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उज्जैन से अयोध्या यात्रा: दिग्विजय फिर सुर्खियों में

देश में बदलाव की लहर शुरू हो गई है। विपक्ष के दूसरे दल कांग्रेस के साथ जुड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हैं।

उज्जैन से अयोध्या यात्रा: दिग्विजय फिर सुर्खियों में
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देश में बदलाव की लहर शुरू हो गई है। विपक्ष के दूसरे दल कांग्रेस के साथ जुड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हैं। वहां अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का पैगाम बार-बार दे रहे हैं। राहुल भी उसी तरह का गर्मजोशी का जवाब दे रहे हैं। इंडिया गठबंधन मजबूत हो रहा है और जो इस दायरे से बाहर भी है वे भी मुद्दों पर साथ आ रहे हैं।

दिग्विजय सिंह ने बाजी पलट दी। उनके खिलाफ कांग्रेस में ही जो माहौल बनाया जा रहा था वह उनकी एक घोषणा से छिन्न-भिन्न हो गया। उन्हें जो राजनीति का चाणक्य कहा जाता था वह उन्होंने साबित कर के दिखा दिया।

उज्जैन के महाकाल मंदिर से अयोध्या के श्रीराम मंदिर तक की पद यात्रा की घोषणा से मध्य प्रदेश के वे सब कांग्रेसी चौंक गए, सदमे में आ गए जो सोच रहे थे कि उन्होंने दिग्विजय को राजनीति से खत्म कर दिया।

दिग्विजय की यह घोषणा एक धमाके की तरह थी। वे कांग्रेसी रक्षात्मक मुद्रा में चले गए जिन्होंने पार्टी की पोलिटिकल कमेटी की मीटिंग में दिग्विजय पर भाजपा का स्लीपर सेल होने से लेकर मध्य प्रदेश में कांग्रेस की हार के जिम्मेदार, पुत्र मोह तक के आरोप लगा दिए। विधायक आरिफ मसूद को बाकायदा सफाई देना पड़ी कि उन्होंने स्लीपर सेल नहीं कहा। मौके के फायदा उठाकर राजनीतिक वनवास में जा चुके सत्यव्रत चतुर्वेदी की बेटी ने भी आरोप लगा दिए कि उन्होंने कांग्रेस पर कब्जा कर रखा है।

इस मामले में कोई दो राय नहीं कि दिग्विजय के 50 साल से ज्यादा के लंबे राजनीतिक सफर में कांग्रेस में कई लोगों से उनकी प्रतिद्वंद्विता रही। सत्यव्रत चतुर्वेदी भी उनमें से एक थे मगर वे भाजपा के लिए काम करते हैं इस आरोप को कोई नहीं मानेगा। खुद चतुर्वेदी को कांग्रेस से निष्कासित किया जा चुका है। उनके बेटे को भी जो 2018 विधानसभा में सपा से चुनाव लड़ा था।

मगर इस समय एकाएक सबको लगा कि इस समय दिग्विजय का विकेट कमजोर है उसे गिरा दो। राजनीति में यह होता है कि अगर लगे कि किसी को दिल्ली का समर्थन नहीं है तो लोग तत्काल पाला बदल लेते हैं। मध्य प्रदेश में तो यह बहुत होता है। दोनों पार्टियों में। भाजपा में उमा भारती के साथ हुआ। इसके बावजूद की 2003 में भाजपा को सत्ता में वही लाईं थीं और फिर रोज शिवराज की जय जयकार करने वाले किस तरह मोहन यादव में मोहन युग देखने लगे यह भी सब देख रहे हैं। इससे पहले के नेताओं कैलाश जोशी वगैरह के साथ भी।

कांग्रेस में तो यह और ज्यादा शोर के साथ होता है। शुक्ल बंधु श्यामाचरण और विद्याचरण किस तरह अलग थलग पड़ गए सबने देखा। उनका पावर भी लोगों को याद है। मगर समय बदला तो एक आदमी भी उनके साथ नहीं होता था। और यह सब के साथ हुआ डीपी मिश्रा, प्रकाशचन्द्र सेठी, अर्जुन सिंह सत्ता में न रहने और हाईकमान का हाथ हटने के बाद एकदम अकेले पड़ गए।

यही कोशिश दिग्विजय के साथ थी। मगर मध्य प्रदेश की राजनीति में यह पहली बार हुआ कि किसी ने समय की धारा को बदला हो।

देश की राजनीति में यह काम नेहरू गांधी परिवार करता रहा। 1980 में इन्दिरा गांधी ने वापसी की। 2004 में सोनिया गांधी ने और 2022 में राहुल ने भारत जोड़ो यात्रा निकालकर। और उसके बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनकर खुद का नेतृत्व साबित कर दिया और कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष में उम्मीदें भर दीं। यह समय राहुल का है। मोदी हर मोर्चें पर डिफेन्सिव हैं।

राजनीति में वापसी के लिए सबसे जरूरी चीज होती है-विल पावर। मजबूत इच्छाशक्ति। राहुल लगातार वह दिखा रहे हैं और इधर दिग्विजय ने भी वही दिखाई है। कुछ ही महीनों बाद 80 के हो जाएंगे। जब सार्वजिनक घोषणा करने से पहले खुद दोस्तों को बताया था कि इस बार राज्यसभा नहीं लेंगे तो मजाक में कहा था- बूढ़ा हो गया हूं। मगर जैसा बुंदेलखंडी में कहते हैं कि ना तो बुंदेला बुढ़ो पड़ गओ, न ही लचक गई तलवार! मतलब अगर कहीं कोई चुनौती आती है तो उम्र कोई बाधा नहीं है।

