Top
Begin typing your search above and press return to search.

जब संसद खामोश हो जाती है, तो शुरु होती है कैमरे पर राजनीति

भारत की राजनीतिक बातचीत का एक नया ठिकाना बनता दिख रहा है। अब यह सिर्फ़र् संसद भवन, पार्टी मुख्यालय, चुनावी रैलियों या टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं है।

जब संसद खामोश हो जाती है, तो शुरु होती है कैमरे पर राजनीति
X
  • के रवींद्रन

इस सीधे रास्ते के लोकतांत्रिक फायदे हैं। जनता से बातचीत को सिर्फ़ नौकरशाहों और वकीलों की समझ में आने वाली भाषा में लिखे सरकारी बयानों तक सीमित रहने की ज़रूरत नहीं है। कैमरे के सामने साफ़-साफ़ बात करने वाला मंत्री तीन मिनट में उतना समझा सकता है जितना कोई विभागीय प्रेस रिलीज़ छह पन्नों में भी नहीं कर पाती। लेकिन सीधा कम्युनिकेशन तब समस्या बन जाता है जब यह जवाबदेह कम्युनिकेशन की जगह ले लेता है।

भारत की राजनीतिक बातचीत का एक नया ठिकाना बनता दिख रहा है। अब यह सिर्फ़र् संसद भवन, पार्टी मुख्यालय, चुनावी रैलियों या टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं है। अब अक्सर इसकी शुरुआत मोबाइल फोन को सही एंगल पर रखकर, सोच-समझकर चुने गए बैकग्राउंड और कैमरे में देखकर सीधे लोगों से बात करने के जाने-पहचाने निर्देशन के साथ होती है।

यह बदलाव तब साफ़ तौर पर दिखाई देने लगा जब विरोध-प्रदर्शन, नारेबाज़ी, सदन की कार्यवाही स्थगित होने और गुस्से के आपसी प्रदर्शनों के कारण संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित होने लगी। सदस्य भले ही सदन में आएं, रजिस्टर पर साइन करें और अपनी तय सीटों पर बैठें, लेकिन वे जनता तक जो संदेश पहुंचाना चाहते हैं, वह अक्सर कहीं और दिया जाता है। जब तक संसद शांत होती है- अगर कभी होती भी है- तब तक मंत्री और विपक्ष के नेता इंस्टाग्राम, $फेसबुक, यूट्यूब या एक्स पर अपनी बात रख चुके होते हैं।

यह सिर्फ़ तकनीक में बदलाव नहीं है। यह राजनीतिक बातचीत का एक नया तरीका है। पारंपरिक रूप से संसद में अध्यक्ष को संबोधित करना, प्रक्रिया के नियमों का पालन करना, रुकावटों का सामना करना और तुरंत चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ता था। सोशल मीडिया ज़्यादा सुविधाजनक व्यवस्था देता है। राजनेता देश के प्रतिनिधियों का सामना किए बिना सीधे देश को संबोधित करता है। इसमें न तो 'पॉइंट ऑफ़ ऑर्डर' होता है, न ही पूरक सवाल होते हैं और न ही विपक्षी बेंच से कोई सदस्य दस्तावेज़ लेकर खड़ा होता है।

जो नेता कार्यवाही से दूर रहते हैं- चाहे विरोध के कारण या सदन स्थगित होने के कारण - वे भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय बने रह सकते हैं। संसद में न होने का मतलब अब राजनीति से दूर होना नहीं है। कोई नेता सुबह सदन का बहिष्कार कर सकता है, दोपहर में वीडियो रिकॉर्ड कर सकता है और रात के खाने से पहले राष्ट्रीय स्तर पर उसे चला कर सकता है। लोकतंत्र ने 'रिमोट वर्किंगÓ का तरीका अपना लिया है।

इसका सबसे सटीक उदाहरण तब देखने को मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा में विफलता, पेपर लीक और भर्ती प्रणालियों की विश्वसनीयता को लेकर युवाओं के गुस्से से पैदा हुए राजनीतिक और भावनात्मक हालात पर प्रतिक्रिया देते हुए एक वीडियो पोस्ट किया। ऐसे विषय पर मोदी का सीधा दखल इसलिए खास था क्योंकि यह असामान्य था। प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे अनुभवी राजनीतिक संदेशदाताओं में से एक हैं और उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में डिजिटल फॉलोवर बनाये हैं। फिर भी, उनका ज़्यादातर संदेश औपचारिक भाषणों, तय ब्रॉडकास्ट, सार्वजनिक कार्यक्रमों और बहुत सोच-समझकर तैयार किए गए संदेशों के ज़रिए होता है। सड़क पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के पीछे की चिंताओं को संबोधित करने वाला एक वीडियो, इसकी तुलना में काफी अनौपचारिक और बातचीत जैसा लगा।

