या शैवाल नहीं उगते जिससे जैन साधु और साध्वियां बिना किसी जीव को नुकसान पहुंचाए और अहिंसा के अपने कड़े नियमों का पालन करते हुए चल सकते हैं। जैन तपस्वी आमतौर पर नंगे पैर चलते हैं और सफ़ेद पट्टी रास्ते को ठंडा भी रखती है। समस्या यह है कि दूसरे गैर-जैन सदस्यों से पूछे बिना इमारत के परिसर में यह पट्टी बनायी गयी थी। इस बात से नाराज़ सदस्य मांग कर रहे हैं कि जैन समुदाय की इस मनमानी को हाउसिंग सोसाइटी में मंज़ूरी नहीं मिलनी चाहिए। एक प्रदर्शनकारी ने पूछा कि क्या उसके लिए केसरिया रंग की पट्टियां बनाना और किसी दूसरे समुदाय के लिए परिसर को हरे रंग से रंगना ठीक होगा? इस तरह उन्होंने विवाद को ऐसे साफ़ शब्दों में पेश किया जिससे पता चलता है कि कुछ समय पहले तक अच्छे माने वाले रिश्तों में कितना गुस्सा और कड़वाहट घुल गई है।

सफ़ेद पट्टियां बनाने का यह विवाद उत्तर-पूर्वी उपनगरों (घाटकोपर) से शुरू हुआ और तेज़ी से उत्तर-मध्य और दक्षिण मुंबई के इलाकों में फैल गया। इसके साथ ही जैन समुदाय और उनके रीति-रिवाजों के खिलाफ़ कई अन्य शिकायतें भी जुड़ गईं। यह विवाद और भी गरमा गया है क्योंकि जैन समुदाय ने न तो हार मानी है और न ही माफ़ी मांगी है। असल में, वीडियो में पारंपरिक सफ़ेद कपड़े पहने एक वरिष्ठ जैन व्यक्ति को बदतमीजी करते और स्थानीय महाराष्ट्रीयन प्रदर्शनकारियों से आवाज़ धीमी करने के लिए कहते हुए देखा गया है। एक और भी बुरी बात तब हुई जब हिंदुत्व समर्थक माने जाने वाले एक जैन साधु ने प्रदर्शनकारियों से कहा कि वे जैनों के बजाय दूसरे प्रमुख अल्पसंख्यक समुदायों से लड़ें। इस तरह उन्होंने नई सांप्रदायिक नफ़रत फैलाई और उन अल्पसंख्यक समूहों को निशाना बनाया जो इस विवाद में शामिल ही नहीं थे। स्थानीय प्रदर्शनकारियों को साधु की दी गई इस चेतावनी के साथ यह वीडियो समाप्त होता है कि, 'हमने चूड़ियां नहीं पहनी हैं।' इसका मोटा-मोटा मतलब है, 'हम भी लड़ सकते हैं'। इस बात ने उस साधु द्वारा अहिंसा की बात करने के बावजूद उनके भीतर छिपी हिंसा को उजागर कर दिया।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह विवाद एक साधारण सी मांग से शुरू हुआ। जैसा कि लोकतांत्रिक समाज में होता है कि रिहायशी कॉलोनियों के कॉमन एरिया में किसी भी बदलाव के लिए एक तय प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इस मामले में विरोध करने वाले स्थानीय लोगों की बात सही है। जैन समुदाय की शुरुआती आक्रामक प्रतिक्रिया ने जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को चुनौती दी है जो मानते हैं कि अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म और परम कर्तव्य है (अहिंसा परमो धर्म:)। इस बारे में चक्रवर्ती राम-प्रसाद का कहना है कि जैन धर्म के संस्थापक महावीर की महान सोच यह थी कि सच्चाई के 'कई पहलू' होते हैं और इसे कई तरह से समझा जा सकता है जिन्हें हम हमेशा एक-दूसरे से नहीं जोड़ सकते।

जैन समुदाय छोटा लेकिन बहुत प्रभावशाली है। इनमें से कई लोग गुजराती या मारवाड़ी बोलते हैं और एक बड़ा हिस्सा बड़े और सफल व्यवसायों से जुड़ा है। वैश्विक स्तर पर सामाजिक मुद्दों, राजनीति, धर्म और जनसांख्यिकी पर राय जानने के लिए सर्वे करने वाले अमेरिकी संस्थान 'प्यू रिसर्च सेंटर' के 2021 के सर्वे में बताया गया कि दस में से सात जैन मानते हैं कि वे बीजेपी के सबसे करीब हैं जबकि केवल 8 प्रतिशत लोग खुद को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे करीब महसूस करते हैं। 'प्यू' ने कहा कि भारत के अन्य धार्मिक समुदायों (हिंदुओं सहित) की तुलना में जैन समुदाय के लोगों में बीजेपी के प्रति राजनीतिक झुकाव अधिक है। इससे मुंबई में भाषा और राजनीतिक जुड़ाव के आधार पर तनाव का एक और कारण सामने आता है। मुंबई में पड़ोसी राज्य गुजरात के औद्योगिक समूहों को अहम प्रोजेक्ट मिलने के खिलाफ़ स्थानीय विरोध बढ़ता जा रहा है। इसका ताजा उदाहरण पश्चिमी उपनगरों में अडानी समूह को मिले एक बड़े री-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का बढ़ता विरोध है। खबरों के अनुसार ग्रुप ने धारावी इलाके (लगभग 625 एकड़) और बांद्रा रिक्लेमेशन (लगभग 24 एकड़) के री-डेवलपमेंट का काम हासिल किया है। रिपोर्टों के अनुसार अडानी समूह ने अब पश्चिमी उपनगरों में गोरेगांव में लगभग 143 एकड़ में फैले मोतीलाल नगर प्रोजेक्ट का कॉन्ट्रैक्ट भी हासिल कर लिया है।

दुकानों के नाम गुजराती में लिखे जाने पर उठने वाली आपत्तियां भी दबाव को बढ़ाने वाली एक और बात है। इससे एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जो दिखाता है कि कैसे बड़ी पूंजी की वजह से स्थानीय स्तर पर असहमति और राजनीतिक नाराजगी बेकाबू हो सकती है। गुजरात से जुड़ी राजनीतिक लीडरशिप का कथित दबाव, स्थानीय स्तर पर मजबूत शिवसेना में कराई गई फू ट, आम नागरिकों में पनपी नाराजगी और 1 मई, 1960 को एक कड़े संघर्ष के बाद गठित हुए महाराष्ट्र का इतिहास-जिसमें पुराने बॉम्बे राज्य को महाराष्ट्र और गुजरात नाम के दो अलग-अलग भाषाई राज्यों में बांटा गया था। ये सभी बातें इस बढ़ती राजनीतिक अशांति की जटिल और अहम वजहें हैं।

मोटे तौर पर यह साफ है कि जो भी चीज़ सामाजिक एकता को तोड़ती है, करीबी लोगों को फायदा पहुंचाने वाले पूंजीवाद (क्रोनी कैपटिलिज्म) को बढ़ावा देती है या सांप्रदायिक बंटवारे का फायदा उठाती है, वह एक ऐसा बारूद का ढेर बनाती है जो पूरे घर को जलाकर राख कर सकता है। इसका समाधान बहुत सीधा है- अहिंसा के रास्ते पर लौटना और महात्मा गांधी व उनके सत्याग्रह के सिद्धांतों का समर्थन करना। यह एक ऐसा रास्ता है जिसे देश और जैन समुदाय को फिर से सीखने की ज़रूरत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)


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