मतदान की तारीखों का ऐलान: पर क्या चुनाव होगा भी!
चुनाव आयोग ने 15 मार्च को विधानसभाई चुनावों के अगले चरण की तारीखों की घोषणा कर दी

वर्तमान मामले में तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव पर पर्याप्त संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर जमा होने के बाद, इसके किसी सदन में विचार के लिए स्वीकार किए जाने समेत, अनेकानेक चरणों से क्रमवार आगे बढ़ना बाकी है। इसलिए, इस प्रस्ताव का हश्र क्या होगा इस पर अटकल लगाने का कोई उपयोग नहीं है। वैसे भी जब वर्तमान चुनाव आयोग पर असली आरोप सत्ताधारी भाजपा के साथ पक्षपात करने का है।
चुनाव आयोग ने 15 मार्च को विधानसभाई चुनावों के अगले चरण की तारीखों की घोषणा कर दी। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग ने इन तारीखों की घोषणा करने के लिए, चुनाव में जाने वाले राज्यों के प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव से ऐन पहले के दौरे के पूरे हो जाने का इंतजार किया। इस दौरे में प्रधानमंत्री ने हरेक राज्य में एक ओर परियोजनाओं के उद्ïघाटनों से लेकर घोषणाओं तक का सरकारी काम-काज किया और दूसरी ओर, अपनी पार्टी के पक्ष में राजनीतिक-चुनावी प्रचार किया। अपने चुनाव-पूर्व चुनाव प्रचार के दौरों के इस चक्र में प्रधानमंत्री मोदी ने 11 मार्च को केरल का दौरा किया। 12 मार्च को प्रधानमंत्री तमिलनाडु के दौरे पर रहे। 13 मार्च को असम में प्रधानमंत्री का घोषणा-प्रचार दौरा हुआ और 14 मार्च को प्रधानमंत्री प. बंगाल के दौरे पर पहुंचे, जहां मुश्किल से आधे भरे ब्र्रिगेड मैदान में रैली के साथ, उन्होंने अपने दौरे का समापन किया। और अगले ही दिन चुनाव आयोग ने विधानसभाई चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी।
बेशक, यह कोई पहली बार नहीं हुआ है जब चुनाव की तारीखों की घोषणा और प्रधानमंत्री के चुनाव-पूर्व प्रचार कार्यक्रम की तारीखों में ऐसा सटीक तालमेल हुआ हो। उल्टे, 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी राज की स्थापना के बाद से जितने भी महत्वपूर्ण चुनाव हुए हैं, उन सभी में यह सचेत तालमेल देखने को मिला है। वास्तव में अब तो यह इस हद तक सामान्य बनाया जा चुका है कि शुरू में कुछ चुनावों के मामले में इस पर सवाल उठाए जाने के बाद, धीरे-धीरे न सिर्फ मीडिया तथा टीकाकारों ने, बल्कि विरोधी राजनीतिक पार्टियों तक ने इस पर सवाल उठाना तक बंद कर दिया है। हैरानी की बात नहीं है कि इस बार भी, सोशल मीडिया पर छुटपुट टिप्पणियों को छोड़कर, चुनाव आयोग की इस कारगुजारी को शायद ही किसी ने ध्यान देने लायक समझा हो।
लेकिन, ऐसा होने से चुनाव आयोग के इस खेल में निहित बेईमानी, किसी तरह से छोटी या महत्वहीन नहीं हो जाती है। उल्टे यह तो इसी का इशारा करता है कि किस तरह, चुनाव आयोग से एक संवैधानिक निकाय के रूप में स्वतंत्र तथा निष्पक्ष तरीके से काम करने की अपेक्षाएं, अब समाप्तप्राय: हैं। इसे देखते हुए हैरानी की बात नहीं है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार, वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त, ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के खिलाफ, लगभग समूचा विपक्ष औपचारिक रूप से अपना 'अविश्वास' जताने के लिए तैयार हो गया है और उसे हटाने के लिए संसद के सामने विधिवत रूप से प्रस्ताव लाया गया है।
