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ट्रंप, मादुरो और मोदी बनाम राजा की शान

रिलायंस किस देश से कितना तेल खरीदता है यह आमतौर पर ऐसा विषय नहीं है, जिसकी खबर में आम जनता की दिलचस्पी हो

ट्रंप, मादुरो और मोदी बनाम राजा की शान
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रिलायंस किस देश से कितना तेल खरीदता है यह आमतौर पर ऐसा विषय नहीं है, जिसकी खबर में आम जनता की दिलचस्पी हो। फिर भी रिलायंस इंडस्ट्रीज को यह सफाई पेश करने की जरूरत क्यों पड़ी, यह सोचने वाली बात है। क्या यह सफाई मोदी के हेडमास्टर की तरह व्यवहार कर रहे डोनाल्ड ट्रंप के लिए पेश की गई है। ध्यान रहे कि जब डोनाल्ड ट्रंप का शपथग्रहण समारोह हुआ था और एस जयशंकर को संभवत: न्यौते के जुगाड़ के लिए पहले से अमेरिका भेजा गया था।

न्यूयार्क सिटी की अदालत में जज एल्विन हेलरस्टीन ने निकोलस मादुरो पर मुकदमा शुरु करने से पहले अपनी पहचान बताने कहा, तो बेड़ियों से जकड़े मादुरो ने शांत होकर जवाब दिया, मैं निकोलस मादुरो हूं। मैं वेनेज़ुएला गणराज्य का राष्ट्रपति हूं और तीन जनवरी से यहां अगवा होकर रखा गया हूं। मुझे वेनेज़ुएला में कराकास से मेरे घर से पकड़ा गया। मादुरो ने यह भी कहा कि 'मैं निर्दोष हूं। मैं एक सभ्य इंसान हूं।'

सिकंदर और पोरस के बीच किस तरह का संवाद हुआ, इसका जिक्र केवल इतिहास में पढ़ा है। अब उसकी प्रत्यक्ष मिसाल देख ली। 326 ईसा पूर्व में झेलम नदी के किनारे सिकंदर और पोरस के बीच युद्ध हुआ जिसमें पोरस की हार हुई। पोरस को बंदी बनाने के बाद सिकंदर ने पोरस से पूछा कि उनके साथ किस तरह का सुलूक किया जाए। पोरस ने तुरंत जवाब दिया, 'जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।' इस जवाब से प्रभावित सिकंदर ने न केवल पोरस को युद्धक्षेत्र से जाने दिया, बल्कि उसकी जमीन भी उसे वापस कर दी। इस ऐतिहासिक संवाद का मर्म यही है कि राजा की आन, बान और शान उसकी सैन्य शक्ति, राज्य के क्षेत्रफल या धनसंपदा से नहीं बल्कि उसके नैतिक बल से कायम रहती है। अब राजशाही का जमाना नहीं है, लेकिन शासन चलाने के लिए शासन प्रमुख में साहस और नैतिक बल की दरकार तो शाश्वत है। इसके बिना न राजा का सम्मान रहता है, न उसके राज्य का। पोरस की शान आज तक बरकरार है, हम नहीं जानते कि मादुरो के साथ ट्रंप क्या सलूक करेंगे, लेकिन उन्होंने दुनिया में अपनी शान दिखा दी है। इस बीच ट्रंप का बड़बोलापन जारी है और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर उन्होंने नया बयान दे दिया है। इस बार डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे मुलाक़ात करनी चाही थी और पूछा था कि 'सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं। मैंने हां कहा क्योंकि मेरे उनके साथ बहुत अच्छे रिश्ते हैं।'

नरेन्द्र मोदी की अपनी शान का तो पता नहीं, लेकिन आजादी के बाद से अब तक अमेरिका के आगे न झुककर और उसकी घुड़कियों पर तुर्की ब तुर्की जवाब देकर जो शान भारत ने कमाई थी, मोदी उसे पूरी तरह मटियामेट करने पर तुल गए हैं। विपक्ष जाहिर तौर पर मोदी से जवाब मांग रहा है कि कम से कम अब तो कुछ कहिए। लेकिन मोदी ने न पहले कुछ कहा और न अब कुछ कहेंगे। बराक ओबामा को तो मोदी ने सबके सामने बराक कहकर बुलाया था, लेकिन ट्रंप को क्या अकेले में भी मोदी ने सर कहकर संबोधित किया, यह सोचने वाली बात है। हालांकि न ट्रंप ने पहली बार मोदी के नाम पर भारत का अपमान किया है और न मोदी ने पहली बार चुप्पी साधी है। दरअसल 11 सालों के शासन में नरेन्द्र मोदी ने यह जाहिर कर दिया है कि उन्हें भारत के इतिहास, संस्कृति, लोकतंत्र, संविधान, राजनैतिक मर्यादा और परंपराओं की कोई फिक्र नहीं है। उन्हें केवल अपनी सत्ता से मतलब है और वो भी इसलिए ताकि उसके जरिए पूंजीपतियों का हितसाधन हो सके।

