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यू-टर्न लेना आर्थिक नजरिये से कब सही होता है?

हाल ही में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने आर्थिक नीति बनाने के मामले में एक छोटा लेकिन अहम सबक दिया।

यू-टर्न लेना आर्थिक नजरिये से कब सही होता है?
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  • डॉ.अजीत रानाडे

भारत में भी यू-टर्न (फैसले पलटने) के अपने उदाहरण हैं। खेती में सुधार के तीन कानून बहुत भरोसे के साथ बनाए गए थे और फिर लंबे राजनीतिक विरोध के बाद उन्हें रद्द कर दिया गया। इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम, जिसे तेज़ी से ई-20 की ओर बढ़ाया जा रहा था, अब गाड़ियों, कच्चे माल, पानी के इस्तेमाल और ग्राहकों की पसंद से जुड़ी चिंताओं का सामना कर रहा है; और हो सकता है कि इसमें फिर से बदलाव की ज़रूरत पड़े।

हाल ही में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने आर्थिक नीति बनाने के मामले में एक छोटा लेकिन अहम सबक दिया। 5 अगस्त को गवर्नर संजय मल्होत्रा से पूछा गया कि क्या अनिवासी भारतीयों से विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए बनाई गई खास विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा (फॉरेन करेन्सी नॉन रेसीडेंसी (बैंक) डिपॉजिट- एफसीएनआर (बी) स्कीम) योजना को तय निर्धारित समय सीमा 30 सितंबर से पहले बंद किया जा सकता है, तो उन्होंने कहा कि ऐसा करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। इसके नौ दिन बाद आरबीआई ने अचानक इसकी समाप्ति की तारीख 31 अगस्त कर दी।

इसके पीछे ठोस आर्थिक कारण हो सकते हैं। यह योजना काफी ज़्यादा सफल रही थी। डॉलर का प्रवाह ज़बरदस्त था जबकि मुद्रा के अवमूल्यन (मूल्य में गिरावट) से सुरक्षा देने की सब्सिडी लागत बढ़ती जा रही थी। लिक्विडिटी मैनेजमेंट और भविष्य की विदेशी मुद्रा देनदारियों की समस्या भी बढ़ रही थी। सवाल यह नहीं है कि आरबीआई को अपना फ़ैसला बदलने का अधिकार था या नहीं। सवाल यह है कि जब योजना को समय से पहले बंद करने की संभावना पर चर्चा हो रही थी तो साफ़ तौर पर ऐसा न करने का भरोसा क्यों दिलाया गया?

आर्थिक नीतियां अक्सर ऐसे 'यू-टर्नÓ अर्थात अचानक फ़ैसला बदलने से भरी होती हैं। कुछ फ़ैसले तेज़ी से हालात समझने और सीखने का सबूत होते हैं। वहीं कुछ फ़ैसले खराब तैयारी, राजनीतिक दबाव या बस अनिश्चितता को दिखाते हैं। हम इनमें फ़र्क कैसे करें?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ़ पॉलिसी इसका सबसे सटीक उदाहरण है। अप्रैल, 2025 में 'लिबरेशन डेÓ पर टैरिफ़ की घोषणाओं के बाद से अमेरिका ने ड्यूटीज़ लगाई हैं, रोकी गई हैं, उनमें बदलाव किए गए हैं, बातचीत के ज़रिए उन्हें कम किया गया है, फिर से धमकी दी गई है और कभी-कभी दोबारा लागू भी किया गया है। अपनी सप्लाई चेन संभालने वाली कंपनियों को अब टैरिफ़ के लिए तैयार रहना पड़ता है और साथ ही इस अनिश्चितता की कीमत भी चुकानी पड़ती है कि छह महीने बाद टैरिफ़ क्या होगा। पॉलिसी में उतार-चढ़ाव खुद निवेश पर एक टैक्स बन जाता है।

भारत में भी यू-टर्न (फैसले पलटने) के अपने उदाहरण हैं। खेती में सुधार के तीन कानून बहुत भरोसे के साथ बनाए गए थे और फिर लंबे राजनीतिक विरोध के बाद उन्हें रद्द कर दिया गया। इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम, जिसे तेज़ी से ई-20 की ओर बढ़ाया जा रहा था, अब गाड़ियों, कच्चे माल, पानी के इस्तेमाल और ग्राहकों की पसंद से जुड़ी चिंताओं का सामना कर रहा है; और हो सकता है कि इसमें फिर से बदलाव की ज़रूरत पड़े।

पेंशन सुधार एक और उदाहरण है। राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) ने सरकारी पेंशन को बिना फंड वाले 'डिफ़ाइंड-बेनिफिटÓ वादे से हटाकर फंड वाले 'कंट्रीब्यूशन-बेस्डÓ सिस्टम की ओर बढ़ाया गया। पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने के राजनीतिक दबाव के कारण यूनिफाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस) बनी जो योगदान को बनाए रखते हुए पक्की पेंशन का फ़ायदा भी देती है। फिर भी मार्च, 2026 तक केंद्र सरकार के 24.14 लाख योग्य कर्मचारियों में से केवल 1.24 लाख कर्मियों ने ही यूपीएस को चुना।

ये सभी एक ही तरह के बदलाव नहीं हैं। कभी-कभी राजनीति बदल जाती है, कभी-कभी सबूत बदल जाते हैं, कभी-कभी मूल पॉलिसी पर ठीक से सोच-विचार नहीं किया गया होता है और कभी-कभी पॉलिसी का सवाल ही गलत तरीके से तैयार किया गया होता है।

इस सवाल पर विचार करना चाहिए- 'क्या औद्योगिक नीति काम करती है?Ó इसका कोई एक 'हांÓ या 'नहींÓ वाला जवाब नहीं हो सकता। कौन सा उद्योग? कौन-सा तरीका? कितने समय के लिए? कैसी गवर्नेंस व्यवस्था के तहत? क्या मदद प्रदर्शन पर निर्भर है? क्या वहां प्रतिस्पर्धा है या सिफ़र् पहले से मौजूद कंपनियों को सुरक्षा दी जा रही है? क्या भारत की 'उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाÓ (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम) हर मामले में अच्छी पॉलिसी है?

