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दक्षिण एशिया सुरक्षा पर वाशिंगटन का आक्रामक रवैया भारत के लिए भी सिरदर्द

12 फरवरी के राष्ट्रीय चुनाव में अपनी पार्टी की शानदार जीत के बाद बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान को बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बने हुए सिर्फ़ एक हफ़्ता हुआ है

दक्षिण एशिया सुरक्षा पर वाशिंगटन का आक्रामक रवैया भारत के लिए भी सिरदर्द
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  • नित्य चक्रवर्ती

बीजिंग बांग्लादेश में हो रहे विकासक्रम पर करीब से नजऱ रख रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुद डॉ. यूनुस से उनकी बैठक में मिले और बांग्लादेश के साथ रिश्ते बढ़ाने में व्यक्तिगत दिलचस्पी दिखाई ताकि यह दक्षिण एशियाई देश चीनी मदद से अच्छी-खासी नौकरियां पैदा कर सके। चीन नहीं चाहेगा कि अमेरिका के दबाव की वजह से उसके समझौते रद्द हो जाएं।

12 फरवरी के राष्ट्रीय चुनाव में अपनी पार्टी की शानदार जीत के बाद बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान को बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बने हुए सिर्फ़ एक हफ़्ता हुआ है। 60 साल के प्रधानमंत्री, जो ब्रिटेन में 17 साल के देश निकाला के बाद स्वदेश लौटे हैं, से उम्मीद की जा रही थी कि वे देश की खराब अर्थव्यवस्था और इसके प्रशासन को फिर से दुरुस्त करने को सबसे ज़्यादा प्राथमिकता देंगे, लेकिन उनके ध्यान का केन्द्र अचानक बदल गया है, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका प्रशासन बहुत ज़्यादा सक्रिय हो गया है और नई सरकार से चीन के खिलाफ़ रूख अपनाने के लिए कहकर बांग्लादेश के अंदरूनी मामलों में दखल दे रहा है।

अमेरिका की तरफ़ से ऐसा खुला दावा हाल के महीनों में नहीं देखा गया है। असल में, अंतरिम सरकार के पहले के आधे समय में अमेरिकी दूतावास के अधिकारी इतने सक्रिय नहीं थे, लेकिन 12 फरवरी के चुनाव पास आते ही हालात बदल गए। बांग्लादेश को लेकर ट्रंप प्रशासन के नज़रिए में अचानक बदलाव आया। नए अमेरिकी राजदूत ब्रेंटक्रिस्टेंसन ने इस साल 12 जनवरी को ढाका में अपना कार्यभार संभाला, अर्थात 12 फरवरी के चुनाव से ठीक एक महीना पहले। तब सेब्रेंट समेत अमेरिकी अधिकारी बीएनपी और जमात दोनों नेताओं को साध रहे हैं ताकि चीनी राजदूत योवेन को मात दी जा सके, जो पिछले तीन सालों से ढाका में सक्रिय हैं और सरकार और राजनीतिक पार्टियों के हर स्तर पर बड़े सम्पर्क बना रहे हैं।

प्रधानमंत्री तारिक रहमान और उनके विदेश मंत्री खलीलुर रहमान के पद संभालने के बाद, जो एक बहुत अनुभवी विदेश सेवा अधिकारी थे, ने हमेशा की तरह तीन बड़े देशों भारत, अमेरिका और चीन के साथ रिश्तों की पुनर्समीक्षा की और बांग्लादेश के फायदे के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए, इस पर बात की। अभी-अभी घोषित अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौते की समीक्षा पर भी चर्चा हुई। तीनों बड़े देशों के साथ रिश्तों में संतुलन बनाने के मुद्दे दृष्टिपटल पर थे।

जब शनिवार 21 फरवरी को शुरुआती बातचीत चल रही थी, तो अमेरिकी राजदूत ब्रेंटक्रिस्टेंसन ने बिना बांग्लादेश का नाम लिए एक कड़े बयान में कहा कि, वह दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते असर को लेकर परेशान हैं। ट्रंप की तरफ से तारिक को भेजे गए पत्र में यह भी कहा गया था कि अमेरिका-बांग्लादेश साझेदारी आपसी सम्मान और एक मुक्त और खुला भारत-प्रशांत को बढ़ावा देने में एक जैसे फायदे पर आधारित है। इसका असल में मतलब है कि अमेरिका अब चीन के खिलाफ अपनी भारत-प्रशांत सुरक्षा रणनीति में बांग्लादेश को एक भागीदार के तौर पर चाहता है, ठीक वैसे ही जैसे ट्रंप ने अपनी चीन विरोधी सुरक्षा रणनीति में भारत को एक भागीदार के तौर पर शामिल किया है।

इस प्रकार तारिक रहमान के लिए, अपनी स्थिति को स्थिर किये जाने से पहले ही, उन्हें अमेरिका की तरफ से यह धमकी मिल रही है कि अगर नई सरकार अमेरिका के साथ बेहतर रिश्ते बनाना चाहती है, तो उसे चीन के खिलाफ अमेरिका की रणनीति का हिस्सा बनना होगा। ज़ाहिर है, अगले दिन चीन ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी, जब चीनी दूत योवेन ने बांग्लादेश के विदेश मंत्री से मुलाकात की और कहा कि चीन बांग्लादेश की 'सर्वप्रथम बांग्लादेश नीतिÓ को मानने की घोषणा की तारीफ़ करता है और ढाका को चीन का सहयोग हर जगह होगा और यह किसी तीसरे देश के खिलाफ़ नहीं है।