यह प्रस्तुति इतनी अप्रत्याशित थी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्लेटफ़ॉर्म मॉडरेशन सिस्टम एक तरह के तकनीकी संकट में फंसते हुए दिखे। जो सिस्टम नकली पहचान और हेरफेर किए गए राजनीतिक कंटेंट का पता लगाने के लिए बनाए गए थे, उनके सामने एक असली वीडियो आया जो बड़ी मात्रा में फैल रहे सिंथेटिक कंटेंट की तुलना में कम परिचित लग रहा था। इस घटना में एक दिलचस्प बात यह भी थी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने राजनीतिक सच्चाई के इतने सारे बनावटी रूप देखे थे कि असलियत ही संदिग्ध लगने लगी थी।

नतीजतन, मेटा के भारत के नेतृत्व को कंटेंट मॉडरेशन और राजनीतिक वीडियो को संभालने के तरीके को लेकर जांच का सामना करना पड़ा। इससे पहले से ही गंभीर विवाद में एक और अजीब पहलू जुड़ गया था। सरकार एक निजी ग्लोबल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए युवा नागरिकों से बात करने की कोशिश कर रही थी, प्लेटफ़ॉर्म के ऑटोमेटेड सिस्टम यह तय करने की कोशिश कर रहे थे कि क्या असली है, और इसके अधिकारियों से यह बताने के लिए कहा जा रहा था कि डिजिटल गेटकीपर ने सरकार के चुने हुए प्रमुख के संदेश को गलत तरीके से क्यों संभाला।

यह घटना भविष्य की जटिलताओं की एक झलक दिखाती है। राजनीतिक वैधता कभी मुख्य रूप से वोटों, संसदीय संख्या और संवैधानिक पद पर निर्भर करती थी। अब इसे उन एल्गोरिदम से भी गुजऱना पड़ता है जो कंटेंट को क्लासिफ़ाई, रिकमेंड, प्रतिबंधित, लेबल या हटाते हैं। हो सकता है कि किसी प्रधानमंत्री के पास संसदीय बहुमत हो, फिर भी उन्हें कुछ समय के लिए ऐसे कंटेंट-फ़िल्टरिंग सिस्टम के फैसले को मानना पड़ सकता है जिसने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा हो।

'कॉकरोच जनता पार्टीÓ आंदोलन के संस्थापक अभिजीत दिपके ने उसी भाषा में जवाब दिया जिसने युवा आंदोलन को राजनीतिक रूप से मज़बूत बनाया है : बेबाकी और मज़ाकिया अंदाज़। उन्होंने वीडियो में मोदी के लुक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की त्वचा तो देश के हालात से ज़्यादा चमकती हुई लग रही थी।

यह बात मज़ाकिया, व्यक्तिगत और सोशल मीडिया पर शेयर किए जाने के लिए एकदम सही थी। यह विरोध प्रदर्शन की एक व्यापक विशेषता को भी दिखाता है। वीडियो कम्युनिकेशन की बढ़ती पसंद यह भी दिखाती है कि लगातार राजनीतिक स्पष्टीकरण के मंच के तौर पर संसद की उपयोगिता कम हो रही है। जब कार्यवाही बार-बार बाधित होती है, तो हर पार्टी के पास घटनाओं का अपना वर्णन तैयार करने का कारण होता है। सरकार कहती है कि विपक्ष ने बहस नहीं होने दी। विपक्ष कहता है कि सरकार ने जवाबदेही से बचने की कोशिश की। फिर दोनों अपने-अपने पक्ष के समर्थन में सुबूत अपलोड करते हैं।

नतीजा एक राष्ट्रीय बातचीत नहीं, बल्कि कई समानांतर प्रसारण होते हैं। संसद को असहमति को एक साझा मंच पर लाने के लिए बनाया गया था। सोशल मीडिया हर राजनीतिक समूह को अपना मंच बनाने, विजिटर्स गैलरी को समर्थकों से भरने और बहस के असहज होने पर कमेंट्स बंद करने की सुविधा देता है।

इस सीधे रास्ते के लोकतांत्रिक फायदे हैं। जनता से बातचीत को सिर्फ़ नौकरशाहों और वकीलों की समझ में आने वाली भाषा में लिखे सरकारी बयानों तक सीमित रहने की ज़रूरत नहीं है। कैमरे के सामने साफ़-साफ़ बात करने वाला मंत्री तीन मिनट में उतना समझा सकता है जितना कोई विभागीय प्रेस रिलीज़ छह पन्नों में भी नहीं कर पाती। लेकिन सीधा कम्युनिकेशन तब समस्या बन जाता है जब यह जवाबदेह कम्युनिकेशन की जगह ले लेता है। वीडियो एक बयान है, बहस नहीं। यह बोलने वाले को सवाल चुनने, जवाब एडिट करने और भावनात्मक माहौल को नियंत्रित करने की सुविधा देता है। संसद, अपनी सबसे अच्छी स्थिति में, ठीक इसके उलट हालात देती है। यह सत्ता को रुकावट, विरोध और बिना स्क्रिप्ट वाले दबाव का सामना करने के लिए मजबूर करती है।

विडंबना यह है कि हर राजनीतिक पार्टी संसद के कमज़ोर होने की शिकायत करती है, जबकि अलग-अलग तरीकों से उसकी अहमियत कम करने में योगदान भी देती है।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it