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परंपरागत ज्ञान से पर्यावरण बचाने की राह

लोकविज्ञान चाहे वह खेती व सिंचाई से संबंधित हो या जंगल में पाए जाने वाले औषधि या पौधे हों, आज भी वृद्ध लोगों के पास सुरक्षित है

परंपरागत ज्ञान से पर्यावरण बचाने की राह
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  • बाबा मायाराम

लोकविज्ञान चाहे वह खेती व सिंचाई से संबंधित हो या जंगल में पाए जाने वाले औषधि या पौधे हों, आज भी वृद्ध लोगों के पास सुरक्षित है। स्थानीय और परंपरागत ज्ञान आज पर्यावरण व जैव विविधता के संरक्षण व संवर्धन में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसके साथ आधुनिक ज्ञान को सीखकर, दोनों के मेल से पर्यावरण व जैव विविधता का संरक्षण किया जा सकता है।

मौजूदा समय में देश और दुनिया में पर्यावरण संकट की चर्चा चल रही है। यह वैश्विक समस्या है, लेकिन स्थानीय स्तर पर भी कुछ किया जा सकता है। इसमें ऐसे समुदाय जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहते आए हैं, उनके परंपरागत ज्ञान काफी सहायक हो सकता है। मैंने लम्बे अरसे से देश भर में घूम-घूमकर ऐसे समुदायों से बातचीत की है, और उसके आधार पर रिपोर्टिंग की है। आज इस कॉलम में इस पर बात करना चाहूंगा, जिससे स्थानीय समुदायों के परंपरागत ज्ञान को समझा जा सके और उसके साथ आधुनिक ज्ञान को जोड़कर समस्याओं का समाधान किया जा सके। पर्यावरण और समुदायों की आजीविका की रक्षा की जा सके।

अक्सर, जब कभी हम इतिहास की बात करते हैं, तब हम यह सोचते हैं कि यह मोटी-मोटी किताबों, दस्तावेजों, और पुस्तकालय के ग्रंथों में मिलेगा। लेकिन यह तो हमारे आसपास और परिवेश में भी है। हमें सिर्फ बुजुर्ग और अनुभवी लोगों से सवाल पूछना है और वे हमें बताएंगे, अपने प्रत्यक्ष अनुभव सुनाएंगे, कबीर की तरह आंखों देखी बताएंगे। वे सुनी-सुनाई बातें ही नहीं, आपबीती बताएंगे। याददाश्त के आधार पर बचपन और अपने काम-धंधे से जुड़े व अपने जमाने के किस्से बताएंगे। इसे मौखिक इतिहास व मौखिक ज्ञान भी कह सकते हैं। और यह सब आंचलिक स्थानीय भाषा में ही उपलब्ध है और उसे साक्षात्कार और बातचीत के माध्यम से जाना जा सकता है।

बरसों से खेती करने वाले किसान हमें बताएंगे यहां परंपरागत खेती-किसानी कैसी थी, क्या-क्या फसलें उगाई जाती थीं, कब बोई जाती थीं, किस तरह की मिट्टी मे बोई जाती थी, उसके तरीके क्या थे? हल-बक्खर कब चलाना है, बोवनी कब करनी है। जब सिंचाई की व्यवस्था नहीं हुआ करती थी तब कौन सी फसलें उगाई जाती थीं? सिंचाई आने के बाद फसलचक्र में क्या बदलाव आया? वे बताएंगे, बीमार आदमी का इलाज कैसे किया जाता है, किसी की अगर हड्डी टूट जाती है तो कौन सी जड़ी लगाई जाती है, हंसिया या कुल्हाड़ी की चोट पर कौन से पेड़ की छाल पीसकर लगाते हैं?

