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बढ़ते शहरीकरण में पिछड़ता कचरा प्रबंधन

आजादी के बाद भारत के हर क्षेत्र में विकास के साथ-साथ बहुत सी समस्याएं भी खड़ी हुई हैं जिनका स्थाई समाधान अभी तक नहीं हो पाया है

बढ़ते शहरीकरण में पिछड़ता कचरा प्रबंधन
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  • अशोक चौधरी

हाल की प्रदूषित पानी की दुर्घटना और नतीजे में करीब दस लोगों की मौतें और सैकडों की बीमारी ने इंदौर की साफ-सफाई पर धब्बा लगा दिया है। एक तरफ, 'स्वच्छता सर्वेक्षणों' में वर्ष 2016 से इंदौर लगातार शीर्ष पर बना हुआ है। यहां कचरा पृथक्करण, 'डोर टू डोर कलेक्शन,' आधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट, बायोएनर्जी और कंपोस्टिंग, प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन इत्यादि बहुत सी तकनीकें हैं जिनसे जनभागीदारी पर आधारित 'इंदौर मॉडल' सामने आया है।

आजादी के बाद भारत के हर क्षेत्र में विकास के साथ-साथ बहुत सी समस्याएं भी खड़ी हुई हैं जिनका स्थाई समाधान अभी तक नहीं हो पाया है। इनमें शहरों के ठोस कचरे का प्रबंधन एक गंभीर समस्या है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में शहरी आबादी 30 प्रतिशत थी और इसके 2030 तक 40 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है। शहरी आबादी लगभग 2.3 प्रतिशत सलाना की दर से बढ़ रही है और इससे आर्थिक सामाजिक परिदृश्य में भी तेजी से बदलाव हो रहे हैं। बढती जनसंख्या के कारण पर्याप्त आवास, परिवहन और अन्य सेवाओं की कमी के साथ-साथ कचरा प्रबंधन भी एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है।

आज भारत के जितने बड़े शहर हैं वहां उतने ही बडे कचरे के ढ़ेर मिलेंगे। दिल्ली का गाजीपुर, मुंबई का देवनार लैंडफिल कचरे के पहाड़ बन चुके हैं जिनसे निकलने वाली मीथेन गैस आसपास के निवासियों में विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करती है। इससे न केवल मानवीय स्वास्थ्य पर असर पड़ता है, बल्कि वहां की मिट्टी और हवा भी बुरी तरह से प्रदूषित होती है। गाजीपुर लैंडफिल से प्रतिवर्ष 3000 टन से अधिक मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि गाजीपुर और देवनार लैंडफिल के पड़ौस में बसे लोगों में अस्थमा और ब्रोंकाइटिस की 30 प्रतिशत वृद्धि हुई है और श्वसन की अन्य बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही हैं। हम इस समय 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन कचरा प्रबंधन चुनौती बनकर हमारे सामने खड़ा है। वर्तमान में यह लगभग 14.50 करोड़ टन प्रतिवर्ष की दर से पैदा हो रहा है और 2047 तक इसके 26 से 30 करोड़ टन प्रतिवर्ष तक पहुंचने की संभावना है। हालांकि 'स्वच्छ भारत मिशन' के तहत गोबर को खाद और बायोगैस में बदलने तथा प्रबंधित करने की केंद्रीय योजना 'गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन' (गोबर-धन योजना) जैसी कोशिशों से रचनात्मक काम किया जा रहा है, लेकिन जिस मात्रा में ठोस कचरा पैदा हो रहा है, उसका निपटान नहीं हो पा रहा है।

भारत में 'पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986' और 'ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016' के तहत एक नियमावली बनाई गई है, लेकिन उसका प्रभावशाली क्रियान्वयन होना आवश्यक है, ताकि व्यक्तिगत स्तर पर इस समस्या के समाधान हेतु जागरूकता पैदा हो सके। हालांकि नगरपालिकाओं द्वारा घर-घर कचरा संग्रहण एवं डंपिंग स्टेशनों पर ऐसी व्यवस्थाएं की जाती हैं ताकि उसका कंपोस्ट बनाने में उपयोग किया जा सके, लेकिन घरेलू और संस्थागत स्तर पर कचरे का पृथक्करण नहीं किया जा रहा है। सभी प्रकार के कचरे को एक ही डस्टबिन में डाल दिया जाता है जो आगे जाकर बड़ी समस्या पैदा करता है।