सवाल यह नहीं है कि विपक्ष के चुनाव आयोग के खिलाफ इस तरह के कदम के सफल होने की कोई संभावनाएं हैं भी हैं या नहीं? भारत के संविधान निर्माताओं ने, जनतंत्र के लिए स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव की और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिए, हर प्रकार के दबावों से सुरक्षित चुनाव आयोग सुनिश्चित करने की मंशा से, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को हटाए जाने की प्रक्रिया को, पर्याप्त से अधिक कठिन बनाया है। हालांकि, संसद के हाथों में यह अधिकार सौंपा गया है, लेकिन संसद भी कोई साधारण बहुमत से चुनाव आयुक्तों को नहीं हटा सकती है। इसकी प्रक्रिया वैसी ही जटिल तथा अर्द्घ-न्यायिक है, जैसी उच्चतर न्यायालय के न्यायाधीशों के मामले में इंपीचमेंट की प्रक्रिया होती है।
वर्तमान मामले में तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव पर पर्याप्त संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर जमा होने के बाद, इसके किसी सदन में विचार के लिए स्वीकार किए जाने समेत, अनेकानेक चरणों से क्रमवार आगे बढ़ना बाकी है। इसलिए, इस प्रस्ताव का हश्र क्या होगा इस पर अटकल लगाने का कोई उपयोग नहीं है। वैसे भी जब वर्तमान चुनाव आयोग पर असली आरोप सत्ताधारी भाजपा के साथ पक्षपात करने का है, संसद के दोनों सदनों में सत्तापक्ष की संख्या को देखते हुए, किसी चमत्कार से ही इस प्रस्ताव को कामयाबी मिल सकती है, अन्यथा इसका विफल होना तो तय ही है। इसके बावजूद, जिसमें इस प्रस्ताव का विफल होना तयशुदा होना भी शामिल है, इस प्रस्ताव का रखा जाना निरर्थक नहीं है।
इस प्रस्ताव का रखा जाना, मौजूदा हालात पर आलोचना की एक नैतिक आवाज है, जहां सत्ताधारी भाजपा और उसकी मोदीशाही ने, जनतंत्र को चलाने वाली सभी संस्थाओं को इस तरह भीतर से खोखला कर दिया है कि, उनकी साख ही खत्म हो गयी है। वर्तमान की विद्रूपताओं की ऐसी नैतिक आलोचना पेश करना ही, विपक्ष का असली काम है। वैसे तो जनमत निर्माता के रूप में मीडिया का भी यही काम है, लेकिन मोदीशाही ने एक संस्था के रूप में मीडिया को पहले ही इस कदर खोखला कर दिया है कि वह वर्तमान की आलोचना करना भूल ही गया है और सिर्फ सत्ताधारियों की खुशामद करने के लायक रह गया है। प्रसंगवश कहते चलें कि ऐसी ही नैतिक आलोचना प्रस्तुत करने का काम, संसद के चालू सत्र में लोकसभा स्पीकर, ओम बिड़ला के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव ने किया था, जो कि स्वतंत्र भारत के इतिहास का इस तरह का तीसरा ही प्रस्ताव था। बेशक, वह अविश्वास प्रस्ताव विफल हो गया और ओम बिड़ला लोकसभा स्पीकर के पद पर बने हुए हैं।
याद रहे कि इससे पहले, राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी सदन में उनके पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए, अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन, उस प्रस्ताव को सदन में विचार के लिए स्वीकार ही नहीं किया गया, हालांकि इसके कुछ ही समय बाद धनखड़ ने अचानक राज्यसभा के सभापति तथा उपराष्टï्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके कारणों को लेकर अब तक रहस्य बना ही हुआ है। अगर अविश्वास की इस तरह की अभिव्यक्तियां, वर्तमान व्यवस्था की जनतांत्रिक आलोचना का बहुत ही जरूरी हिस्सा हैं, तो बार-बार इस तरह अविश्वास जताए जाने की नौबत आना, बेशक वर्तमान जनतांत्रिक व्यवस्था के संकट की गहराई को दिखाता है। और अविश्वास की ऐसी अभिव्यक्तियों को भी अनसुना कर के मौजूदा व्यवस्था का उसी रास्ते पर चलते रहना, मिसाल के तौर पर ओम बिड़ला का या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश गुप्ता का, अपने ओहदे का पहले जितना ही पक्षपातपूर्ण तरीके से उपयोग करते रहना, वर्तमान शासन द्वारा रचे गए इस संकट के वर्तमान शासन के रहते असाध्य होने को ही दिखाता है।
