सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!
बिहार में चुनाव के मौके पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामधारी सिंह दिनकर को याद करना नहीं भूलते हैं।

हैरानी की बात नहीं है कि नीट परीक्षा लीक के बहाने, शिक्षा की बहाली तथा रोजगार के अभाव की युवाओं की चिंताओं के गिर्द और कॉकरोच जनता पार्टी तथा वामपंथी छात्र संगठनों की पहल पर, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को केंद्र में रखकर देश में विशेष कर युवाओं या जेन जी की गोलबंदी हुई थी, मोदी राज ने उसे भी अपने खिलाफ देशी-विदेशी षड्यंत्र बनाने की और शासन की ताकत के बल पर दबाने की हर मुमकिन कोशिश की थी।
बिहार में चुनाव के मौके पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामधारी सिंह दिनकर को याद करना नहीं भूलते हैं। लेकिन, लगता है कि इस महान कवि की उक्त कालजयी पंक्ति को समझ कर भी नासमझ बनने की मुद्रा अपनाने में ही प्रधानमंत्री ने अपना फायदा समझा है। वर्ना पिछले करीब हफ्ते भर से सत्ताधारी निजाम जिस तरह से अपने हटाए जाने की देसी ही नहीं विदेशी तक साजिशों का सरासर झूठा शोर मचाकर, अपने राज में रचे गए चुनावों को ही बेमानी बना देने के संविधानविरोधी, जनतंत्रविरोधी षड्यंत्र पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है, उसने दिनकर की उक्त पंक्ति को कब का राष्टï्र-विरोधी घोषित कर दिया होता। क्योंकि कवि ने जनता की इच्छा के लिए, सिंहासन खाली करने की बात तो कही है, लेकिन इसमें साफ-साफ शब्दों में यह शर्त तो जोड़ी ही नहीं है कि चुनाव के जरिए जनता (की इच्छा) आती है!
यह और भी विडंबनापूर्ण है कि अपने विरोधियों और आलोचकों पर, चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन के जनतांत्रिक तरीके के बजाए, अलोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन का षड्यंत्र रचने के आरोप, वही सत्ताधारी संघ-भाजपा गिरोह लगा रहा है, जिस पर इल्जाम ही यह है कि उसने पूरी तरह से पक्षपाती चुनाव आयोग के साथ मिलकर, ठीक चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन का रास्ता ही रोकने का षड्यंत्र रचा है। दूसरे शब्दों में, सत्ताधारियों का विपक्ष पर अलोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन की कोशिश का आरोप, वास्तव में देश में चुनाव को ही निरर्थक बना देने के मौजूदा निजाम के इंतजामों का ही पूरक है। सत्ताधारियों को चिंता है कि इसका इंतजाम तो उन्होंने कर लिया है कि चुनाव के जरिए उन्हें सत्ता से हटाया ही नहीं जा सकता है, लेकिन यह भी 'जनता के आ धमकने' से तो पूर्ण सुरक्षा नहीं देता है। तानाशाहों को जनता के आने के खिलाफ सुरक्षा के लिए हमेशा राजकीय हिंसा की जरूरत होती है और जनता से पूर्ण सुरक्षा के लिए, उसकी हरेक हरकत को, हरेक आंदोलन को आपराधिक षड्यंत्र बना देने की।
अपने खिलाफ जनता के हरेक आंदोलन को, अपनी हरेक गंभीर आलोचना को, आपराधिक षड्यंत्र बना देने में वर्तमान मोदी-शाह निजाम ने भारी महारत हासिल कर ली है। इस जनविरोधी और बुनियादी अर्थ में जनतंत्रविरोधी खेल के सिर्फ तीन खास उदाहरणों की यहां याद दिलाना ही काफी होगा—भीमा कोरेगांव षड्यंत्र केस; तीन काले कानूनों के खिलाफ देश के किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन; और तथाकथित दिल्ली दंगा वृहत्तर षड्यंत्र केस। बेशक, ऐेसे ही उदाहरण और भी अनेक हैं, लेकिन यहां इन तीन उदाहरणों का जिक्र सिर्फ यह रेखांकित करने के लिए किया जा रहा है कि मोदी निजाम ने, अपने नियंत्रण से बाहर जनता की हरेक गोलबंदी को, राष्टï्रविरोधी षड्यंत्र साबित करने कोशिश करने को नियम ही बना लिया है। और तो और, मोदी के सर्वाधिक कृपाप्राप्त, महा-धन्नासेठ, अडानी की कारोबारी धांधलियों और गड़बड़ियों को उजागर किए जाने को भी वर्तमान निजाम ने हर बार, भारत-विरोधी षड्यंत्र बनाने की ही कोशिश की है।