2014 से पहले भारत में यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का जो काम किया गया और उस बीच अचानक नरेन्द्र मोदी को गुजरात से उठाकर दिल्ली की गद्दी पर बिठाने की रणनीति बनाई गई, तब से लेकर अब वेनेजुएला में निकोलस मादुरो का अपहरण और तख्ता पलट तक राजनीति की पहेली के टुकड़े बिखरे हुए हैं, इन्हें समेटे और एक सिरे से दूसरे सिरे को मिलाएं तो सत्ता को नियंत्रित करते पूंजीवादी गठजोड़ की तस्वीर बनती है। डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में जो काम पूरा नहीं कर पाए, उसे इस कार्यकाल में जल्दी से जल्दी निबटाना चाहते हैं। इसलिए सत्ता संभालते ही ट्रंप ने टैरिफ लगाने से लेकर तीसरी दुनिया के देशों पर अमेरिका का दबदबा थोपने का काम नए सिरे से शुरु किया। पाकिस्तान तो शुरु से अमेरिका के कदमों में बिछा हुआ है। अब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार भारत को भी ऐसा ही करने पर मजबूर कर रही है। क्योंकि तेल के व्यापार पर नियंत्रण और उसके जरिए डॉलर की बादशाहत बनाने का जो खेल अमेरिका 80 के दशक से तेज कर चुका है, अब भारत में अंबानी जैसे व्यापारियों का हित भी उसी से जुड़ा है।

मोदी और अंबानी, अंबानी और ट्रंप, रूस और अंबानी के बीच तेल सौदा, इन सबसे पहले समझना जरूरी है कि यकायक वेनेजुएला पर हमले की वजह क्या है। वेनेज़ुएला के पास 303 अरब बैरल प्रमाणित तेल भंडार हैं। जो इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा है, दुनिया के कुल तेल का यह 20 प्रतिशत है। लेकिन वेनेज़ुएला उस तेल को चीनी युआन में बेच रहा था। डॉलर में नहीं। 2018 में, वेनेज़ुएला ने घोषणा की कि वह 'डॉलर से खुद को मुक्त' करेगा। वेनेजुएला ने युआन, यूरो, रूबल—डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं को भी तेल के बदले स्वीकार करना शुरू कर दिया था। इसके साथ ही वेनेजुएला ब्रिक्स में भी शामिल होना चाहता है। ऐसा हुआ तो दुनिया की जीडीपी के बड़े हिस्से में उसकी भी साझेदारी हो जाएगी। ब्रिक्स देशों में शामिल चीन पहले ही अमेरिका के एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। उसकी बनाई भुगतान प्रणाली स्विफ्ट को दरकिनार करने के लिए चीन ने क्रास बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (क्रिप्स) तैयार किया है, जिससे 185 देशों के 4800 से अधिक बैंक जुड़ चुके हैं। इसी तरह ब्रिक्स के देश भी ब्रिक्सपे के नाम से पेमेंट सिस्टम बना रहे हैं। इससे डी-डॉलराइजेशन की संभावनाएं बढ़ गई हैं। जबकि अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पेट्रोडॉलर पर ही टिकी है।

