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कौन राहुल कैसी जनता एक नवंबर को सब पता चल जाएगा!

बीजेपी में वाजपेयी का दौर बीत गया। अब तो खुद प्रधानमंत्री ऐसी अवैज्ञानिक बातों के जनक बन गए हैं।

कौन राहुल कैसी जनता एक नवंबर को सब पता चल जाएगा!
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शकील अख्तर

बीजेपी में वाजपेयी का दौर बीत गया। अब तो खुद प्रधानमंत्री ऐसी अवैज्ञानिक बातों के जनक बन गए हैं। एक-दो नहीं कई हैं। बादलों में जहाज ले जाओ रडार नहीं पकड़ पाएगा से लेकर मैं नान बायलोजिकल हूं तक कई बातें खुद उनके श्रीमुख से निकली हैं। देश अंधविश्वास की जकड़ में ऐसे ही आता है। इसी को और मजबूत करने के लिए एक नवंबर की कहानी शुरू की गई है कि उस दिन सिखों पर हमला हुआ था।

लग रहा है यह अंग्रेजों के टाइम में या किसी राजे महाराजे के राज में रैली हो रही है। ऐसा विरोध? जैसे कोई गैरकानूनी काम हो रहा हो! बीजेपी वाले सत्तर साल विपक्ष में रहे। खूब रैलियां करते रहे। जिस कांग्रेस सरकार के खिलाफ निकालते थे वह रैली स्थल पर पानी, सफाई, रोशनी, मेडिकल सबकी व्यवस्था करती थी।

रैली करना लोकतांत्रिक अधिकार है। संविधान ने दिया है शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार। मौलिक अधिकारों में है यह। संविधान के अनुच्छेद 19 में साफ है कि सभा करना, इक_े होना, भाषण देना मूल अधिकार हैं। इन्हें कोई सरकार तो छोड़िए, सुप्रीम कोर्ट या संसद भी रद्द नहीं कर सकते। यह संविधान के मूल ढांचे में आता है। केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला है कि संसद इन्हें कानून बनाकर भी रद्द नहीं कर सकती। यह लोकतंत्र का मूल आधार है। संविधान का बेसिक स्ट्रक्चर। जिस पर पूरा संविधान खड़ा है।

मगर मजाक देखिए! देश की सत्तारूढ़ पार्टी विपक्ष की एक नवंबर की रैली पर सवाल उठा रही है। रैली के नुकसान गिनाए जा रहे हैं। तारीख पर सवाल हो रहे हैं। बेसिक बात यह है कि रैली से ही प्राब्लम है। रैली क्यों हो रही है? देश में सब कुछ अच्छा चल रहा है। लोगों को खूब सरकारी नौकरियां मिल रही हैं। व्यापारियों की खूब दुकानें चल रही हैं। सब सुख चैन में हैं।

चीन अरुणाचल में घुस रहा है। आईटीबीपी के डीजी शत्रुजीत सिंह कुछ कह रहे थे कि चीन इतने अंदर घुस आया है। रोज झड़पें हो रही हैं। तो उन्हें चुप करवा दिया। बात खत्म हो गई।

मणिपुर में साढ़े तीन साल हो गए। बाकायदा गृह युद्ध में झांंक दिया है उसको। रोज लोग मर रहे हैं। लेकिन कहीं उसकी बात नहीं। बस सारी चिंता यह है कि एक नवंबर को विपक्ष की यह रैली क्यों हो रही है?

यह डर बड़ा है। पहली बार है जब सरकार डरी हुई दिख रही है। नहीं तो अभी तक तो यह कहती थी कि जनता डरी हुई रहे यह अच्छी बात है। खुद प्रधानमंत्री मोदी के शब्द थे यह डर अच्छा है!

समय का चक्र देखिए अब यह सरकार डर रही है। जनता से उसके शांतिपूर्ण प्रदर्शन से। और उस मुख्य मुद्दे से जो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को मिल गया है वोट चोरी।

वोट चोरी अब जनता का मुद्दा बन गया है। राहुल एक साल से ज्यादा समय से इस सवाल को लगातार उठा रहे हैं। बताया तो उन्होंने पहले भी था। कहा था वाराणसी सहित सौ से ज्यादा सीटें मोदी वोट चोरी से जीते हैं। और बावजूद इसके 2024 के लोकसभा चुनाव में वे स्पष्ट बहुमत नहीं पा पाए।

जनता की समझ में आने लगा था कि अगर चुनाव फ्री एंड फेयर हो जाते तो मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे। इसी बात को अब राहुल ने स्थापित कर दिया।

वोट चोरी इस समय देश का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया और इसी के खिलाफ एक नवंबर की रामलीला मैदान की रैली ऐतिहासिक होने जा रही है। मोदी सरकार इसी से घबराई हुई है। सबसे पहले तो उन्होंने तारीख पर ही बात करना शुरू करवाई। भक्त और गोदी मीडिया अचानक चिल्लाने लगे कि एक नवबंर को ही क्यों?

