कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ का महागमन
सांची की पहाड़ियों पर स्थित विश्वविद्यालय में उनका समय एक शांत तपोवन की तरह याद किया जाएगा

- परिचय दास
सांची की पहाड़ियों पर स्थित विश्वविद्यालय में उनका समय एक शांत तपोवन की तरह याद किया जाएगा। वहाँ वे कुलपति थे, पर अधिकतर लोग उन्हें आचार्य के रूप में याद करते हैं। प्रशासन उनके लिए आवश्यक कर्म था, किंतु आत्मा तो कक्षा में, संवाद में, पुस्तक के पन्नों में बसती थी। वे छात्रों से औपचारिक दूरी नहीं रखते थे। किसी जिज्ञासु शोधार्थी को वे देर तक सुनते, बीच-बीच में हल्की मुस्कान के साथ कोई संदर्भ जोड़ देते। उनके लिए शिक्षा एक साझा यात्रा थी, जिसमें गुरु भी सहयात्री होता है।
कुछ लोग पदों से पहचाने जाते हैं, कुछ लोग अपनी उपस्थिति से। प्रो. वैद्यनाथ लाभ उन दुर्लभ व्यक्तियों में थे जिनके आसपास ज्ञान एक औपचारिक वस्त्र नहीं, बल्कि स्वभाव की तरह रहता था। वे चलते थे तो साथ में पुस्तकालय चलता था; वे बोलते थे तो शास्त्र और कविता एक ही स्वर में खुलते थे।
पालि और बौद्ध अध्ययन उनके लिए केवल अकादमिक अनुशासन नहीं था, वह एक दीर्घ साधना थी। उन्होंने शब्दों को धूल झाड़कर नहीं पढ़ा, उन्हें सांस देकर पढ़ा। बौद्ध ग्रंथों की पंक्तियाँ उनके लिए मृत इतिहास नहीं, वर्तमान की धड़कन थीं। जब वे त्रिपिटक की किसी कथा का संदर्भ देते, तो लगता जैसे वह प्रसंग अभी-अभी घटित हुआ हो और हम सब उसके साक्षी हों।
सांची की पहाड़ियों पर स्थित विश्वविद्यालय में उनका समय एक शांत तपोवन की तरह याद किया जाएगा। वहाँ वे कुलपति थे, पर अधिकतर लोग उन्हें आचार्य के रूप में याद करते हैं। प्रशासन उनके लिए आवश्यक कर्म था, किंतु आत्मा तो कक्षा में, संवाद में, पुस्तक के पन्नों में बसती थी। वे छात्रों से औपचारिक दूरी नहीं रखते थे। किसी जिज्ञासु शोधार्थी को वे देर तक सुनते, बीच-बीच में हल्की मुस्कान के साथ कोई संदर्भ जोड़ देते। उनके लिए शिक्षा एक साझा यात्रा थी, जिसमें गुरु भी सहयात्री होता है।
नव नालंदा महाविहार, नालंदा में उनका कार्यकाल एक तरह से इतिहास के साथ संवाद था। जिस भूमि ने शताब्दियों पहले ज्ञान की विश्वदीपिका जलाई थी, वहाँ खड़े होकर वे अक्सर कहते कि विश्वविद्यालय केवल भवनों से नहीं बनते, वे विचारों की निरंतरता से बनते हैं। उनके स्वर में न तो आक्रोश होता, न आडंबर। एक संतुलित आग्रह होता कि हम परंपरा को स्मारक की तरह नहीं, चेतना की तरह जिएँ।
उनकी हिंदी साहित्य में गहरी रुचि थी। यह रुचि शौक भर नहीं थी; वह उनके व्यक्तित्व का विस्तार थी। वे सहज ही अज्ञेय की पंक्तियाँ सुना देते, कभी रामधारी सिंह दिनकर का ओजस्वी स्वर ले आते, तो कभी भवानी प्रसाद मिश्र की सहजता में डूब जाते। महादेवी वर्मा की करुणा और आत्मगोपन उन्हें विशेष प्रिय था। आश्चर्य होता कि बौद्ध दर्शन के गंभीर अध्येता के भीतर यह कवि-हृदय इतनी सजीवता से कैसे स्पंदित रहता है।