ठोस कचरे में बड़ा भाग ऐसा होता है जिससे कंपोस्ट खाद बनाई जा सकती है। यदि घरेलू स्तर पर ही उस कचरे का पृथक्करण प्रारंभ कर दिया जाए तो नगरपालिकाओं के डंपिंग स्टेशनों पर दबाव कम पड़ेगा। नागरिकों में जागरूकता और व्यावहारिक अनुपालन की कमी के साथ ही नगरपालिकाओं के पास भी वित्त और तकनीकी संसाधनों की कमी है जिससे इस समस्या के समाधान में कई समस्याएं आ रही हैं। आज भारत के तमाम शहरों, गांवों, मोहल्लों में कचरे के ढेर देखने मिलते हैं, जबकि वहां प्रतिदिन कचरा संग्रहण के लिए गाड़ियां आती हैं। शहरों में इधर-उधर फैल रहा सिंगल-यूज प्लास्टिक और अन्य कचरा मानव सभ्यता पर कलंक के समान है।

उदाहरण के लिए मुंबई शहर में प्रतिदिन 10,000 मेट्रिक टन कचरा पैदा होता है। यह शहर ई- कचरा में भी अग्रणी है। ऐसे में नगर-निकाय कितना भी प्रयास कर लें, नागरिक भागीदारी के बिना कचरा प्रबंधन नहीं हो सकता। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली अकादमिक प्रकाशनों में से एक 'नेचर जर्नल' के अनुसार भारत विश्व में सबसे बड़ा प्लास्टिक प्रदूषक है जहां से प्रतिवर्ष 93 करोड़ टन प्लास्टिक अपशिष्ट, जो विश्व का लगभग 20 प्रतिशत है, उत्पादित होता है। इसमें अधिकांश भाग सिंगल-यूज प्लास्टिक का है।

'केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' (सीपीसीबी) के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत में अपशिष्ट उत्पादन बढ़कर 165 मेट्रिक टन हो जाएगा। 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' (सीएसई) द्वारा साल 2020 में किए गए शोध के अनुसार भारत में 3159 कचरे के पहाड़ हैं जिनमें 80 करोड़ टन कचरा मौजूद है। 'संयुक्त राष्ट्र संघ' द्वारा तय किए गए 17 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स' (एसडीजी) में सभी के लिए स्वच्छ जल और स्वच्छ भूमि के दो प्रमुख लक्ष्य भी हैं जिनमें ठोस कचरा प्रबंधन भी शामिल है।

हाल की प्रदूषित पानी की दुर्घटना और नतीजे में करीब दस लोगों की मौतें और सैकडों की बीमारी ने इंदौर की साफ-सफाई पर धब्बा लगा दिया है। एक तरफ, 'स्वच्छता सर्वेक्षणों' में वर्ष 2016 से इंदौर लगातार शीर्ष पर बना हुआ है। यहां कचरा पृथक्करण, 'डोर टू डोर कलेक्शन,' आधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट, बायोएनर्जी और कंपोस्टिंग, प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन इत्यादि बहुत सी तकनीकें हैं जिनसे जनभागीदारी पर आधारित 'इंदौर मॉडल' सामने आया है। इसमें कचरे से ऊर्जा और खाद भी बनाई जा रही है। 'पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप' (पीपीपी) मॉडल पर 'ग्रीन वेस्ट प्लांट' लगाया गया है और उन्नत लैंडफिल और 'बायो-रेमेडिएशन' किया गया है।

इन तमाम प्रयासों के बावजूद शहर में प्रदूषित पानी का संकट गंभीर बना हुआ है। जाहिर है, इंदौर का साफ-सफाई में अव्वल रहना उतना चमकदार नहीं है, जितना सार्वजनिक रूप से बताया जा रहा है। कहा जाता है कि इंदौर में स्वच्छता की वजह जनभागीदारी और जागरूकता है। इंदौर के निवासियों ने स्वच्छता को एक आदत बनाया है और इस कारण इंदौर में स्वच्छता एक सांस्कृतिक मानदंड बन गई है, लेकिन हाल की दुखद दुर्घटना ने स्वच्छ इंदौर बनाने में लगे प्रशासन, समाज और राजनेताओं पर कई सवाल खडे कर दिए हैं।

(लेखक 'सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी' के 2013 से सदस्य एवं 'पाठक मंच' के सचिव हैं।)


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