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भारत को कमजोर करने वाला अमेरिकी व्यापार समझौता

व्यापार समझौते के बदले में अमेरिका के आदेशों के आगे भारत झुक गया है।

भारत को कमजोर करने वाला अमेरिकी व्यापार समझौता
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अब जब भारत ने एक खिड़की खोल दी है तो डेयरी के मामले में अमेरिकी दबाव दूर नहीं होगा बल्कि समय के साथ और बढ़ने की संभावना है। इस आलोक में व्यापार समझौते में यह बयान कि, 'भारत अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों के व्यापार के लिए लंबे समय से चली आ रही गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने के लिए भी सहमत है', उस जाल की प्रकृति को इंगित करता है जिसमें भारत फंसता चला गया है।

आप इसे किसी भी तरह से घुमा-फिरा कर देंखे, यह स्पष्ट है कि व्यापार समझौते के बदले में अमेरिका के आदेशों के आगे भारत झुक गया है। यह भारत पर दंडात्मक टैरिफ को तो कम करता है लेकिन देश के दीर्घकालिक हितों को भी दूर करता है। इसके साथ ही लंबे समय से भारत के नीति ढांचे का केंद्रबिंदु रहे बहुप्रतीक्षित रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करता है। यह सच है कि दोनों देशों के बीच पारस्परिक रूप से लाभप्रद व्यापार के संबंध में 'अंतरिम समझौते' के बारे में सारे विवरण ज्ञात नहीं है लेकिन जो कुछ भी मालूम है- जिसमें सौदे के आसपास की परिस्थितियां, इसकी घोषणा का तरीका, संयुक्त बयान की भाषा और व्हाइट हाउस के कार्यकारी आदेश शामिल हैं, इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत ने कुछ लंबे समय से चले आ रहे रुख को बदल दिया है और उस हद तक यह दो बराबर के देशों के बीच का समझौता नहीं है।

आपसी सहमति से जारी बयान का समय देखने पर पता चलता है कि अमेरिका साधारण शिष्टाचार पालने की तकलीफ भी नहीं उठाता। ट्रंप ने दोनों देशों द्वारा 6-7 फरवरी को आधिकारिक रिलीज से कुछ दिन पहले दो फरवरी को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रूथ सोशल' पर व्यापक समझौते की घोषणा की थी। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा जारी संयुक्त बयान में भारत सरकार की घोषणा पर 7 फरवरी, सुबह 4.29 बजे टाइम स्टैम्प है जो एक अपरंपरागत समय है जिसे अमेरिकी टाईमज़ोन के अमेरिकी नेतृत्व वाली घोषणा के रूप में प्रस्तुत किया गया था। नेहरू ने कहा था कि 'जब दुनिया सोएगी, तो भारत स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा' तो हम कह सकते हैं कि यह समझौता स्वतंत्रता और आदर्शवाद की उस सुबह के शाब्दिक और रूपक के उलटफेर को चिह्नित करता है क्योंकि जब भारत सो रहा था तब अमेरिका ने एक ऐसा समझौता किया जो भारत के व्यापारिक भागीदार और उस हद तक इसकी स्वतंत्रता, लक्ष्यों, अपनी प्राथमिकताओं को तय करने के अधिकार को छीन लेता है।

फिर भी, राजनयिक बारीकियों के बिना देंखे तो ट्रम्प और अमेरिकी प्रशासन की घोषणा का समय केवल एक गहरे नुकसान की सतही परेशानियों को चिह्नित करते हैं जिसे भारत को समय के साथ स्वीकार करना होगा। अमेरिका के साथ कठिन शर्तों पर की गई गलबहियां, विशेष रूप से खाद्य और कृषि क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि एक दीर्घकालिक पारिस्थितिकी-प्रणाली परिवर्तन का जोखिम उठाता है जो अपरिवर्तनीय हो सकता है और भारत को एक ऐसे रास्ते पर चलने को मजबूर करता है जो देश को बहुत असहज कर देगा। जो कुछ भी हो रहा है उससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठन भी सहज नहीं होंगे। आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ के बयान से देखा जा सकता है कि आनुवांशिक रूप से संशोधित (जीएम) से संबंधित उत्पादों के लिए देश में प्रवेश करने का कोई रास्ता नहीं खुलना चाहिए। जबरन सौदा करने की ट्रम्पवादी शैली और अमेरिका के वाइल्ड वेस्ट के तरीके समय के साथ बीत सकते हैं लेकिन इस व्यापार समझौते के निहितार्थ लंबे समय बाद भी भारत के लिए एक कीमत तय करते रहेंगे। अल्पावधि लाभ के लिए किया गया समझौता अनिवार्य रूप से लंबी अवधि के लिए नुकसानदेह होता है।