आम तौर पर अर्थशास्त्र नीतियों से जुड़े कई सवालों के पक्के जवाब नहीं दे सकता क्योंकि आर्थिक व्यवहार तय नियमों से नहीं चलता। एक नीति व्यवहार को बदलती है और बदला हुआ व्यवहार उस माहौल को बदल देता है जिसमें पॉलिसी काम करती है। खेती में सुधार से इंसेंटिव बदलते हैं लेकिन साथ ही राजनीतिक लामबंदी भी बदलती है। उत्पादन अनुदान से कोई उद्योग खड़ा हो सकता है लेकिन फिर वह उद्योग सब्सिडी जारी रखने की मांग करने वाला एक ग्रुप बन जाता है। राजनीतिक अर्थव्यवस्था, अर्थशास्त्र के लिए कोई बाहरी रुकावट नहीं है। यह व्यवस्था का ही हिस्सा है।

वर्षों तक विश्व बैंक अपनी 'डूइंग बिज़नेसÓ रैंकिंग जारी करता रहा जिसका इस बात पर बहुत असर पड़ा कि किसी देश को कितना 'व्यापार अनुकूलÓ माना जाता है। अजीब बात तो यह है कि 'डूइंग बिज़नेस 2010Ó में, 183 अर्थव्यवस्थाओं में भारत 133वें, ब्राज़ील 129वें और रूस 120वें स्थान पर था जबकि चीन 89वें स्थान पर था। साफ़ है कि विश्व बैंक के संकेतक यह नहीं बता पाए कि कम रैंकिंग वाली ये ब्राजील, रूस, भारत और चीन (ब्रिक) की अर्थव्यवस्थाएं इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ रही थीं। बाद में एक तरह के छोटे-मोटे विवाद के बाद बैंक ने 2021 में 'डूइंग बिज़नेसÓ रैंकिंग को पूरी तरह बंद कर दिया। इसकी जगह एक और पैमाना लाया गया है।

इसका मतलब यह नहीं है कि अपनी राय बदलने के लिए अर्थशास्त्रियों या नीति-निर्माताओं की आलोचना की जानी चाहिए। उल्टे, सबूत मिलने के बाद भी अपनी राय न बदलना कट्टरपंथ है, न कि निरंतरता। समस्या तब होती है जब संस्थाएं असल आर्थिक हालात से ज़्यादा भरोसे के साथ बात करती हैं या जब मुख्य रूप से राजनीतिक सुविधा के कारण किए गए बदलावों को आर्थिक ज़रूरत के तौर पर पेश किया जाता है।

इसलिए विश्वसनीयता का मतलब यह नहीं है कि रास्ता कभी न बदला जाए। इसका मतलब है कि उन हालात के बारे में साफ़ होना जिनके तहत रास्ता बदला जा सकता है। रिजर्व बैंक कह सकता था कि एफसीएनआर (बी) विंडो 30 सितंबर तक खुली रहेगी, जब तक कि पैसे का आगमन एक तय सीमा से ज़्यादा न हो जाए या वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चिंताएं पैदा न हों। असल में इस घटना की एक आलोचना में यही बात कही गई है- पहले से तय कारणों से अनुमान लगाने की क्षमता से समझौता किए बिना लचीलापन बनाए रखा जा सकता था।

अच्छी पॉलिसी बनाने के लिए ऐसे गुणों की ज़रूरत होती है जो कभी-कभी एक-दूसरे के उलट हो सकते हैं, जैसे विनम्रता, पारदर्शिता, जवाबदेही और फैसला लेने की क्षमता। विनम्रता का मतलब है यह मानना कि अनुमान और मॉडल गलत हो सकते हैं। पारदर्शिता का मतलब है यह बताना कि क्या बदला है। जवाबदेही का अर्थ है किसी फैसले को पलटने के नतीजों को स्वीकार करना। फ़ैसला लेने की क्षमता का मतलब है कि अनिश्चितता को काम न करने या ठप पड़ जाने का बहाना नहीं बनने देना चाहिए।

इसलिए, यू-टर्न यानी हमेशा कमज़ोरी की निशानी नहीं होते। कभी-कभी वे दिखाते हैं कि पॉलिसी में सुधार हो रहा है और वह हालात के हिसाब से तेज़ी से बदल सकती है। लेकिन सबूत बदलने की वजह से दिशा बदलने और राजनीतिक हवा बदलने की वजह से दिशा बदलने में फ़र्क होता है। संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता तब बनाए रखती हैं जब वे यह दिखावा नहीं करतीं कि वे कभी गलत नहीं होतीं बल्कि यह बताती हैं कि उन्होंने अपना मन क्यों बदला, ज़मीनी हकीकत में क्या बदलाव आया है और नया रास्ता ज़्यादा भरोसे के लायक क्यों है?

(लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


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