इसलिए, हैरानी की बात नहीं है कि नीट परीक्षा लीक के बहाने, शिक्षा की बहाली तथा रोजगार के अभाव की युवाओं की चिंताओं के गिर्द और कॉकरोच जनता पार्टी तथा वामपंथी छात्र संगठनों की पहल पर, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को केंद्र में रखकर देश में विशेष कर युवाओं या जेन जी की गोलबंदी हुई थी, मोदी राज ने उसे भी अपने खिलाफ देशी-विदेशी षड्यंत्र बनाने की और शासन की ताकत के बल पर दबाने की हर मुमकिन कोशिश की थी। यह दूसरी बात है कि दमन के उसके ये हथकंडे उसके लिए उल्टे पड़ गए और उसके अपने मध्यवर्गीय समर्थन आधार में भी दरारें पड़ने लगीं, जिसे संभालने की कोशिश में उसे अपनी हमारे राज में इस्तीफे नहीं होते की तानाशाहाना ठसक को छोड़कर, प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा।
लेकिन, तब तक खुल्लमखुल्ला सत्तापक्ष का पहरुआ बन गए चुनाव आयोग की मदद से, मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर मर्जी के नाम जोड़ने और नापसंद नाम काटने के जरिए, चुनावों को प्रभावित करने के खेल को, मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण या एसआरआर के जरिए, सत्ताधारियों के हिसाब से मतदाताओं की चुनाव के स्तर पर पहुंचा दिया और वह भी खुल्लमखुल्ला मनमानी करते हुए। बंगाल के चुनाव में यह खेल एकदम ही खुलकर सामने आ गया, जहां केंद्र में सत्ताधारी भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए, न सिर्फ समूची चुनावी मशीनरी तथा चुनावों के दौरान प्रशासनिक मशीनरी को ठोक-पीटकर केंद्रीय सत्ता के प्रति वफादार बना दिया गया बल्कि पूरे सत्ताईस लाख मतदाताओं का मताधिकार घोषित रूप से छीनते हुए, जोकि टार्गेटेड तरीके से किया जा रहा था, चुनाव कराए गए, जिसने चुनाव को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। ये लाखों मतदाता चुनाव के महीनों बाद भी अनिश्चितता के झूले ही में झूल रहे हैं, जबकि बंगाल में चुनाव आयोग की मदद से कराए गए रिजीम चेंज या सत्ता परिवर्तन के बाद से, इनकी नागरिकता पर भी सवालिया निशान लगा दिए गए हैं।
इसी सब की पृष्ठïभूमि में, जब यह तथ्य सामने आया कि एसआईआर की प्रक्रिया में, जिससे अब भी देश का एक हिस्सा कवर नहीं हुआ है, पिछली मतदाता सूचियों में रहे पूरे 13 करोड़ 30 लाख नाम बाहर किए जा चुके हैं, जो कि दुनिया के आठ-दस सबसे बड़े देशों को छोड़कर, बाकी सभी देशों की आबादी से भी ज्यादा संख्या है, तो इस प्रक्रिया के साथ शुरूआत से ही लगा रहा 'वोट चोरीÓ का संदेह यकीन में बदल गया और इसकी आलोचनाएं एक जन-विक्षोभ में। राजधानी दिल्ली में, जहां हर तीसरा मतदाता इसकी कैंची के नीचे आ गया और दो चुनाव आयुक्तों समेत, अनेक वीआईपी मतदाताओं का वोट खतरे में आ गया, जिनके लिए चुनाव आयोग को संबंधित एप में अलग से विशेष व्यवस्था भी करनी पड़ी और दूसरी ओर, कई मतदान केंद्रों पर करीब सारे के सारे वोट ही एसआईआर की कैंची के नीचे आ गए, मीडिया में अपेक्षाकृत अधिक तथा मतदाताओं के प्रति सहानुभूतिपूर्ण कवरेज ने इस विभीषिका को देश भर के सामने गहरे रंग से रेखांकित कर दिया।
