गांधी के लिए स्वराज के क्या मायने थे?
गांधी का हिन्द स्वराज किसी बहुसंख्यक समुदाय का नहीं, सबका और न्याय का राज्य था

- अरुण कुमार डनायक
गांधी का हिन्द स्वराज किसी बहुसंख्यक समुदाय का नहीं, सबका और न्याय का राज्य था। किसान-मजदूर, धनवान-गरीब, हिन्दू-मुसलमान, सिख-ईसाई सभी को समान दर्जा मिले और धर्म, जाति या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो। प्रत्येक व्यक्ति को अन्न, वस्त्र और आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध हों। गांधी के स्वराज की अंतिम कसौटी केवल राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था नहीं, मानव कल्याण थी।
राज' शब्द की जड़ें भारतीय प्राचीन परंपरा में मिलती हैं। संस्कृत के 'स्व' और 'राज' से बना यह शब्द वैदिक काल में स्वतंत्र प्रभुत्व और अपनी सत्ता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ। आगे चलकर रामायण में 'स्वराज्य' अपने राज्य और राजसत्ता की पुनर्प्राप्ति का अर्थ देता दिखाई देता है। मध्यकाल में छत्रपति शिवाजी के 'हिन्दवी स्वराज्य' ने इसे अपनी भूमि पर अपना शासन स्थापित करने का ठोस अर्थ दिया। समय के साथ स्वराज्य स्वतंत्र सत्ता से अपने राज्य तक पहुंचा और 1857 में विदेशी शासन से मुक्ति का प्रतीक बन गया।
साहित्य में भी स्वराज की आकांक्षा 1857 के बाद मुखर हुई। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के आनन्दमठ (1882) में मातृभूमि को 'मां' के रूप में चित्रित किया गया और 'वन्दे मातरम्' को राष्ट्रवादी चेतना का स्वर मिला। 1905 के बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन में यही गीत साहित्य से निकलकर जनआंदोलन का उद्घोष बन गया।
विदेशी दासता से मुक्ति और अपना शासन स्थापित करने की आकांक्षा ने तिलक के उद्घोष—'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा'—को जन-जन की प्रेरणा बना दिया। 1916 में तिलक और एनी बेसेंट ने अलग-अलग होम रूल लीगों के माध्यम से स्वशासन की मांग को व्यापक किया। असहयोग आंदोलन के बाद स्वराज के मार्ग को लेकर मतभेद उभरे और 1923 में चित्तरंजन दास व मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी बनाकर विधान परिषदों के भीतर से संघर्ष का रास्ता अपनाया। 1924 में गांधीजी और स्वराजवादियों के समझौते के बाद चरखे, सूत और स्वदेशी को बल मिला और स्वराज का अर्थ राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता तक विस्तृत हुआ।
अलबत्ता, स्वराज की अवधारणा को व्यापक बनाया गांधी ने। उन्होंने स्वतंत्रता और स्वराज का अंतर स्पष्ट करते हुए बताया कि स्वतंत्रता बाहरी बंधनों से मुक्ति है, लेकिन स्वराज केवल राजनीतिक आजादी नहीं, बल्कि अपने ऊपर शासन करने की क्षमता भी है। गांधी के लिए स्वराज का अर्थ था—ऐसी लोकसत्ता, जो नैतिक आधार पर संचालित हो। गांधी के अनुसार स्वराज लोकसम्मति से चलने वाला शासन है, जिसका आधार सभी वयस्क स्त्री-पुरुषों का मताधिकार है। गांधी मताधिकार को अधिकार के साथ जिम्मेदारी मानते थे और मतदाता से शारीरिक श्रम द्वारा देशसेवा की अपेक्षा रखते थे। उनके लिए सच्चा स्वराज सत्ता हासिल कर लेने में नहीं, बल्कि उसके दुरुपयोग का जनता द्वारा प्रभावी प्रतिकार करने में है; यह क्षमता जितनी अधिक होगी, स्वराज उतना ही सफल होगा।
वे राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत के द्वारा पश्चिमी देशों की संसदीय व्यवस्था का अंधानुकरण किये जाने के भी विरोधी थे। उनके मतानुसार स्वराज तभी सफल होगा जब भारत अपनी जनता की प्रकृति और आवश्यकताओं के अनुरूप शासन-पद्धति विकसित करेगा। गांधी ने इसी आदर्श को रामराज्य कहा। उनके लिए रामराज्य किसी धर्म विशेष की सत्ता नहीं, बल्कि न्याय और नैतिकता पर आधारित जनता की सार्वभौम सत्ता था।
स्वराज केवल शासन-पद्धति का परिवर्तन नहीं, बल्कि कठिनाइयों से जूझने की क्षमता, निरंतर जागरूकता और आत्मनिर्भरता का नाम है। गांधी चाहते थे कि नागरिक छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए सरकार पर निर्भर न रहें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार आत्मनिर्भर बनें। स्वराज की रक्षा के लिए देशभक्ति भी आवश्यक है। गांधी के लिए देशभक्ति का अर्थ केवल देश के प्रति भावनात्मक लगाव नहीं था; इसका अर्थ था अपने निजी स्वार्थ से ऊपर देश और समाज के कल्याण को महत्व देना।
