Top
Begin typing your search above and press return to search.

केंद्रीय सत्ता की जीत, जनतंत्र की हार!

चुनावी मतगणना की विशेष रूप से धीमी रफ्तार, चुनावों के इस चक्र की असली समस्या नहीं है।

केंद्रीय सत्ता की जीत, जनतंत्र की हार!
X
  • राजेंद्र शर्मा

चुनावी मतगणना की विशेष रूप से धीमी रफ्तार, चुनावों के इस चक्र की असली समस्या नहीं है। यह तो एक लक्षण है, चुनाव आयोग के अपनी उस मूल संकल्पना से पूरी तरह से पीछा छुड़ाकर, सत्ताधारी भाजपा के राजनीतिक-चुनावी हितों को आगे बढ़ाने का एक घातक हथियार बन जाने का, जबकि उससे चुनाव प्रक्रिया तथा जनतंत्र के मुख्य हितधारकों के रूप में, सभी राजनीतिक पार्टियों का भरोसा जीतते हुए काम करने वाले, रेफरी की भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है।

विधानसभा चुनाव के मौजूदा चक्र के संबंध में और खासतौर पर प. बंगाल के संबंध में जो बदतरीन आशंकाएं जतायी जा रही थीं, सच साबित होती नजर आती हैं। भाजपा पहली बार पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज होने की ओर बढ़ती नजर आ रही है। बेशक, पूरी तरह से अपनी साख खो चुके चुनाव आयोग ने, मतगणना में अपनी बची-खुची साख की भी बलि चढ़ा दी है। पहले बंगाल की ही बात करें तो मतगणना के दिन दोपहर बाद, साढ़े तीन बजे तक 294 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 3 सीटों के नतीजे चुनाव आयोग के वेबसाइट पर जारी किए गए थे। बेशक, चुनाव आयोग के वेबसाइट पर 200 सीटों पर लीड की जानकारी भी आ चुकी थी, लेकिन इस समय तक कुल वोट में से आधे से कुछ ही ज्यादा वोटों की गिनती हो पायी थी। हैरानी की बात नहीं है कि इस चुनाव में केंद्र की सत्ताधारी भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी, तृणमूल कांग्रेस चुनाव आयोग पर मतगणना जान-बूझकर धीमी करने से लेकर, उसकी चुनावी रूप से मजबूत सीटों पर मतगणना की स्थिति छुपाने तक के आरोप लगा रही थी। याद दिला दें कि मतगणना की यह मंथर चाल, सिर्फ प. बंगाल में ही नहीं थी। यह तो जैसे चुनाव आयोग का नया नार्मल ही है। तभी तो पुड्डुचेरी जैसे छोटे राज्य (वास्तव में विधानसभा युक्त केंद्र शासित क्षेत्र) तक में, इस समय तक 25 में से कुल 17 सीटों के ही नतीजे जारी किए जा सके थे और बाकी 8 सीटों पर लीड ही बतायी जा रही थी।

बहरहाल, चुनावी मतगणना की विशेष रूप से धीमी रफ्तार, चुनावों के इस चक्र की असली समस्या नहीं है। यह तो एक लक्षण है, चुनाव आयोग के अपनी उस मूल संकल्पना से पूरी तरह से पीछा छुड़ाकर, सत्ताधारी भाजपा के राजनीतिक-चुनावी हितों को आगे बढ़ाने का एक घातक हथियार बन जाने का, जबकि उससे चुनाव प्रक्रिया तथा जनतंत्र के मुख्य हितधारकों के रूप में, सभी राजनीतिक पार्टियों का भरोसा जीतते हुए काम करने वाले, रेफरी की भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है। चुनाव आयोग की इसी असंवैधानिक भूमिका के विभिन्न पहलू विधानसभा चुनावों के इस चक्र में और सबसे बढ़कर प. बंगाल तथा असम में सामने आए हैं, जिन्हें जीतने की उम्मीद में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

इस सिलसिले में प. बंगाल में जिस तरह, इस चुनाव की पूर्व-संध्या में मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण के नाम पर, लाखों की संख्या में वैध मतदाताओं के नाम काटने की मुहिम चलायी गयी थी, बंगाल के सवा करोड़ से ज्यादा मतदाताओं पर नागरिकता सत्यापन जैसी कसरत थोपी गयी थी और जिस तरह इस सब के चलते, अंतत: 25 लाख मतदाताओं को 2026 के विधानसभा चुनाव में मताधिकार से वंचित ही नहीं कर दिया गया है, आगे के लिए उनकी नागरिकता-मताधिकार पर सवालों का घेरा लगा छोड़ दिया गया है, उसके संंबंध में हम पहले भी इस स्तंभ में चर्चा कर चुके हैं। चुनाव आयोग की जिद पर और शीर्ष न्यायपालिका के अनुमोदन से, जिस तरह लाखों लोगों का मताधिकार छीना गया है, उसने जनतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में चुनाव को जिस तरह से विकृत किया है बल्कि एक तरह से चुनाव का अपहरण ही कर लिया है, वह भारतीय जनतंत्र के इतिहास में एक नये रसातल के छुए जाने को दिखाता है।

केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के बंगाल फतेह करने के इस अभियान में जिस तरह पूरे तंत्र को जोता गया था और खासतौर पर शासन के पूरे दमनतंत्र को थोपा गया था, उसने प. बंगाल के ही तीन दशक से ज्यादा पहले के एक चुनाव की याद दिला दी। यह और भी उपयुक्त था कि प. बंगाल में ऐसा पहले भी हो चुका होने की याद, प्रख्यात भारतीय कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के पुर्नप्रकाशन के माध्यम से दिलायी गयी। यह 1972 का विधानसभा चुनाव था। पहले 1967 में सीपीआई (एम) की अग्रणी भूमिका के साथ बनी युक्त फ्रंट सरकार को, तब केंद्र में सत्ता में बैठी कांग्रेस ने गिराया। इसके बाद, 1969 में दोबारा और भी मजबूती से युक्त फ्रंट की सरकार आयी और कांग्रेस ने राज्यपाल का सहारा लेकर उसे भी गिराया। इसके बाद, 1972 का चुनाव इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने, इसी तरह किसी भी कीमत पर जीतने का फैसला लेकर कराया, जिसमें पुलिस बलों की ताकत का इस हद तक खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग किया गया कि सीपीआई (एम) के नेतृत्व में विपक्ष को पहले मतगणना का और फिर विधानसभा का ही बहिष्कार करना पड़ा था। इसके बाद, कांग्रेस प. बंगाल में सत्ता पर काबिज हो गयी, आज उन्हीं हथकंडों का सहारा लेकर भाजपा बंगाल में सत्ता पर काबिज हो रही है। और भाजपा भी यह न भूले कि इसके बाद बंगाल की जनता ने पहला मौका मिलते ही, 1977 में कांग्रेस को सत्ता से इस तरह बाहर किया था कि उसके बाद पांच दशक तक कांग्रेस बंगाल में सत्ता के आस-पास भी नहीं फटक सकी।

दुर्भाग्य से हम बाकायदा तानाशाही के उसी रास्ते पर बढ़ रहे हैं। भाजपा का बंगाल में पहली बार सत्ता में पहुंचना और असम में दोबारा सत्ता पर काबिज होना, इसी का साधन बनने जा रहा है। यह इसलिए है कि यह किसी एक पार्टी के चुनाव में जीत कर सत्ता तक पहुंचने की सामान्य जनतांत्रिक प्रक्रिया का मामला नहीं है। यह जनतांत्रिक प्रक्रिया को पूरी तरह से तोड़-मरोड़कर सत्ता पर काबिज हुए जाने का मामला है। और यह तोड़-मरोड़, सिर्फ बंगाल में पच्चीस लाख से ज्यादा लोगों का मताधिकार छीने जाने या असम में विधानसभा क्षेत्रों के इस तरह पुनर्सीमांकन का ही मामला नहीं है, जिसके जरिए यह सुनिश्चित किया गया था कि मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव वाली सीटों की संख्या कम से कम कर दी जाए। जाहिर है कि यह सब चुनाव आयोग के माध्यम से ही किया जा रहा था। लेकिन, इसके साथ ही चुनाव आयोग के माध्यम से ही इस चुनाव में यह भी सुनिश्चित किया जा रहा था कि संघ-भाजपा, किसी भी रोक-टोक के डर के बिना कम से कम असम और बंगाल में, कथित घुसपैठियों का झूठा हौवा खड़ाकर, खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक दुहाई पर आधारित चुनाव प्रचार कर सकें और धर्म के आधार पर मतदाताओं का—जाहिर है कि हिंदू मतदाताओं का—ज्यादा से ज्यादा धु्रवीकरण कर सकें, जिसकी भारत का संविधान और चुनाव कानून हर्गिज इजाजत नहीं देते हैं।

मोदी राज के बारह सालों में, जनतंत्र को ही खोखला करने वाली ऐसी तमाम अवैधानिक तिकड़मों को, सबसे बढ़कर मीडिया पर अपने मुकम्मल नियंत्रण और न्यायपालिका के अनुकूलीकरण के जरिए, नया नार्मल बना दिया गया है। इसका प्रमुख साधन बना है चुनाव आयोग। और न्यायपालिका ने आम तौर पर इसे होने देने के जरिए, इस सब को नार्मल बनाने में मदद की है। हैरानी की बात नहीं होगी कि विधानसभा चुनाव के इस चक्र के बाद, चुनाव आयोग द्वारा टार्गेटेड तरीके से मतदाताओं का मताधिकार छीने जाने से लेकर, सत्ताधारी पार्टी को सारे अवैध हथकंडे खुलकर आजमाने देने तक, चुनाव और जनतंत्र का ही मजाक बनाने के इस खेल को और भी आगे बढ़ाया जाए। इसी प्रवृत्ति की एक बड़ी आजमाइश, अगले साल के शुरू में ही उत्तर प्रदेश में होने जा रही है। दुर्भाग्य से, मौजूदा चक्र में तमिलनाडु में डीएमके के नेतृत्ववाले मोर्चे को हराकर, फिल्म अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके का और केरल में वामपंथी नेतृत्व वाले एलडीएफ को हराकर यूडीएफ का जीतना, तानाशाही की उक्त प्रवृत्ति के प्रतिरोध की ताकतों को कमजोर भी कर सकता है। जनतंत्र की रक्षा की परवाह करने वाली ताकतें एकजुट होकर इस प्रवृत्ति का मुकाबला करेंगी तभी बाकायदा तानाशाही के बढ़ते कदमों को रोका जा सकेगा।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it