तारिक सरकार ढाका की धरती से अमेरिकी दूतावास के चीन विरोधी रवैये से बहुत शर्मिंदा है, लेकिन सरकार अमेरिका को बड़े भाई की भूमिका निभाने से रोकने के लिए बहुत कम काम ही कर सकती है। ढाका में राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि बांग्लादेश और चीन के बीच पिछले रक्षा समझौते से अमेरिका चिंतित है। अमेरिका चाहता है कि बांग्लादेश रक्षा सहयोग के लिए चीन के साथ अपनी भविष्य की बातचीत को आगे न बढ़ाए।

जहां तक धारणा का सवाल है, बांग्लादेश के लोग ज़्यादातर भारत और अमेरिका दोनों के खिलाफ़ भावनाएं रखते हैं। 5 अगस्त, 2024 को हसीना सरकार के गिरने के बाद से पिछले अठारह महीनों में, अमेरिका के लिए भावनाओं में गिरावट की तुलना में लोगों के बीच चीन का प्रभाव बढ़ा है। 2025 की शुरुआत में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख डॉ. यूनुस के चीन दौरे में, बांग्लादेश के अलग-अलग जिलों में औद्योगिक क्षेत्र बनाने में चीन के निवेश में एक बड़ी कामयाबी मिली। बांग्लादेश में भारतीय सीमा के पास ड्रोन के लिए एक फैक्टरी लगाने का समझौता हुआ। तारिक सरकार से अब अमेरिका ने उस समझौते की नए सिरे से समीक्षा करने को कहा है।

हाल ही में हस्ताक्षरित हुए अमेरिकी व्यापार समझौते की एकतरफ़ा शर्तों ने दिखाया है कि कैसे नए बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान को वॉशिंगटन और बीजिंग के साथ रिश्तों को लेकर एक नाजुक संतुलन बनाने के चुनौतीपूर्ण कार्य से जूझना पड़ रहा है, क्योंकि दोनों उनके देश में असर डालने की होड़ में हैं। एक तरफ, अमेरिका अपने बाजार तक पहुंच, सुरक्षा सहयोग और विनियामक लाभ का प्रचार कर रहा है, तो दूसरी ओर चीन अवसंरचना, औद्योगिक समेकीकरण और रक्षा उपकरणों की आपूर्ति का वादा कर रहा है।

चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और एक बड़ा अवसंरचनात्मक निवेशक बना हुआ है, जो बंदरगाहों के आधुनिकीकरण से लेकर औद्योगिक क्षेत्रों तक के परियोजनाओं को वित्तपोषित कर रहा है। अमेरिका बांग्लादेश का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है और लंबे समय से इसका सबसे बड़ा विदेशी निवेशक रहा है, हालांकि प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश (एफडीआई) स्टॉक तेज़ी से गिरा है। जून 2023 तक के वित्तीय वर्ष में लगभग 4 अरब डॉलर से गिरकर सितंबर 2025 तक यह लगभग 1 अरब डॉलर तक नीचे आ गया है, विशेषकर यूनुस राज के दौरान राजनीतिक उथल-पुथल और निवेशकों के कमज़ोर भरोसे की वजह से।

सितंबर 2025 तक बांग्लादेश में चीनी एफडीआई स्टॉक लगभग 3 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। बीजिंग ने कई दूसरे कम विकसित देशों के साथ-साथ बांग्लादेशी निर्यात को शून्य-टैरिफ पहुंच भी दिया है। पहले 2022 में 98 प्रतिशत उत्पादनों को सीमाशुल्क-मुक्त पहुंच दिया और बाद में इस पेशकश को बढ़ाया। चीन बांग्लादेश को एक बड़ी रक्षा प्रणाली आपूर्तिकर्ता के तौर पर अपनी जगह बनाए रखने के लिए बहुत उत्सुक है। अब ट्रंप प्रशासन इस पर एतराज़ कर रहा है। पहले के सालों में ऐसी स्थिति नहीं थी।

बीजिंग बांग्लादेश में हो रहे विकासक्रम पर करीब से नजऱ रख रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुद डॉ. यूनुस से उनकी बैठक में मिले और बांग्लादेश के साथ रिश्ते बढ़ाने में व्यक्तिगत दिलचस्पी दिखाई ताकि यह दक्षिण एशियाई देश चीनी मदद से अच्छी-खासी नौकरियां पैदा कर सके। चीन नहीं चाहेगा कि अमेरिका के दबाव की वजह से उसके समझौते रद्द हो जाएं। तारिक रहमान पर उनके सलाहकारों और थिंक टैंक की तरफ से बहुत ज़्यादा दबाव है कि वे बांग्लादेश प्रथम नीति पर टिके रहें और बीएनपी चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक बांग्लादेश की रणनीतिगत स्वायत्तता को ध्यान में रखकर काम करें। अगले कुछ दिन बताएंगे कि क्या तारिक में अमेरिका के दबाव को नजऱअंदाज़ करने और सिर्फ बांग्लादेश के हितों को ध्यान में रखकर काम करने की हिम्मत है?


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