1974 में, हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ समझौता किया था कि दुनिया भर में बिकने वाला सारा तेल अमेरिकी डॉलर में मूल्य निर्धारित किया जाएगा। बदले में, अमेरिका सैन्य सुरक्षा प्रदान करेगा। इस समझौते से दुनिया भर में डॉलर की कृत्रिम मांग पैदा हुई, क्योंकि जिस भी देश को तेल खरीदना होता, तो उसके भुगतान के लिए डॉलर की जरूरत पड़ती। इससे अमेरिका केवल कागज पर बेशुमार डॉलर छापने लगा, जबकि बाकी देश अपनी जरूरतों के लिए तरह-तरह के समझौते करके डॉलर इक_ा करते रहे। इस व्यवस्था को 2000 में चुनौती देते हुए इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने घोषणा की थी कि इराक तेल को डॉलर की बजाय यूरो में बेचेगा, तो नतीजा ये हुआ कि 2003 में इराक पर हमला कर सद्दाम हुसैन को फांसी दी गई। फिर 2009 में ऐसा ही दुस्साहस लीबिया के कर्नल गद्दाफी ने दिखाया और सोने से समर्थित अफ्रीकी मुद्रा 'गोल्ड दीनार' का प्रस्ताव तेल व्यापार के लिए रखा, जो समूचे अफ्रीकी महाद्वीप को आर्थिक तौर पर समर्थ बनाता। लेकिन अरब बसंत में लोकतंत्र के बहाने कर्नल गद्दाफी को भी 2011 में मरवा दिया गया। लेकिन अमेरिका के पेट्रो डॉलर वाली दादागिरी को चुनौती मिलना खत्म नहीं हुआ। इस बार निकोलस मादुरो ने ये साहस किया, तो अब उन्हें भी पकड़ लिया गया है और ट्रंप ने खुलकर कहा है कि अब अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के तेल पर कब्जा करेंगी। मादुरो के साथ डी-डॉलराइजेशन के लिए चीन, रूस और ईरान भी साथ आ रहे थे। रूस और चीन पर हमले की हिम्मत तो ट्रंप में नहीं है, अलबत्ता ईरान में पिछले साल हुए इजरायल के आक्रमण और अभी जनता के प्रदर्शन में अमेरिका की कितनी भागीदारी है, यह किसी से छिपा नहीं है।

अब आएं भारत पर। ट्रंप खुद इस बात को कह चुके हैं कि भारत पर लगाए गए अमेरिकी टैरिफ़ की वजह से अब भारत रूस से कम तेल ख़रीद रहा है। ट्रंप ने कहा है कि मोदी को पता था कि मैं ख़ुश नहीं था और मुझे ख़ुश करना ज़रूरी था। इस बीच मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड का बयान दो दिन पहले आया कि ब्लूमबर्ग में प्रकाशित वह समाचार रिपोर्ट जिसमें दावा किया गया है कि 'रूसी तेल से लदे तीन जहाज रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की जामनगर रिफाइनरी की ओर जा रहे हैं', सरासर झूठ है। रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी में पिछले लगभग तीन हफ्तों से रूसी तेल का कोई कार्गो नहीं पहुंचा है और जनवरी में भी रूसी कच्चे तेल की डिलीवरी की कोई उम्मीद नहीं है।

हमें बेहद दुख है कि निष्पक्ष पत्रकारिता के अग्रणी होने का दावा करने वालों ने जनवरी में डिलीवर होने वाले किसी भी रूसी तेल की खरीद से इनकार करने के बावजूद, आरआईएल द्वारा इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुए एक गलत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिससे हमारी छवि धूमिल हुई है।

रिलायंस किस देश से कितना तेल खरीदता है यह आमतौर पर ऐसा विषय नहीं है, जिसकी खबर में आम जनता की दिलचस्पी हो। फिर भी रिलायंस इंडस्ट्रीज को यह सफाई पेश करने की जरूरत क्यों पड़ी, यह सोचने वाली बात है। क्या यह सफाई मोदी के हेडमास्टर की तरह व्यवहार कर रहे डोनाल्ड ट्रंप के लिए पेश की गई है। ध्यान रहे कि जब डोनाल्ड ट्रंप का शपथग्रहण समारोह हुआ था और एस जयशंकर को संभवत: न्यौते के जुगाड़ के लिए पहले से अमेरिका भेजा गया था, तब भी नरेन्द्र मोदी को ट्रंप ने नहीं बुलाया, बल्कि मुकेश अंबानी अपनी पत्नी के साथ वहां मौजूद थे। अब पता चल रहा है कि मोदी पूछ रहे थे कि सर क्या मैं आपसे मिल सकता हूं। यह भी याद कर लें कि ये वही अंबानी हैं जिन्होंने वाइब्रेंट गुजरात में सबसे पहले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की कामना की थी। जब मोदी प्रधानमंत्री बन गए और अंबानी के बनाए अस्पताल के उद्घाटन के लिए पहुंचे तो मुकेश अंबानी ने उनकी पीठ पर हाथ रखकर एक संदेश दिया था, अब उसे पढ़ना कठिन नहीं है।


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