गांधी का हिन्द स्वराज किसी बहुसंख्यक समुदाय का नहीं, सबका और न्याय का राज्य था। किसान-मजदूर, धनवान-गरीब, हिन्दू-मुसलमान, सिख-ईसाई सभी को समान दर्जा मिले और धर्म, जाति या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो। प्रत्येक व्यक्ति को अन्न, वस्त्र और आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध हों। गांधी के स्वराज की अंतिम कसौटी केवल राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था नहीं, मानव कल्याण थी। लोगों को सुखी बनाने के साथ उनकी बौद्धिक और नैतिक उन्नति भी ध्येय होना चाहिए। ईश्वर की दी हुई प्राकृतिक संपदा किसी व्यक्ति या व्यवसाय के हाथों दूसरों के शोषण का साधन न बने। प्रत्येक मनुष्य को सम्मानपूर्वक जीवित रहने का अधिकार है।
गांधी के स्वराज की यह व्यापक अवधारणा उनके व्रतों से भी जुड़ती है—शरीर-श्रम, समानता, संरक्षकता, विकेंद्रीकरण, स्वदेशी, स्वावलंबन, सहयोग, सत्याग्रह, सर्वधर्म-समभाव, पंचायती राज और नई तालीम। इनका उद्देश्य केवल व्यक्ति के जीवन को अनुशासित करना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना था जिसमें सत्ता का केंद्रीकरण, आर्थिक शोषण और सामाजिक भेदभाव न्यूनतम हों तथा नागरिक अपने जीवन और समाज के निर्माण में स्वयं सहभागी बनें। गांधीजी ने शरीर-श्रम को विशेष महत्व दिया।
बौद्धिक कार्य को शारीरिक श्रम से कम न मानते हुए भी वे प्रत्येक व्यक्ति से प्रतिदिन शरीर-श्रम की अपेक्षा करते थे; बिना श्रम किए भोजन करना उन्हें अनुचित लगता था। उनके एकादश व्रतों में 'संरक्षकता' की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। आर्थिक समानता के लिए गांधी ने मार्क्सवाद का अहिंसक विकल्प ट्रस्टीशिप को माना, जिसमें संपत्ति का स्वामी स्वयं को उसका मालिक नहीं, समाज का संरक्षक समझता है। इस विचार की झलक विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में दिखाई दी, लेकिन गांधी की इस कल्पना को व्यापक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में रूपांतरित करने के प्रयास सीमित ही रहे।
आज़ादी के बाद आज एक बार फिर स्वराज को लेकर बहस हो रही है। ऐसे में अपनी शासन-पद्धति का पुनरावलोकन आवश्यक है। हम गांधी की स्वराज संबंधी व्यापक आकांक्षाओं को संविधान में पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर सके, लेकिन समय-समय पर हुए संवैधानिक संशोधनों और कानूनों ने स्वराज की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भूमि सुधार, पंचायती राज, मनरेगा और सूचना का अधिकार जैसे प्रयास गांधी के आर्थिक स्वावलंबन, ग्राम स्वराज और सजग नागरिक की उस कल्पना के निकट दिखाई देते हैं, जिसमें जनता केवल शासित नहीं, बल्कि शासन पर निगरानी रखने वाली शक्ति भी है। फिर भी गांधी के स्वराज की कसौटी पर देखें तो यह यात्रा अभी अधूरी है।
लोकतंत्र ने हमें मतदान का अधिकार दिया, लेकिन गांधी के स्वराज की कसौटी केवल मतदान तक सीमित नहीं थी। प्रश्न यह है कि क्या नागरिक अपने जीवन, समाज और शासन से जुड़े निर्णयों में वास्तविक भागीदारी कर पा रहा है? क्या वह सत्ता के दुरुपयोग का प्रतिकार करने में सक्षम है? क्या आर्थिक विकास ने आत्मनिर्भरता और समानता बढ़ाई है या निर्भरता और असमानता भी? क्या ग्राम पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिलने के बावजूद निर्णय और संसाधनों का पर्याप्त अधिकार गांवों तक पहुंचा है? क्या स्त्री-सशक्तिकरण वास्तव में धरातल पर उतरा है? आज 'जेन जी' और 'जेन अल्फा' के बीच उभरता जनाक्रोश और अपनी बात के लिए आवाज उठाने की प्रवृत्ति इसी सजग नागरिकता का नया रूप भी हो सकती है। यह हमें याद दिलाती है कि स्वराज केवल संविधान में लिखी व्यवस्था नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की निरंतर सक्रियता है।
( लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)