अमेरिकी आयात के लिए कृषि क्षेत्र को खोलने का किसान समूहों ने विरोध किया है जिस पर देश को आश्वासन दिया गया है कि भारत के किसानों, एमएसएमई क्षेत्र, डेयरी या हथकरघा और हस्तशिल्प के हितों को नए व्यापार समझौते के तहत संरक्षित किया जाएगा और सौदे के एक हिस्से के रूप में कोई भी जीएम फसल भारत में प्रवेश नहीं करेगी लेकिन इस बात पर विचार करें कि 'नो-जीएम' आयात का दावा एक पतले धागे से जुड़ा है- उदाहरणार्थ, ड्रायड डिस्टिलर्स ग्रेन्स (डीडीजी- मक्का, चावल या गेहूं से एथेनॉल के उत्पादन के बाद बचा हुआ एक प्रमुख उप-उत्पाद है। यह पशु आहार, विशेषकर गायों और पोल्ट्री के लिए प्रोटीन, वसा और फाइबर का एक पौष्टिक व कम लागत वाला स्रोत है। इस सूखे चारे का उपयोग पशुओं की उत्पादकता और ऊर्जा के लिए किया जाता है)। घोषणा के अनुसार व्यापार समझौते में पहले नंबर पर शामिल डीडीजी के अनाज या पशु आहार ज्यादातर जीएम फसल से आते हैं।

डीडीजी पशु फीड में पोषण मूल्य जोड़ता है लेकिन क्या यह दावा किया जा सकता है कि भारी प्रसंस्करण के बाद मकई से जो इथेनॉल निकाला जाता है उससे क्या जीएम 'गुणवत्ता' मिटा दी जाती है? इस बात पर कोई सहमति नहीं है कि प्रसंस्करण में ट्रांसजेनिक प्रकृति को समाप्त कर दिया गया है। डीडीजी का उपयोग मवेशियों, डेयरी गायों, सूअर और कुछ पोल्ट्री को खिलाने में किया जाता है जो डेयरी शृंखला में प्रवेश करने के लिए जीएम-लिंक्ड उत्पाद के लिए एक मार्ग खोलता है। इसके अलावा अगर यह भारत के लिए 'रेड लाइन' नहीं है तो भारत अन्य बिंदुओं पर कब तक टिके रह सकता है? उदाहरण के लिए डेयरी, जिस पर अमेरिका डीडीजी की तरह जोर दे रहा है?

ध्यान दें कि समझौते में शामिल न किए गये दूध के आयात के खिलाफ़ भारतीय नीति को अमेरिका विदेश व्यापार की राह में बाधा के रूप में देखता है। भारतीय विचार में डेयरी केवल उन जानवरों से होनी चाहिए जिन्हें रक्त युक्त पदार्थों वाला भोजन नहीं दिया जाता या जुगाली करने वाले अथवा सूअर के आंतरिक अंगों या ऊतकों से युक्त आहार नहीं दिया जाता है लेकिन अमेरिका का मानना है कि इस दृष्टिकोण में 'स्पष्ट पशु स्वास्थ्य या मानव स्वास्थ्य औचित्य' का अभाव है। अब जब भारत ने एक खिड़की खोल दी है तो डेयरी के मामले में अमेरिकी दबाव दूर नहीं होगा बल्कि समय के साथ और बढ़ने की संभावना है। इस आलोक में व्यापार समझौते में यह बयान कि, 'भारत अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों के व्यापार के लिए लंबे समय से चली आ रही गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने के लिए भी सहमत है', उस जाल की प्रकृति को इंगित करता है जिसमें भारत फंसता चला गया है।

अमेरिका का एक विवादित बयान यह भी है कि भारत को छह महीने के भीतर यह निर्धारित करना होगा कि 'सकारात्मक परिणाम की दृष्टि से ... क्या पहचाने गए क्षेत्रों में भारतीय बाजार में प्रवेश करने वाले अमेरिकी निर्यात के प्रयोजनों के लिए अमेरिका-विकसित या अंतरराष्ट्रीय मानक, परीक्षण आवश्यकताओं सहित स्वीकार्य हैं?' भारत पर टैरिफ कम करने के लिए ट्रम्प द्वारा जारी कार्यकारी आदेश ('रूसी संघ की सरकार द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए खतरों को संबोधित करने के लिए कर्तव्यों में संशोधन') एक समिति भी स्थापित करती है जो 'इस बात की निगरानी करेगी कि भारत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूसी संघ के तेल का आयात फिर से शुरू करता है या नहीं' और दंडात्मक शुल्क वापस आने की धमकी के साथ यह निर्धारित किया जाता है कि भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद नहीं किया है या फिर से शुरू नहीं किया है।

इनमें से कोई भी शर्त भारत के लिए सहज नहीं है। समझौते का बचाव करने के लिए निश्चित रूप से सरकार आक्रामक हो गई है लेकिन यह संभावना नहीं है कि देश इन शर्तों को पूरी तरह से स्वीकार करेगा। सरकार के लिए यह उचित होगा कि वह इस सौदे का अधिक बचाव न करे, जैसा कि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोशिश की थी। समझदारी यह होगी कि जनता की राय विकसित होने के आलोक में कुछ पीछे हटने के लिए जगह छोड़ी जाए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट:द बिलियन प्रेस)


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