2017 में जब उन्होंने नर्मदा यात्रा की घोषणा की थी तो किसी को अंदाजा नहीं था कि वह इतनी सफल रहेगी और 2018 विधानसभा में कांग्रेस की वापसी करवा देगी। करीब 3300 किलोमीटर की यह पैदल यात्रा आधे साल से ज्यादा चली थी। पत्नी अमृता राय ने भी पूरी यात्रा पैदल साथ की।

तब दशहरे से यात्रा शुरू की थी। अब भी वही दिन होंगे। 2 अक्टूबर को गांधी जयन्ती से उज्जैन से शुरू करेंगे। करीब हजार किलोमीटर। दिग्विजय ने कहा है कि करीब 10-15 किलोमीटर रोज चलेंगे। मतलब ढाई से तीन महीने की यह पदयात्रा होगी। कई राज्यों से होते हुए। राष्ट्रीय महत्व की।

उज्जैन में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव पर जमीनों को हड़पने का आरोप है और अयोध्या में आरएसएस विश्व हिन्दू परिषद पर चढ़ावा चोरी का। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रस्ट बनाया था उद्घाटन किया था। मगर जिस आस्था के सम्मान के नाम पर सत्ता में आए हैं उसकी चोट पर एक शब्द नहीं बोले हैं।

दुनिया में हमारा जलवा है यही बता रहे हैं। वहां जब सारी निगरानी इनकी थी। ट्रस्ट में आदमी इनके थे तो लोगों की आस्थाओं के साथ कैसे खिलवाड़ हुआ? यह नहीं बता रहे।

दिग्विजय सिंह की पद यात्रा में यह सवाल रोज उठेंगे। मोदी के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। राहुल को भी इस यात्रा में शामिल होना चाहिए। नर्मदा यात्रा में दिल्ली में बैठे कांग्रेस के नेताओं ने ही राहुल को इसमें शामिल नहीं होने दिया था। कई बार प्रोग्राम बना और भांजी मारने वालों ने हर बार कैन्सिल करवा दिया। वे लोग राहुल के भी शुभचिन्तक नहीं थे। आखिर में उन्होंने ही राहुल का अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी करवाया। खुद साइन न करके जी-23 भी बनवाया। जिसने सोनिया गांधी के अस्पताल में रहते हुए उन्हें राहुल के खिलाफ चि_ी लिखी।

वाकई राहुल का संयम और किसी को नुकसान पहुंचाने की भावना से दूर रहना बहुत बड़ी बात है। अगर वे बदला लेते तो कांग्रेस के बहुत सारे बड़े नेताओं को निपटा सकते थे। मगर जी-23 उसकी साजिश के पीछे के लोग किसी को उन्होंने नुकसान नहीं पहुंचाया।

देश में बदलाव की लहर शुरू हो गई है। विपक्ष के दूसरे दल कांग्रेस के साथ जुड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हैं। वहां अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का पैगाम बार-बार दे रहे हैं। राहुल भी उसी तरह का गर्मजोशी का जवाब दे रहे हैं। इंडिया गठबंधन मजबूत हो रहा है और जो इस दायरे से बाहर भी है वे भी मुद्दों पर साथ आ रहे हैं।

डीएमके और आम आदमी पार्टी ने अभी एसआईआर के नाम पर भाजपा को फायदा पहुंचाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसका मतलब है कि मिलकर लड़ना होगा। ऐसे में कांग्रेस के अन्दर अनावश्यक विवाद होना खुद उसके लिए नुकसानदेह है।

मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने यह समझा और अभी दतिया के कार्यकर्ता सम्मेलन में दिग्विजय के साथ एक ट्रेन में गए। उस फोटो और विडियो को ट्विट किया। जीतू की इस राजनीतिक परिपक्वता से खुद उनका कद ऊंचा हुआ और मध्यप्रदेश कांग्रेस में वापस एकता की भावना आई।

दतिया में उप चुनाव है। वहां अगर कांग्रेस एक होकर चुनाव लड़ ली तो अपनी सीट कायम रख सकती है। 2023 में यहां कांग्रेस ही जीती थी। और हारे बीजेपी के उस समय के राज्य के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा थे। मगर बाद में जीते हुए कांग्रेस के राजेन्द्र भारती को एक कोर्ट ने तीन साल की सज़ा सुना दी। उसके बाद उनकी विधायकी खतम कर दी गई।

अब यहां 30 जुलाई को चुनाव है। सोमवार 6 जुलाई से नामांकन भरना शुरू हो जाएंगे। कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव है। कांग्रेस में वापस एकता, उत्साह और अगली विधानसभा के लिए उम्मीदों का माहौल बन जाएगा।

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए अपना नेतृत्व साबित करने की चुनौती है। मुख्यमंत्री तो पर्ची से निकले नाम से बन गए थे। मगर उसके बाद विजयपुर में प्रतिष्ठा का बना उपचुनाव हार गए थे। बुधनी का एक जीता है। मगर वह शिवराज सिंह की सीट थी। जीत उनके खाते में ही गई। विजयपुर की हार मोहन यादव के खाते में है। उससे मुक्ति के लिए दतिया उपचुनाव मुख्यमंत्री के लिए अपनी प्रतिष्ठा बचाने का चुनाव है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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