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युद्धोन्माद और मीडिया

ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स ने अपने पहले पन्ने पर एक मार्मिक और भीतर तक झकझोरने वाली तस्वीर छापी है

युद्धोन्माद और मीडिया
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  • सर्वमित्रा सुरजन

हैरत की बात यह है कि खामेनेई के बाद अब नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई को भी मारने की धमकी ट्रंप और नेतन्याहू ने दी है और इसे सामान्य तरीके से लिया जा रहा है। दरअसल युद्ध के उन्माद में सही-गलत, नैतिक-अनैतिक सारे दायरे ध्वस्त कर दिए गए हैं और शक्तिशाली ही सही है, यह जंगल न्याय मीडिया के जरिए बढ़ाया जा रहा है। याद कीजिए कि 1990-91 के पहले खाड़ी युद्ध में एक मोर्चा मीडिया ने भी खड़ा किया था।

ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स ने अपने पहले पन्ने पर एक मार्मिक और भीतर तक झकझोरने वाली तस्वीर छापी है, जिसमें दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर के एक स्कूल में मिसाइल हमले में मारी गई मासूम बच्चियों की तस्वीरें हैं। अकाल मौत की शिकार इन बच्चियों की तस्वीरों के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक संदेश है कि, 'ट्रम्प, उनकी आंखों में आंखें डालकर देखिए। इसके बाद नीचे लिखा है सैकड़ों ईरानी बच्चों की मौत के बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति अभी भी मीनाब के प्राथमिक विद्यालय पर बमबारी से इनकार कर रहे हैं।' अखबार ने इस पहले पन्ने को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर किया है, जिस पर दुनिया भर से भावुक प्रतिक्रियाएं आई हैं। एक यूजर ने लिखा, 'कितनी संभावनाएं मिट गईं, कितने भविष्य शुरू होने से पहले ही खत्म हो गए, कितने फूल खिलने से पहले ही कुचल दिए गए।' एक अन्य टिप्पणी में संघर्ष में शामिल कई लोगों को दोषी ठहराते हुए कहा गया, 'सिर्फ ट्रंप ही नहीं, बल्कि गोली चलाने वाले, मिसाइल बनाने वाले, खुफिया जानकारी मुहैया कराने वाले और अंतत: सभी ट्रंप समर्थक भी दोषी हैं।' वहीं खुद को अमेरिकी नागरिक बताने वाले एक यूज़र ने संघर्ष समाप्त करने की अपील करते हुए लिखा, 'यह जानकर दुख हुआ कि अमेरिका अभी भी मीनाब के प्राथमिक विद्यालय पर हुए बम हमले से इनकार कर रहा है। ट्रंप का इसे स्वीकार करने से इनकार करना जवाबदेही और पश्चाताप की चिंताजनक कमी को दर्शाता है। एक अमेरिकी नागरिक के रूप में, मेरा मानना है कि अब युद्धविराम की मांग करने, इस युद्ध को समाप्त करने और शांति की ओर बढ़ने का समय आ गया है।'

गौरतलब है कि 28 फरवरी को ईरान पर हमले के दौरान ही प्राथमिक स्कूल पर भी मिसाइल गिरी। जिनमें डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चियां, जिनकी उम्र 7 से 12 बरस रही होगी उनकी मौत हो गई। साथ ही स्कूल के कुछ शिक्षकों और कर्मियों की भी मौत हुई है। इन बच्चियों को दफ़्न करने की तस्वीरें भी ईरान से बाहर आई थीं, जिनमें बड़ी संख्या में शोकाकुल लोग जमा हुए थे। ईरान से पहले गज़ा से भी ऐसे कई दारुण दृश्य सामने आ चुके हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि शक्तिशाली लोगों के पास संवेदनाएं नाममात्र को भी नहीं बची हैं। तभी तो वे निहत्थे, मासूम लोगों को क्रूरता से मारने के बावजूद जरा नहीं पछता रहे हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो बड़ी बेशर्मी से इस हमले के लिए ईरान को ही जिम्मेदार ठहरा दिया कि उसी ने टॉमहॉक मिसाइल स्कूल पर गिराई है। यह जवाब एक अमेरिकी पत्रकार के सवाल पर ट्रंप ने दिया था। हालांकि अमेरिकी सैन्य जांचकर्ताओं का मानना है कि लड़कियों के स्कूल पर हमले के लिए अमेरिकी सेना जिम्मेदार हो सकती है। कैलिफोर्निया के गर्वनर गैविन न्यूजॉम ने भी इस हमले के लिए ट्रंप को दोषी ठहराया है। लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि अमेरिका 'जानबूझकर किसी स्कूल को निशाना नहीं बनाएगा।' मान लें कि जानबूझकर निशाना नहीं बनाया, लेकिन अनजाने में भी ऐसा हुआ है तो क्या उसकी जिम्मेदारी ट्रंप को नहीं लेनी चाहिए या सैकड़ों बच्चियों के खून से रंगे हाथ लेकर वो अब भी नोबेल शांति पुरस्कार पहनना चाहते हैं। वैसे जिस टॉमहॉक मिसाइल का नाम ट्रंप ने लिया कि ईरान ने उसका इस्तेमाल किया है, वो सरासर झूठ है। टॉमहॉक मिसाइलों का निर्माण फीनिक्स, एरिजोना की आरटीएक्स कंपनी द्वारा किया जाता है। और अमेरिका इन्हें केवल चार देशों को बेचता है: ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और नीदरलैंड। इस समय इनमें से कोई भी देश अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ नहीं खड़ा है। तो जाहिर है कि हमला अमेरिका की तरफ से ही हुआ है।

