आखिर ईरान पर हमलों की वजह क्या है?
ट्रम्प ने 3 मार्च को कहा कि ईरान युद्ध के लिए उनका मकसद है- ईरान की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करना, उसकी नेवी को खत्म करना, उसके न्यूक्लियर इरादों को खत्म करना तथा आतंकवादियों को हथियार देने से रोकना और इसके साथ ही ईरान में सरकार बदलने के लिए मजबूर करना

- वाप्पला बालाचंद्रन
ट्रम्प ने 3 मार्च को कहा कि ईरान युद्ध के लिए उनका मकसद है- ईरान की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करना, उसकी नेवी को खत्म करना, उसके न्यूक्लियर इरादों को खत्म करना तथा आतंकवादियों को हथियार देने से रोकना और इसके साथ ही ईरान में सरकार बदलने के लिए मजबूर करना। क्या ये मकसद पूरे हो सकते हैं?
ईरान के खिलाफ जारी मौजूदा अमेरिकी-इज़राइल युद्ध के बारे में कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब अभी भी साफ नहीं हैं।
क्या यह उस तरह का है जैसा कि अर्थशास्त्री और पब्लिक पॉलिसी एनालिस्ट जेफरी साक्स कहते हैं कि यह युद्ध अमेरिका की 'अपनी ग्लोबल बादशाहत को जारी रखने या बनाए रखने' की कोशिश है? साक्स ईरान पर हमले को 'मिडिल ईस्ट पर नियंत्रण और मिडिल ईस्ट के तेल पर कंट्रोल के लिए युद्ध' बताते हैं।
क्या इससे यह पता चलता है कि प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प ने 28 फरवरी को मार-ए-लागो से अचानक अपनी पॉलिसी क्यों बढ़ा दी जबकि जिनेवा में उनके स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्टीव विटकॉफ तथा जेरेड कुशनर और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची की टीम के बीच तीन राउंड की बातचीत पहले ही हो चुकी थी? उसी समय उन्होंने ईरान के चारों ओर सबसे बड़ा अमेरिकी लड़ाकू जहाजी बेड़ा इक_ा करना जारी रखा?
अमरेकी-इज़राइल के संयुक्त 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' को शुरू करने के लिए 28 फरवरी का दिन ही क्यों चुना गया? काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस में मिडिल ईस्टर्न स्टडीज़ के सीनियर फेलो इलियट अब्राम्स की एक रिपोर्ट थी कि ईरान पर हमला करने का ट्रम्प व नेतन्याहू का फैसला संभवत: 11 फरवरी को इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के वाशिंगटन दौरे के दौरान लिया गया था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दो दिन पहले के इज़रायल दौरे से इस हमले की कड़ी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। भारत में इज़रायली राजदूत रियूवेन अजार के अनुसार, मोदी के 25-26 फरवरी को इज़रायल यात्रा के बाद हुए ऑपरेशन का उनके दौरे से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने इसे एक 'ऑपरेशनल मौका' बताया जो मोदी के इज़रायल छोड़ने और 28 फरवरी की सुबह इज़रायल की सिक्योरिटी कैबिनेट से फाइनल मंज़ूरी मिलने के बाद मिला।
यह 'ऑपरेशनल मौका' उस बातचीत और मीडिएशन के बिल्कुल उलट है जो चर्चा चल रही थी। न्यूयॉर्क के थिंक टैंक सीएफआर ने 26 फरवरी को अपने डेली न्यूज़ ब्रीफ में ओमान के मीडिएटर के हवाले से कहा था कि विटकॉफ-अराघची बातचीत के दौरान ईरान और अमेरिका दोनों ही 'नए और क्रिएटिव आइडिया और सॉल्यूशन के लिए बहुत ज़्यादा खुलापन' दिखा रहे थे और ट्रम्प व अराघची दोनों ने कहा कि 'एक बेहतर डील है'। क्या यह बात ओमान ने लीक की थी जो उस युद्ध को रोकने के लिए थी जिसे वह नहीं चाहता था?