इसी पृष्ठïभूमि में आए इंडियन एक्सपे्रस तथा अन्य प्रकाशनों के रहस्योद्ïघाटनों ने विपक्ष की बदतरीन आशंकाओं की सचाई के सबूत पेश कर दिए। अब यह साफ था कि मतदाता सूचियों में फेर-बदल की सारी प्रक्रिया, खुद चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं से भी स्वतंत्र, एक गुट-विशेष या कोटरी के ही हाथों में केंद्रित हो गयी थी, जो पूरी तरह से मनमाने तथा अपारदर्शी तरीके से इस प्रक्रिया को संचालित कर रही थी। इसे खुद चुनाव आयुक्तों के बहुमत को किनारे कर के सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त की इच्छा से संचालित किया जा रहा था और इस व्यवस्था के तार सत्ता के शीर्ष से जुड़े हुए थे। ईसीआईनेट के जिस कंप्यूटरी ताने-बाने के जरिए इस समूची प्रक्रिया को संचालित किया जा रहा था, उसका नियंत्रण पूरी तरह से केंद्र के चंद खासुल खासों तक सीमित था। दूसरी ओर, जो ईआरओ कानूनन मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने-हटाने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें इस प्रक्रिया में पूरी तरह से अधिकारहीन बना दिया गया था।
और मनमानी का आलम यह था कि बंगाल में, 16 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम, पूरी प्रक्रिया के बाद सूची से हटाने के लिए खुद चुनाव आयोग की ओर से अपीलें दायर की गयी थीं, जो केंद्र में कंप्यूटर-प्रणाली के जरिए और वास्तव में दो चुनाव आयुक्तों के अंधेरे में रखकर किया जा रहा था। बाद में उत्तराखंड आदि अन्य कई राज्यों में भी चुनाव आयोग के 'सिस्टमÓ द्वारा ही फार्म 7 के जरिए मतदाताओं के नाम काटे जाने जानकारियां सामने आयीं। दूसरी ओर खासतौर पर भाजपा तथा संघ परिवार के विभिन्न बाजुओं द्वारा फार्म 7 के जरिए, थोक में उत्तराखंड से लेकर तेलंगाना व कर्नाटक तक, विरोधी या राजनीतिक रूप से संदिग्ध मतदाताओं के नाम कटवाए जाने और उत्तर प्रदेश तथा कई अन्य राज्यों से फार्म 6 के जरिए इसी तरह लाखों नाम जोड़े जाने के की खबरें भी सामने आयी हैं। कुल मिलाकर यह कि एसआईआर के जरिए चुनाव आयोग ने अपने साथ-साथ, चुनाव मात्र की विश्वसनीयता को खत्म कर दिया है। जाहिर है कि वह यह इसलिए कर रहा है क्योंकि उसे कार्यपालिका के शीर्ष पर बैठी मोदी-शाह जोड़ी को खुश करना है, जिसने कानून बदलकर उनकी नियुक्ति का अधिकार अपने हाथ में ले लिया है और ऐसा वे कानूनी जवाबदारी की परवाह न करते हुए कर सकते हैं, क्योंकि उसी कानून के जरिए उन्हें चुनाव आयोग में पद पर रहते हुए किए गए कामों के लिए, जीवन भर के कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा दे दी गयी है।
यह कुल मिलाकर चुनाव को ही बेमानी बनाकर, जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति में जनतंत्र का ही रास्ता बंद कर दिए जाने की कोशिश है। स्वाभाविक रूप से जनतंत्र की परवाह करने वाली सभी ताकतें, अपनी तमाम भिन्नताओं के बावजूद, जनतंत्र के इस अपहरण के खिलाफ प्रतिरोध के लिए सामने आ रही हैं। इमरजेंसी का अनुभव गवाह है कि इस देश में जनतंत्र की कद्र करने वाली ताकतों का दायरा बहुत बड़ा है। और यही संघ-भाजपा और उनके मौजूदा निजाम की बौखलाहट का असली कारण है। वे बदनाम करने से लेकर राजकीय-निजी सेनाओं के जरिए दमन तक, अपने सारे हथियार आजमा कर भी इस तूफान को रोक नहीं पाएंगे। यह भी याद रहे कि वे ही हैं जो हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में, विश्वसनीय चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन का रास्ता बंद करने की कोशिश कर रहे हैं। वे सत्ता के बल पर जनता की इच्छा को हमेशा के लिए दबा तो नहीं सकते हैं, हां! चुनाव के जरिए उसकी अभिव्यक्ति का रास्ता बंद कर के अपने फासीवादी तरीकों से, जनता की इच्छा को अपने प्रकटीकरण के दूसरे रास्तों की ओर जरूर धकेल सकते हैं। चुनावों की विश्वसनीयता और पवित्रता की रक्षा के लिए, आज जो ताकतें लड़ रही हैं, वे ही इसकी इकलौती गारंटी हैं कि भारत में रिजीम चेंज किसी बांग्लादेश या नेपाल की तरह नहीं हो। वर्ना सत्ताधारी संघ-भाजपा तो भारत को बांग्लादेश या नेपाल के रास्ते पर धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। उनके लिए इतिहास का एक ही संदेश है—सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!


