आने वाले विधान सभा चुनाव :शंख बजा नहीं, महाभारत चालू
जीहां। पांच विधानसभा चुनावों को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा होने में देर है लेकिन चुनाव के अखाड़े के पहलवान पहले से गुत्थमगुत्था होने लगे है

अन्य राज्यों के मुकाबले पश्चिम बंगाल में यह सबसे ज्यादा दिखाई दे रही है क्योंकि भाजपा इसे जीतने के लिए काफी बेचैन है। दो लोकसभा और दो विधान सभाओं में तृणमूल कांग्रेस को मुख्य टक्कर देने के बाद उसे लग रहा है कि 15 साल के ममता राज से लोगों की जो नाराजगी बढ़ी है उसका लाभ लेकर वह इस बार बंगाल का किला फतह कर सकती है।
जीहां। पांच विधानसभा चुनावों को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा होने में देर है लेकिन चुनाव के अखाड़े के पहलवान पहले से गुत्थमगुत्था होने लगे है। ऐसा हो तो रहा है सभी जगह लेकिन बंगाल की लड़ाई तो सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है और उसका स्तर इतना नीचा हो गया है कि आप किसी एक पक्ष को इस गिरावट के लिए दोषी नहीं मान सकते। बल्कि इस स्तर को देखकर डर लगता है कि चुनाव पूरा होने तक मामला कहां पहुंचेगा। चुनाव अप्रैल और मई से पहले हो जाएंगे।
असम, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी के लिए चुनाव मार्च/अप्रैल में होंगे तो तमिलनाडु और केरल विधान सभाओं के लिए अप्रैल/मई में और निश्चित रूप से चुनाव का ज्यादा शोर मचाने की वजह खास शैली से चुनाव लड़ने वाली भाजपा का मैदान में होना और प्रमुख खिलाड़ी रहना है। बंगाल में भी ईडी जब कोयला घोटाले की जांच का नाम लेकर सीधे तृणमूल की सलाहकार कंपनी के दफ्तर से फाइलें उठाने लगी तो पुलिस बल सहित आकार खुद ममता बनर्जी ने वे फाइलें छीन लीं। अब कौन गलत कौन सही? की लड़ाई सड़क पर और सुप्रीम कोर्ट में चलने लगी है। चुनाव के पहले उसका निपटारा भी संभव नहीं लगता।
अभी की स्थिति में भाजपा एक राज्य में शासन में है और दूसरे में काफी पिछड़कर मुख्य विपक्ष है पर एक राज्य, पुडुचेरी में उसने जिस तरह बिना एक भी विधायक जिताए सरकार बना लिया वह उसकी राजनैतिक लड़ाई लड़ने का तरीका है। अगर अभी के चुनाव को लेकर अभी से गरमाहट आ गई है तो यह भाजपा के चुनाव लड़ने का तरीका है जो नगरपालिका चुनाव तक को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्रतिष्ठा से जोड़ देती है।
मुश्किल यह है कि तीन अन्य राज्यों में वह कमजोर है तो बंगाल में ममता बनर्जी भी लड़ाई को ऑल आऊट तरीके से ही लड़ती हैं और इसे किसी दोष की तरह देखने की जरूरत नहीं है। आज भाजपा का जो एकछत्र राज बना है, अन्य दलों से वह जिस तरह आगे निकली है उसमें उसके चुनाव लड़ने के तरीके, साधनों की भरभार और साल के 365 दिन की तैयारी का बड़ा हाथ है।
अन्य राज्यों के मुकाबले पश्चिम बंगाल में यह सबसे ज्यादा दिखाई दे रही है क्योंकि भाजपा इसे जीतने के लिए काफी बेचैन है। दो लोकसभा और दो विधान सभाओं में तृणमूल कांग्रेस को मुख्य टक्कर देने के बाद उसे लग रहा है कि 15 साल के ममता राज से लोगों की जो नाराजगी बढ़ी है उसका लाभ लेकर वह इस बार बंगाल का किला फतह कर सकती है पर उसकी मुश्किल यह है कि उसके पक्ष में 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से जो उभार आने लगा था वह उतार पर आता दिखने लगा है। उसका वोट प्रतिशत गिरा है और तृणमूल का बढ़ा है साथ ही उसके सांसद और विधायक भी कम चुने गए हैं। दल-बदल में भी अब मौकापरस्त या किसी दबाव में उसकी तरफ आने वालों की रफ्तार कम हुई है। यह स्थिति बंगाली समाज के भद्रलोक द्वारा उसके तौर-तरीकों को नापसंद करने से जुड़ी है। इसके साथ ही वहां का लगभग एक चौथाई मुसलमान मतदाता भी अब पूरी तरह तृणमूल के साथ आ गए हैं। पहले कांग्रेस और वाम दलों को भी यह वोट मिलता था। भाजपा ने एक बार हिन्दू-मुसलमान धु्रवीकरण तो दोबारा नामशूद्रों की गोलबंदी करके सफलता पानी चाही जो आंशिक रूप में ही सफल हुई। बंगाल में समाजसुधार आंदोलनों के चलते जाति की गोलबंदी कम है और समाज पर प्रभावी भद्रलोक में भाजपा की घुसपैठ नहीं है। भाजपा की मुश्किल कांग्रेस और वाम दलों के एकदम पस्त होने से भी बढ़ी है जिनका वोट उसकी तरफ आने के ज्यादा तृणमूल की तरफ गया है।
