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यूजीसी : पिछड़े दलितों का नेतृत्व पूरी तरह असफल

दलित पिछड़ों को क्या मिला? मंडल के 35 साल बाद फिर वैसा ही सवर्ण आंदोलन हुआ और इस बार उन्होंने जीत भी हासिल कर ली

यूजीसी : पिछड़े दलितों का नेतृत्व पूरी तरह असफल
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दलित पिछड़ों को क्या मिला? मंडल के 35 साल बाद फिर वैसा ही सवर्ण आंदोलन हुआ और इस बार उन्होंने जीत भी हासिल कर ली। मंडल के समय प्रधानमंत्री वीपी सिंह का राजनीतिक अस्तित्व दांव पर लगा था इसलिए मंडल लागू हो गया। मगर इस बार सरकार समानता के साथ नहीं थी इसलिए असमानता का पुराना जमाना बरकरार रहा।

देश के कमजोर वर्ग के पास अगर नेतृत्व होता तो यूजीसी के समानता नियम इस तरह ठंडे बस्ते में नहीं जा सकते थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोदी सरकार पर अगर दबाव पड़ता तो उसे कानून बनाकर समानता के इन नियमों को बनाए रखना पड़ता। नियम दलित पिछड़े आदिवासी छात्र-छात्राओं को विश्वविद्यालय और अन्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में जातिगत भेदभाव से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही बनाए गए थे। किसी सामाजिक राजनीतिक आंदोलन की वजह से नहीं।

मंडल क्यों आया था इसके बहुत सारे कारण हैं। मगर पिछड़ों के किसी आंदोलन की वजह से नहीं। वह पिछड़ों को आसमान से टपका लाभ था। उसके बाद पिछड़ों के नेताओं को सत्ता लाभ भी मिला। बिहार में लालू यादव, नीतीश कुमार को और उत्तर प्रदेश में मुलायम, अखिलेश यादव को। दलित उभार भी हुआ और इसकी वजह से मायावती मुख्यमंत्री बनीं और रामविलास पासवान बड़े नेता। शरद यादव भी बड़े नेता बने।

मगर दलित पिछड़ों को क्या मिला? मंडल के 35 साल बाद फिर वैसा ही सवर्ण आंदोलन हुआ और इस बार उन्होंने जीत भी हासिल कर ली। मंडल के समय प्रधानमंत्री वीपी सिंह का राजनीतिक अस्तित्व दांव पर लगा था इसलिए मंडल लागू हो गया। मगर इस बार सरकार समानता के साथ नहीं थी इसलिए असमानता का पुराना जमाना बरकरार रहा। जिसकी वजह से रोहित वेमूला, पायल तड़वी और कई वो जो चर्चा में नहीं आ पाए जिन्दा नहीं बचे।

समानता नियम में क्या था? कि प्रशासन को सुनवाई करना पड़ेगी। रोहित वेमूला और पायल तड़वी का परिवार यही कहने तो सुप्रीम कोर्ट में गया था उनके बच्चों पर अन्याय होता रहा मगर शिक्षण संस्थाओं ने उनकी नहीं सुनी। अब और ज्यादा नहीं सुनेंगे! सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगाकर उन तत्वों को और ज्यादा हिम्मत दे दी है जो जातिगत आधार पर भेदभाव करते हैं और यह मानते हैं कि दलित आदिवासी पिछड़ों को उतनी शिक्षा का अधिकार नहीं है जितनी हमने प्राप्त की है और हमारे बच्चे कर रहे हैं। अगर कोई सोशल मीडिया पर स्टडी करके पिछले दो हफ्ते के कमेंट निकाले तो मालूम पड़ जाएगा कि वंचित समुदाय के लिए क्या क्या कहा गया है।

कौन करेगा यह काम? यहीं नेतृत्व की जरूरत मालूम पड़ती है। सवर्णों की तरफ से बताया जाने लगा कि एससी एसटी एक्ट का कितना दुरुपयोग हुआ है। सच झूठ किसी को नहीं मालूम मगर ह्वाट्सएप ग्रुपों से लेकर मीडिया तक में पहले से बनाई गई धारणा को बढ़ावा दिया जाने लगा कि नए नियमों का भी ऐसे ही दुरुपयोग होगा और ठीक यही बात सुप्रीम कोर्ट ने कह दी। दुरुपयोग की आशंका। हमने पहले भी बताया है फिऱ बता रहे हैं कि ऐसे ही अंग्रेज कहते थे कि भारत में आजादी के दुरुपयोग की आशंका होगी। खुद वहां के प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने कहा था।

दलित पिछड़े आदिवासी इसका जवाब कैसे देंगे? पहली बात तो खुद जागरुक नहीं है और फिर यही सवाल कि जागरुकता, चेतना आती कैसे है? जनशिक्षण से। और यह कौन करता है नेतृत्व। नेहरु अपने कैबिनेट के मंत्रियों को सैद्धांतिक क्लासों में भेजते थे। सिद्धांत मजबूत होना चाहिए।

दलितों में आम्बेडकर के बाद कोई जनशिक्षण करने वाला नहीं हुआ। कांशीराम ने अपने शुरूआती दौर में यह काम किया। मगर बाद में सिर्फ मायावती को मुख्यमंत्री बनाने में अपनी सारी ताकत लगाए रखे और मायावती उन्होंने तो दलित चेतना आगे बढ़ाने के बदले नए नियमों को समाज में तनाव बढ़ाने वाला बता दिया। वे संघ और भाजपा जितनी ही प्रतिगामी होने की कोशिश कर रही हैं। दलितों में क्या नया नेतृत्व पैदा होगा?