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ज़्यादातर अमेरिकी सहयोगी- सऊदी अरब, कुवैत, कतर, अमीरात और बहरीन जो अब ईरान के निशाने पर हैं, ने ईरान से होने वाले खतरों पर अपना अनुमान बदल दिया था।
लंदन के इंटरनेशनल अफे़यर्स थिंक टैंक चैथम हाउस ने 19 फरवरी को अपने अनुमान में कहा कि मिडिल ईस्ट की कतर, तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र जैसी सरकारों ने अपना रुख बदल लिया है। ये सरकारें जो कभी अमेरिका से ईरान और 'एक्सिस ऑफ़ रेजिस्टेंस' से निपटने की अपील कर रही थीं, अब बातचीत की वकालत कर रही थीं क्योंकि उनका मानना था कि 'अब सबसे बड़ा खतरा विस्तारवादी और आक्रामक इज़राइल और एक संभावित रूप से ढह चुके ईरानी राज्य की अराजकता है'।
उन्हें यह भी चिंता थी कि अमेरिका ने ईरान में ऐसा कोई कदम उठाया जैसा उसने इराक में उठाया था, तो यह इस्लामिक स्टेट को जन्म देगा जो इराक के टूटने के बाद 'नो-मैन्स लैंड' में उभरा था।
अंतिम पहेली यह है कि, जब प्रेसिडेंट ट्रम्प और इज़राइली प्राइम मिनिस्टर बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ-साफ कहा था कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को टारगेट किया जाएगा तो वे सुरक्षित बंकर में क्यों नहीं चले गए?
28 फरवरी को ट्रम्प-नेतन्याहू का 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' शुरू करने का संयुक्त फैसला 12 फरवरी को इज़राइली प्राइम मिनिस्टर के दौरे के बाद व्हाइट हाउस की उस घोषणा से बिल्कुल मेल नहीं खाता जिसमें कहा गया था कि 'अमेरिका और इज़राइल के बीच इस बात पर कोई 'पक्का' समझौता नहीं हुआ है कि ईरान के साथ आगे कैसे बढ़ना है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प ने 'जोर दिया था कि तेहरान के साथ बातचीत जारी रहेगी ताकि यह देखा जा सके कि क्या कोई डील हो सकती है'। ट्रम्प ने 24 फरवरी को स्टेट ऑफ द यूनियन के अपने संबोधन में भी इस संभावना का कोई संकेत नहीं दिया था। कार्नेगी एंडोमेंट के आकलन के अनुसार ट्रम्प ने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के अपने दृढ़ संकल्प का उल्लेख किया और कहा कि उन्होंने अपने भाषण से 'क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य ठिकानों के निर्माण के बारे में धमकी भरी भाषा को हटा दिया'।
इस फैसले को क्यों बदला गया? इसका एकमात्र सुराग संभवत: बीबीसी की मार-ए-लागो बयान की उस व्याख्या में मिलता है कि ट्रम्प और नेतन्याहू ने 'ईरानी नेतृत्व को वर्षों से घरेलू स्तर पर अपने सबसे कमजोर बिंदु के रूप में देखा क्योंकि गाजा युद्ध के बाद क्षेत्र में उसके सहयोगी मिलिशिया का सफाया हो गया था'। क्या ट्रम्प की सोच थी कि यह वेनेजुएला-मादुरो ऑपरेशन जितना आसान होगा? या यह निर्णय केवल नेतन्याहू को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया था?