असम में भी भाजपा की परेशानी दस साल शासन करने और नागरिकता या घुसपैठ जैसे किसी मुद्दे पर ज्यादा कुछ न कर पाने से जुड़ी है। कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को असम का चार्ज देकर लड़ाई को और दिलचस्प बना दिया है। कांग्रेस ने जब से मौलाना बदरुद्दीन वाली मुसलमानों की पार्टी से रिश्ता तोड़ा है उसे मुसलमानों का भरपूर वोट तो मिला ही है, भाजपा के लिए उस पर हमला करना और चुनाव को हिंदू-मुसलमान बनाना मुश्किल हुआ है। इस बार भाजपा को ज्यादा परेशानी अहोम सरवानंद सोनेवाल को हटाकर पंडित हेमंत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाने से भी जुड़ी है। सरमा प्रशासनिक रूप से कुशल हैं पर असमी समाज में शासक रहे अहोम समाज को सत्ता जाने का मलाल है। असम में बहुत किस्म की अस्मिताएं/पहचान काम करते हैं लेकिन नागरिकता, सीएए, पॉपुलेशन रजिस्टर, जनगणना और गहन मतदाता सर्वेक्षण जैसे किसी भी सवाल पर स्पष्ट फैसला न लेना और कोई नतीजा न देना भाजपा को परेशान करेगा। जिस तरह भाजपा चुनाव लड़ती है वैसा और कोई नहीं लड़ता यह सच्चाई भी याद रखनी होगी।
तमिलनाडु के चुनाव में भाजपा ही नहीं पूरा विपक्ष अभी पहले से कमजोर लग रहा है। अन्नाद्रमुक में टूट और भाजपा का उससे छिटकना ही नहीं हुआ है भाजपा वन्नीयारों वाली पार्टी पीएमके का दो फाड़ होने के बाद अंबुमणि धड़े के साथ हाथ मिलाने और अभिनेता विजयकान्त की गवांडीयरों वाली पार्टी को साथ लेने के लिए प्रयास कर रही है। अन्नाद्रमुक से निकले थेवर नेता पन्नीरसेलवम और दिनकरण भी अभी ठिकाना नहीं पा सके हैं। कभी विजयकांत को साथ लेकर कांग्रेस तीसरा मोर्चा बनाना चाहती है कभी द्रमुक सरकार में मंत्री पद। उधर द्रमुक, कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन हर तरह से मजबूत और एकजुट दिख रहा है। लोकसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि विपक्षी गठजोड़ बन भी जाए तो एम स्टालिन को हराने लायक दम जुटाना मुमकिन नहीं है।
केरल को लेकर भाजपा जरूर इस बार उत्साहित है हालांकि वहां भी लोक सभा चुनाव में वह शून्य पर ही आ गई थी। लेकिन उसे ठीक ठाक वोट मिले हैं और अभी त्रिवेंद्रम की स्थानीत सरकार पर उसके कब्जे से उसका उत्साह बढ़ा है। बहुत साफ जातिगत और सांप्रदायिक गोलबंदी वाले केरल समाज में भाजपा कुल मिलाकर हिन्दू नायरों और कुछ असंबद्ध युवकों को ही आकर्षित कर पाई है और यह वोट जितना बढ़ेगा दस साल से शासन कर रही वाम मोर्चा सरकार की परेशानियां बढ़ेंगी क्योंकि भाजपा के लिए ईसाई और मुसलमान वोट पाना संभव नहीं है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए अच्छी बन जाती है जिसके पास ज्यादा कुछ नहीं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के यहां से चुनाव लड़ने के चलते आया उत्साह भर है।
बीस लाख से कम आबादी वाले पुडुचेरी की आबादी का संतुलन बहुत नाजुक है और जिस तरह पिछली बार भाजपा ने वहां मनोनयन वाले तीन विधायकों और राज्यपाल के सहारे सरकार बना ली उससे नाराजगी है। इसलिए विधानसभा के सभी पांच राज्यों में भाजपा के लिए बहुत उत्साह वाली कोई चीज नहीं दिखती लेकिन ऐसी स्थिति बनाना और जश्न मनाना उसे आता है।