इस हमले पर न्यूयॉर्क टाइम्स, रॉयटर्स, सीबीएस और वॉशिंगटन पोस्ट जैसे मीडिया संस्थान अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इससे एक बात फिर साबित होती है कि अगर मीडिया ईमानदारी से काम करे तो फिर सच और झूठ की पड़ताल आसान हो जाती है।

इस मामले में भारतीय मीडिया की अवस्था काफी दयनीय लगती है। रोजाना स्क्रीन पर दिखने वाले स्वनामधन्य पत्रकारों के लिए अभी ईरान पर हमला, या उससे पहले गज़ा पर हमला, ऑपरेशन सिंदूर या रूस-यूक्रेन युद्ध टीआरपी बढ़ाने, चिल्ला-चिल्ला कर सच्ची-झूठी बातों का घालमेल करने और पीड़ित से ज्यादा आक्रांता के पक्ष में खड़े होने का ही माध्यम है। जब ये पत्रकार स्क्रीन पर अवतरित होते हैं, तो पीछे बमों और मिसाइलों के बरसने, आग लगने, तबाही के दृश्य लगातार चलते हैं। ऐसा लगता है मानो कोई वीडियो गेम चल रहा है, जिसमें रिमोट की बटन दबाते ही विध्वंस होता है, हर धमाके के साथ पत्रकारों की आवाज़ें तेज हो जाती हैं, जिनमें तथ्य और असली सूचनाएं दब जाती हैं, संवेदनाएं गायब हो जाती हैं, रह जाता है तो बस परपीड़ा सुख, जिसकी लहरों में ये पत्रकार डूबते-उतरते दिखते हैं।

अभी कुछ दिन पहले का ही वाकया है, एक सबसे तेज चैनल पर अमेरिकी प्रेस सचिव कैरोलिन लैविट के हवाले से ब्रेकिंग न्यूज दी गई कि ईरान में अमेरिकी दूतावास में 66 अमेरिकियों को बंधक बनाया गया है। पत्रकार ने चीख-चीख कर बताना शुरु किया कि ईरान ने ये कैसा घातक कदम उठाया है, अब अमेरिका इसका कितना तगड़ा जवाब देगा। उनके साथ बैठे एक पैनलिस्ट ने भी यही विचार पेश किए। गनीमत है कि चर्चा में शामिल एक अन्य पत्रकार ने बताया कि लैविट आज की बात नहीं कर रही 1979 की घटना का जिक्र कर रही हैं। 1979 के बाद से तो ईरान में अमेरिका का दूतावास ही नहीं है। इस जानकारी के बाद 66 अमेरिकियों को बंधक बनाने वाली ब्रेकिंग खबर स्क्रीन से गायब हुई। लेकिन इस घटना से भी शायद कोई सबक इस चैनल या पत्रकार महोदया ने नहीं लिया, क्योंकि अभी फिर एक कार्यक्रम में ईरान के अल मुस्तफा विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर सय्यद जमीन अब्बास से मुज्तबा खामेनेई पर बात करते हुए इस पत्रकार ने कहा कि आप तमीज से बात करिए। अमेरिका जाकर ट्रंप के हमशक्ल के साथ बात करने को बड़ी सफलता मानने वाली इस पत्रकार ने जिस तरीके से ईरान के हालात पर चर्चा की, उसमें अमेरिका के साथ पक्षधरता साफ नजर आई। ईरान में लोकतंत्र क्यों नहीं है, जैसे सवालों से इस पूरे युद्ध को हल्का बनाने की सायास कोशिश की जा रही है। सोचने वाली बात ये है कि खामेनेई की हत्या जैसा गंभीर अपराध जो अमेरिका ने किया अगर वही काम ईरान ने किया होता, अगर किसी ईरानी हमले में अमेरिका के राष्ट्रप्रमुख मारे गए होते तो भी क्या टीवी स्टूडियो में इसी तरह की चर्चा होती। तब तो 'बड़ा आतंकी हमला', 'सभ्यता पर हमला', 'लोकतंत्र पर सीधा वार' मानवता के ख़िलाफ़ अपराध जैसे शीर्षकों के साथ ईरान को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता। अभी आलम ये है कि खामेनेई की हत्या पर नरेन्द्र मोदी ने आज तक शोक नहीं जताया है तो भला उनकी चिरौरी करने वाले चैनल क्यों अमेरिका की इस गलत हरकत पर चर्चा करेंगे।