ट्रम्प ने 3 मार्च को कहा कि ईरान युद्ध के लिए उनका मकसद है- ईरान की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करना, उसकी नेवी को खत्म करना, उसके न्यूक्लियर इरादों को खत्म करना तथा आतंकवादियों को हथियार देने से रोकना और इसके साथ ही ईरान में सरकार बदलने के लिए मजबूर करना।
क्या ये मकसद पूरे हो सकते हैं? 28 फरवरी को ही अपने एक सर्वे में सीआरएफ ने पाया कि युद्ध के बाद ईरान के बहुत कमज़ेोर होने के बाद भी अमेरिका और इज़राइल के लिए थियोक्रेटिक शासन को गिराना लगभग नामुमकिन है। इसका कारण इस्लामिक रिपब्लिक का स्ट्रक्चर है जो 'एक आइडियोलॉजिकल सिस्टम है जिसमें कई स्तर वाले कुलीन और सपोर्ट का बेस है'। यह 'वन-मैन शो' नहीं है। हालांकि सभी फैसले ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के नाम पर लिए गए थे लेकिन वली नज़र जैसे एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरानी थियोक्रेसी और डिफेंस एस्टैब्लिशमेंट 'मल्टी-नोडल' हैं जहां अलग-अलग स्तर पर फैसले लिए जाते हैं। वे एक मुश्किल फैसले लेने की प्रक्रिया की बात करते हैं जिसमें एक्सपर्ट्स की असेंबली शामिल है जो सक्सेशन तय करती है और सुप्रीम लीडर, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और क्लेरिकल काउंसिल्स को सलाह देती है।
शायद इसीलिए 3 जनवरी 2020 को अमेरिका द्वारा ड्रोन से कासिम सुलेमानी को मारने के बाद भी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की कुद्स फोर्स की तेज़ी कम नहीं हुई। सुलेमानी कुद्स फोर्स का सबसे करिश्माई और सबसे डरावना चेहरा था जो आईआरजीसी की एक खास यूनिट है जो अनकन्वेंशनल लड़ाई और एक्स्ट्राटेरिटोरियल ऑपरेशन पर फोकस करती है।
पिछले कुछ सालों की मुश्किलों के दौरान डीसेंट्रलाइज़ेशन का सिस्टम भले ही कम हो गया हो लेकिन 'यह अभी भी सरकार को एक ऐसा कैडर देता है जो सत्ता बनाए रखने के लिए ताकत का इस्तेमाल करने को तैयार है'। साथ ही 'हाल के विद्रोह को दबाने से यह दिखा कि विदेश में हार का मतलब घर में कमज़ोरी नहीं है'। मिडिल ईस्ट के विशेषज्ञों का कहना है कि 'शायद हालिया बमबारी से धर्मतंत्र (थियोक्रेसी) बुरी तरह घायल हो सकता है लेकिन बच जाएगा और खड़ा रहेगा'।
सीएफआर में मिडिल ईस्ट स्टडीज़ के सीनियर फेलो रे ताकेह का मानना है कि इस लड़ाई के बिना भी पश्चिम को बहुत बेहतर फ़ायदा हो सकता था। उनका कहना है कि अराघची ने ऐसे प्रस्ताव रखे थे जिनमें कई सालों तक यूरेनियम एनरिचमेंट को रोकने और बाद में इसे कम लेवल पर फिर से शुरू करने की बात कही गई थी।
सीएफआर की सीनियर फेलो लिंडा रॉबिन्सन को भी लगता है कि अगर स्पेशल फोर्स तैनात की गईं तो बड़ी संख्या में अमेरिकी हताहत होंगे। अरब देश पहले से ही इज़राइल के साथ इन संयुक्त ऑपरेशन से परेशान हैं। सीएफआर एक्सपर्ट्स की आम राय यह है कि सिर्फ हवा या समुद्र से किए जाने वाले संयुक्त हमलों से ट्रम्प के बड़े मकसद पूरे नहीं हो सकते।
... और आखिर में, अयातुल्ला अली खामेनेई के बारे में ट्रम्प ने कहा था कि वह 'अमेरिकी इंटेलिजेंस से बच नहीं पाए' पर इसके विपरीत ऐसे संकेत हैं कि 'शहादत' की सच्ची भावना से प्रेरित खामेनेई ने अपने बंकर के बाहर रहने का विकल्प चुना।
(लेखक कैबिनेट सचिवालय के पूर्व विशेष सचिव हैं। सिंडिकेट:द बिलियन प्रेस)