अन्य पिछड़ों के लिए यह सवाल और ज्यादा जरूरी है। यूजीसी के नए नियमों में पीड़ितों में पिछड़ों को भी जोड़ा गया था। इससे पहले एससी एसटी एक्ट ही काम करता था। उसमें पिछड़े नहीं थे। मायावती जो नए नियमों को समाज में तनाव पैदा करने वाला बता रही हैं उसका बड़ा कारण पिछड़ों का इन नए नियमों में आना है। बचाव पिछड़ों पर छोड़ दिया गया। मगर पिछड़ों के पास तो इस तरह का नेतृत्व बिल्कुल ही नहीं है।

लालू प्रसाद यादव ने पिछड़ों में स्वाभिमान जगाने का काम किया। मगर वह सब पिछड़ों के लिए नहीं हो सका। उनकी जाति के लोगों को ही इसका ज्यादा फायदा मिला। व्यापक पिछड़ा हित जैसा काम नहीं हो सका। फिर जनशिक्षण के अभाव में दूसरी पिछड़ी जातियों और यादवों के बीच दूरी बढ़ती चली गई। ऐसा ही उत्तर प्रदेश में हुआ। मायावती की जाति में जो चेतना आई वह दूसरी दलित जातियों में पैदा करने की कोशिश ही नहीं हुई। जाहिर है कि उनकी अपनी जाति का नेतृत्व इतना काम नहीं कर पाया।

नीतीश ने पिछड़ों और दलितों की एकता को महादलित और अति पिछड़ा बनाकर और तोड़ डाला। यह लोग यह नहीं देखते हैं कि अभी नए नियमों के विरोध में सारे सवर्ण बिना अपने जातिगत भेदभाव के एक साथ आए। जीते। यहां तो कमजोर वर्ग में पहले दलित और पिछड़ों में ही भारी मतभेद है। उत्तर प्रदेश में मायावती किसी भी कीमत पर अखिलेश के साथ लड़ने को तैयार नहीं हैं। भाजपा के साथ चली जाती हैं। अभी उसी की राजनीति की मदद कर रही हैं। सरकारी नौकरी निकाल नहीं रहे हैं। तो आरक्षण खत्म हो रहा है। जो नौकरियां हैं वहां नॉट फाउन्ड सुटेबल (एनएफएस) के नाम पर आरक्षित सीटें भरी नहीं जाती हैं।

दलित आदिवासी पिछड़ों के नेताओं को मालूम है कि संसद में पिछले सात साल से कोई नई भर्ती नहीं की गई है? अभी संसद चल रही है। बजट सत्र है। रोज जा रहे हैं। जरा मालूम कर के देखें कि कोई भर्ती हुई है? सब ठेके के लोगों से काम चलाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि हम जनता का पैसा बचा रहे हैं। यहां लोग बेमतलब में आकर बहस करें इसलिए बता देते हैं कि पिछले महीने ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पत्रकारों से यह कहा।

अपनी सोच के अनुरूप गढ़े हुए तर्क। सुप्रीम कोर्ट का तर्क भी ऐसा ही है दुरुपयोग की आशंका। यहां नौकरी न देना जनता का पैसा बचाना।

मगर समस्या वही है। कमजोर वर्ग दलित पिछड़े आदिवासी जनता में जागरुकता का अभाव। और उनका राजनीतिक, सामाजिक, बौद्धिक नेतृत्व कहीं दिखता नहीं। केवल सांसद विधायक मुख्यमंत्री मंत्री बनना नेतृत्व नहीं है।

नेतृत्व का मतलब नेहरू जैसा। जो लगातार प्रगतिशीलता, वैज्ञानिक चेतना फैलाते रहते थे। और सब को साथ लेकर चलते थे। यहां लिखे के अनुसार सब का नेतृत्व करते थे। गरीब कमजोर का खासतौर से।

मंडल ने पिछड़ों को कुछ लाभ तो दिया। मगर जाति धर्म से ऊपर उठकर की जाने वाली राजनीति को मंडल और उसी के साथ बाबरी मस्जिद शहादत ने भारी धक्का पहुंचाया। पिछड़ों दलितों के नेता अलग हो गए। मुस्लिम में भी क्षेत्रीय दलों के साथ जाने से लेकर अपनी कयादत ( नेतृत्व) के नाम पर ओवैसी के साथ जाने का सिलसिला शुरू हो गया।

मगर जो पूरे समाज को साथ लेकर चले वह नेतृत्व कमजोर हो गया। भारत में इतनी विविधता है कि कुछ मुद्दों पर अपना नेतृत्व जरूरी हो सकता है। मगर रोजमर्रा की जिन्दगी, समस्याओं के लिए जाति धर्म से ऊपर उठा नेतृत्व ही हर वर्ग के लिए और देश समाज के लिए कारामद है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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