खैर! विधानसभाई चुनावों के आगामी चक्र पर लौटें, जिसकी तारीखों की 15 मार्च को चुनाव आयोग ने घोषणा की है। इन तारीखों को तय करने में भी चुनाव आयोग की अतार्किक मनमानी की ओर अनेक टिप्पणीकारों ने ध्यान खींचा है। मिसाल के तौर पर असम, केरल तथा पुडुचेरी के चुनाव, एक ही चरण में 9 अप्रैल को हो जाएंगे। इसके पूरे 14 दिन बाद, 23 अप्रैल को तमिलनाडु के चुनाव होंगे और प. बंगाल के पहले चरण के चुनाव होंगे। प. बंगाल के दूसरे चरण के चुनाव 29 अप्रैल को होंगे और इसके पांच दिन बाद, 4 मई को वोटों की गिनती की जाएगी। इसका नतीजा यह है कि असम, केरल तथा पुडुचेरी को मतदान के बाद, नतीजों के लिए पूरे 25 दिन इंतजार करना पड़ेगा। ऐसा क्यों? अनेक टिप्पणीकारों ने इस पर भी सवाल उठाए हैं कि आखिरी चरण के मतदान और मतगणना के बीच पांच दिन का अंतर क्यों? जब ईवीएम से पहले के जमाने में, मतदान के एक-डेढ़ दिन में ही मतगणना शुरू हो जाती थी, तो ईवीएम मशीनों के जमाने में मतदान और मतगणना में इतना लंबा अंतराल क्यों जरूरी है? यह भी याद दिला दें कि विशेष रूप से 2024 के आम चुनाव के बाद से, चुनाव आयोग ने मतदान की शाम के बाद, मतगणना के दिन तक मत फीसद का आंकड़ा बढ़ाने को जैसे नियम ही बना लिया है, जिसका कोई विश्वसनीय स्पष्टïीकरण अब तक नहीं दिया गया है। इसी प्रकार कोई विश्वसनीय स्पष्टïीकरण, कुल डाले गए वोटों और गिने गए वोटों की संख्या बेमेल होने की, अधिकांश चुनाव क्षेत्रों में सामने आने वाली समस्या का भी नहीं दिया गया है। चुनाव आयोग के आम पक्षपातीपन के साथ जुड़कर यह सब, चुनाव की पूरी प्रक्रिया को ही गहरे संदेहों के घेरे में ले आता है।
और अंत में एक बात और। खासतौर पर प. बंगाल और असम में प्रधानमंत्री के 13-14 मार्च के दौरे और उसके पहले गृहमंत्री अमित शाह के दौरों से साफ हो गया है कि भाजपा, कम से इन दोनों राज्यों में यह चुनाव सबसे बढ़कर तथाकथित बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर लड़ने जा रही है, जो मुस्लिमविरोधी प्रचार और लामबंदी का ही दूसरा नाम है। प्रधानमंत्री ने 'रोटी, माटी, बेटी पर खतरे' का नारा भी दे दिया है। 2024 के आम चुनाव के समय से ही खुद प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाजपा, इस खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक मंच का लगातार सहारा ले रही है। बिहार के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में सांप्रदायिक धु्रवीकरण के लिए खासतौर पर इसका सहारा लिया गया था। लेकिन, जो चुनाव आयोग आम चुनाव के बाद से सत्ताधारी पार्टी को इस सांप्रदायिक दुहाई का बेरोक-टोक इस्तेमाल करने दे रहा है, क्या अचानक अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगा और सत्ताधारी पार्टी की इस बढ़ती प्रवृत्ति को रोकेगा? याद रहे कि चुनाव में सांप्रदायिक दुहाई का सहारा लेना, एक चुनावी अपराध है।
यह भी याद रहे कि प. बंगाल में चुनाव आयोग की एसआईआर की मनमानी ने, जिसे केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का ही आशीर्वाद हासिल नहीं है, (जिसका घुसपैठिया राग ही इस मनमानी के केंद्र में है), जिसे सुप्रीम कोर्ट का भी अनुमोदन हासिल है, पचास लाख से ज्यादा मतदाताओं के मताधिकार पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं। 'न्यायाधीन' के नाम पर संदेह की सूची में डाले गए ये पचास लाख से ज्यादा नाम, 2024 के आम चुनाव की मतदाता सूचियों में पचास लाख से ज्यादा नाम काटे जाने के ऊपर से हैं। मतदाता सूचियों की ऐसी चीर-फाड़ के बाद, क्या जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति के रूप में, चुनाव को कोई अर्थ भी रह जाएगा?
(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