कई बार औपचारिक बैठकों के बाद, जब वातावरण थोड़ी थकान से भर जाता, वे अचानक कोई कविता सुना देते। शब्द कमरे की दीवारों से टकराकर नहीं लौटते थे, वे भीतर उतरते थे। उनके उच्चारण में संस्कृत का अनुशासन था, हिंदी का मृदुल संगीत था, और अनुभव की तपिश थी। वे कविता को पाठ नहीं करते थे, उसे जीते थे।
सिनेमा में उनकी रुचि एक अलग ही संसार खोलती थी। आप सोच सकते हैं कि बौद्ध अध्ययन का विद्वान शायद श्वेत-श्याम गंभीर फिल्मों तक सीमित होगा। पर उन्हें कथा की शक्ति में भरोसा था, चाहे वह साहित्य में हो या पर्दे पर। वे भारतीय सिनेमा के इतिहास, उसके सामाजिक संदर्भ और सौंदर्यशास्त्र पर घंटों बोल सकते थे। किसी फिल्म का दृश्य वे इस तरह विश्लेषित करते कि उसमें छिपे नैतिक द्वंद्व, सांस्कृतिक संकेत और मानवीय करुणा उजागर हो उठती।
संगीत उनके लिए विश्रांति नहीं, एक सूक्ष्म ध्यान था। वे कहते थे कि शब्द जहाँ रुक जाते हैं, वहाँ स्वर शुरू होता है। कभी शास्त्रीय रागों की चर्चा करते, कभी किसी फिल्मी धुन की संरचना पर बात करते। उनके भीतर का अध्येता हर कला में अर्थ खोजता था, पर वह अर्थ कठोर नहीं होता था; वह रस से भरा होता था।
आई.एस.बी.एस. जैसे संस्थागत प्रयासों में उनकी भूमिका उनके संगठन-कौशल की गवाही देती है। वे केवल विचारक नहीं थे; वे योजनाकार भी थे। शिक्षा को वैश्विक संवाद से जोड़ने की उनकी दृष्टि स्पष्ट थी। वे चाहते थे कि भारतीय बौद्ध अध्ययन केवल संग्रहालय की वस्तु न रहे, बल्कि समकालीन विमर्श का सक्रिय हिस्सा बने।
उनके व्यक्तित्व का एक और पक्ष था विनम्रता। यह विनम्रता कृत्रिम नहीं थी। वे अपने पदों का उल्लेख कम ही करते। कोई उनसे उनके प्रशासनिक निर्णयों की चर्चा करता, तो वे बात को मोड़कर छात्रों या शोध के विषय पर ले आते। जैसे उन्हें विश्वास था कि व्यक्ति नहीं, कार्य टिकता है।
उनसे मिलना कई लोगों के लिए आत्मविश्वास का स्रोत था। वे प्रश्नों से घबराते नहीं थे। उलटे, वे प्रश्नों को प्रोत्साहित करते थे। उनके अनुसार शंका ही ज्ञान का प्रथम चरण है। वे असहमति को भी स्थान देते थे क्योंकि उनके लिए विश्वविद्यालय बहस का घर है, मौन का नहीं।
अब जब वे नहीं हैं, तो उनकी स्मृति केवल शोक का कारण नहीं, एक जिम्मेदारी का संकेत है। उनके जाने से जो रिक्तता बनी है, वह हमें यह सोचने पर बाध्य करती है कि क्या हम उस संवाद, उस जिज्ञासा, उस साहित्य-रस और उस संगीत-संवेदना को आगे बढ़ा पाएँगे।
प्रो. वैद्यनाथ लाभ का जीवन हमें यह सिखाता है कि विद्वत्ता केवल प्रमाणपत्रों में नहीं होती; वह व्यवहार में, भाषा में, दृष्टि में प्रकट होती है। वे एक सेतु थे — अतीत और वर्तमान के बीच, शास्त्र और कविता के बीच, प्रशासन और आत्मीयता के बीच।
उनकी स्मृति में जब भी कोई छात्र पुस्तक खोलेगा, कोई शोधार्थी संदर्भ खोजेगा, कोई शिक्षक कविता सुनाएगा, तो कहीं न कहीं उनका अंश वहाँ उपस्थित होगा। ऐसे लोग देह से विदा होते हैं, पर संवाद से नहीं। और शायद यही किसी भी आचार्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है - वह अपने बाद भी प्रश्नों और प्रकाश के रूप में जीवित रहता।
प्रोफेसर, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) , नालंदा