हैरत की बात यह है कि खामेनेई के बाद अब नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई को भी मारने की धमकी ट्रंप और नेतन्याहू ने दी है और इसे सामान्य तरीके से लिया जा रहा है। दरअसल युद्ध के उन्माद में सही-गलत, नैतिक-अनैतिक सारे दायरे ध्वस्त कर दिए गए हैं और शक्तिशाली ही सही है, यह जंगल न्याय मीडिया के जरिए बढ़ाया जा रहा है। याद कीजिए कि 1990-91 के पहले खाड़ी युद्ध में एक मोर्चा मीडिया ने भी खड़ा किया था, और इससे पूरी दुनिया में युद्ध का कथानक बदला गया। इराक के खिलाफ अमेरिका और उसके साथियों द्वारा छेड़े गए इस युद्ध को तब सीएनएन के जरिए सातों दिन चौबीसों घंटे लाइव कवरेज दी गई। जिससे समाचार रिपोर्टिंग में अभूतपूर्व बदलाव लाया। इस कवरेज ने युद्ध को एक वीडियो गेम की तरह प्रस्तुत किया, जिसमें उलझी जनता ने युद्ध की हिंसक भयावहता पर अत्याधुनिक हथियारों के प्रभाव को मुग्ध होकर देखा। इससे पहले आधे घंटे के समाचार बुलेटिन में खबरों के निष्पक्ष प्रसारण को दर्शक देखते थे, लेकिन इसके बाद वे टीवी पर युद्ध देखने के आदी बना दिए गए। अमेरिका ने इसका खूब फायदा उठाया, पेंटागन ने पत्रकारों की गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के लिए 'नेशनल मीडिया पूल' नीति अपनाई, जिसमें खबरों पर सीधा नियंत्रण होता था। यानी कब क्या दिखाना है, यह सरकार तय करने लगी। इस कवरेज के जरिए जनता को यह दिखाया गया कि युद्ध में आम जन को निशाना नहीं बनाया जा रहा है, हताहत न्यूनतम रखे जा रहे हैं। लेकिन इस दृश्यम से अलग वास्तविकता कुछ और ही थी।

युद्ध के लाइव कवरेज के कारण जनता में उन्माद पैदा किया गया और इसके बाद बाजार को इस उन्माद को भुनाने के लिए विकसित किया गया। आग बरसाती बंदूकें और मिसाइल बच्चों के खिलौने बन गए। कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डगलस केलनर ने अपनी पुस्तक 'द पर्शियन गल्फ टीवी वॉर' में तर्क दिया कि टेलीविजन नेटवर्क और अन्य मीडिया ने घटनाओं का संतुलित विवरण नहीं दिया क्योंकि इससे व्यावसायिक नेटवर्क के व्यापारिक हितों को बढ़ावा नहीं मिला। उनका कहना था कि मीडिया ने युद्ध को एक रोमांचक कहानी के रूप में प्रस्तुत किया- इसे एक नाटकीय, देशभक्तिपूर्ण तमाशे में बदल दिया। यह बात आज भारतीय मीडिया पर भी उतनी ही सटीक बैठती है।


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