चलिए भक्तों और गोदी मीडिया को तो लोग अब एक ही समझते हैं और उनकी बातों का तो मजा लेते हैं, ध्यान देना बंद कर दिया है। मगर पूर्व केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद जो वकील भी हैं वे भी आ गए। एक नवंबर पर सवाल उठाने।

उन्हें कोई बताए कि हर तारीख के साथ कोई घटना या दुर्घटना जुड़ी हो सकती है। वे जब अदालत में कोई मामला पेश करते हैं तो देखते हैं कि इस तारीख को कर रहे हैं और इस तारीख को पहले क्या-क्या हुआ था?

तारीखों की कहानी बनाना और उसमें जनता को उलझाए रखने में इन्हें महारत हासिल है। अंधविश्वास फैलाकर ही यह जनता को कूपमंडूक बनाए रखते हैं। पता नहीं क्या क्या चलाते थे। 13 तारीख और वाजपेयी। वाजपेयी इन्हीं के बीच के थे। मगर पढ़े-लिखे लोगों की संगत से डरते नहीं थे। इसीलिए जसवंत सिंह, ब्रजेश मिश्रा, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी को अपने साथ लाए। और जब मूड में होते थे तो कहते थे कि कोई सोचे कि हमें उसने बनाया है तो गलत। हमें 13 तारीख ने बनाया है। और फिर हो हो हो! जोरदार हंसी। खासतौर से जब मुख और मुखौटा कहा था तब पहले तो बहुत आहत हुए थे। मगर बाद में अपने स्वभाव के अनुसार मजाक करने लगे थे कि बताओ किस तारीख में मुख थे किस में मुखौटा बने?

बीजेपी में वाजपेयी का दौर बीत गया। अब तो खुद प्रधानमंत्री ऐसी अवैज्ञानिक बातों के जनक बन गए हैं। एक-दो नहीं कई हैं। बादलों में जहाज ले जाओ रडार नहीं पकड़ पाएगा से लेकर मैं नान बायलोजिकल हूं तक कई बातें खुद उनके श्रीमुख से निकली हैं।

देश अंधविश्वास की जकड़ में ऐसे ही आता है। इसी को और मजबूत करने के लिए एक नवंबर की कहानी शुरू की गई है कि उस दिन सिखों पर हमला हुआ था। मतलब खुद ही उन हमलों के मामले को कमजोर कर रहे हैं कि एक नवंबर नहीं होता तो हिंसा नहीं होती।

मजेदार बात यह है कि इनके पास खबर है कि विपक्ष के नेता तारीख बदलने की मांग कर रहे हैं। मगर राहुल अड़े हैं। मुख्य निशाना तो राहुल ही हैं। लेकिन खैर! एक भी नेता का नाम नहीं बता पाए जिसने तारीख बदलने के लिए कहा हो। लेकिन जब देखा कि यह मामला नहीं चला तो तारीख वहीं रहने दी मगर कहने लगे कि व्यापार को नुकसान हो जाएगा।

कोई बड़ा उद्योग और व्यापारिक संगठन यह कहने को आगे नहीं आया तो एक कागजी संगठन से राहुल को पत्र लिखवा दिया कि एक नवंबर की रैली से व्यापार को नुकसान हो जाएगा। लेकिन व्यापार के जानकार लोग ही कहने लगे कि बाजार का तो सिद्धांत है फुट फाल। मतलब जितने ज्यादा लोग आएंगे उतनी ही बिक्री बढ़ेगी। लोगों का आना व्यापार का बढ़ना।

इस समय पूरे देश के बाजारों में मंदी है। ग्राहक कहीं है ही नहीं। मगर बाजार विशेषज्ञ कहते हैं कि जब लाखों लोग रैली में शामिल होने दिल्ली आएंगे तो कुछ न कुछ खरीद कर लेकर जाएंगे। बाजार में तेजी आएगी।

मगर इन सबसे भक्त, गोदी मीडिया, भाजपा, सरकार किसी को कई मतलब नहीं। उन्हें मतलब केवल राहुल गांधी से है। तारीख का सवाल भी राहुल से था। और एक नकली व्यापार संगठन से भी। राहुल को ही पत्र लिखवाया गया है।

डर राहुल से ही है। प्रधानमंत्री मोदी की भाषा में यह कहा जा सकता है कि 'यह डर अच्छा है!' क्योंकि अगर इसी डर की वजह से प्रधानमंत्री मोदी जनता की तरफ ध्यान देने लगें तो अच्छी बात है।

वोट चोरी आज देश के सामने सबसे बड़ा मुद्दा है। अगर जनता का वोट ही चोरी हो गया तो उसके पास बचा क्या? यही एक चीज ऐसी है जिसकी वजह से उसकी पूछ होती है। अगर उसके वोट का ही मतलब नहीं रहा तो उसे कौन पूछेगा?

कौन राहुल कि तरह कौन मतदाता पूछा जाएगा। राहुल को तो आज पहचान गए हैं। राहुल ने सारी बाजी उलट कर रख दी है। और अब जनता भी उसी की तैयारी में है।

एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में पता चल जाएगा कि कौन वोटर? कौन जनता? सब वहां होंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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