वे बताएंगे कि बारिश कम क्यों होती है? पहले झड़ी लगती थी और अब क्यों पानी नहीं गिरता? सदानीरा नदियों का पानी क्यों सूख गया? बारहमासी नदियां अब बरसाती नालों में कैसे बदल गई? वे साल दर साल क्यों दम तोड़ रही हैं? ज्यादा कुरेदेंगे तो वे यह भी बता सकते हैं ये सूखी नदियां पुनर्जीवित कैसे हो सकती हैं? भूजल क्यों टाइम बम की तरह नीचे चला जा रहा है? ऐसी कई जानकारियां आपको अपने इलाके के बारे में सहज ही मिल जाएगी।

हमें ऐसे ढेरों किस्से मिल जाएंगे जिनसे हम अनजान थे। हमें लोकविद्या के ऐसे कई सूत्र हाथ लग जाएंगे, जिससे हम अपना जीवन संवार सकते हैं, बेहतर कर सकते हैं, परिवेश बदल सकते हैं। क्योंकि आधुनिक रासायनिक खेती मुनाफे से संचालित है, जबकि परंपरागत खेती भोजन की जरूरत पूरी करने के लिए विकसित हुई थी। उसके तौर-तरीके किसानों ने ही विकसित किए थे। यह सब हमें किसी खेत की मेढ़ पर या किसी पेड़ की छांव में बैठकर बतियाते पता चल सकता है। इस मामले में हम अपने आपको खुशकिस्मत समझेंगे कि हमारे देश के किसान या बुजुर्ग थोड़ी-बहुत पहचान के बाद उनके दुख-दर्द, अनुभव और आपबीती बिना झिझक के बताते हैं। वे धाराप्रवाह बताते चले जाते हैं कि हमें ऐसा लगेगा ही नहीं कि हम उनसे पहली बार बात कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम नाम है) जिले में पिछले कुछ वर्षों से जनजीवन से सीधे जुड़े जनमुद्दों पर मैंने गांव के कई लोगों से बातचीत की है। यह बातचीत स्थानीय भाषा बुंदेली ( जो बुंदेली का रूप इस इलाके में बोला जाता है) में की गई। यह सहज संवाद नहीं, साक्षात्कार था जिसमें मुद्दों का एक फेमवर्क होता है और बातचीत आगे बढ़ती जाती है। लेकिन कभी-कभी मुझे प्रश्नावली को एक तरफ उनकी ही किसी बात के सिरे को पकड़कर आगे बात करनी पड़ती है। ये मुद्दे थे- खेती-किसानी, आदिवासी और विस्थापन पर्यावरण-जल, जंगल, स्थानीय समुदायों की आजीविका इत्यादि। इस बातचीत पर आधारित लेख भी लिखे।

इस समय खेती-किसानी पर अभूतपूर्व संकट मंडरा रहा है। बार-बार किसान फसलचक्र बदल रहे हैं। कभी सोयाबीन तो कभी गन्ना। सोयाबीन में लगातार घाटा हो रहा है। पहले सोयाबीन यहां काफी फला-फूला है, लेकिन अब लगभग न के बराबर है। एक-दो सालों से गन्ने की ओर किसान मुड़े लेकिन समय पर उचित दाम नहीं मिलने से किसानों को निराशा ही हाथ लगी। मैदानी क्षेत्र में पहले की हल-बैल की खेती की जगह ट्रेक्टर से खेती हो रही है। हारवेस्टर से कटाई हो रही है जिससे लोगों का रोजगार भी प्रभावित हुआ है।

जबकि जंगल क्षेत्र में अब भी किसान अपनी हल-बैल और कुछ हद तक देसी बीजों की खेती कर रहे हैं। यहां खेती बारिश पर निर्भर है यानी सूखे की खेती है। इस इलाके में उतेरा या गजरा पद्धति प्रचलन में है। इसके तहत किसान एक साथ चार-पांच फसलों को मिलाकर बोते हैं। जैसे धान के साथ तुअर, तिल्ली, ज्चार इत्यादि। किसानों का कहना है कि अगर हमारी एक फसल मार खा जाती है तो दूसरी से इसकी कमी पूरी हो जाती है। कई फसलें एक साथ बोने से पोषक तत्वों का चक्र बराबर चलता रहता है। अनाज के साथ फलियां बोने से नत्रजन आधारित बाहरी निवेशों की जरूरत कम पड़ती है। फसलों के डंठल तथा पुआल उन मवेशियों को खिलाने के काम आती है जो जैव खाद पैदा करते है। धान की करधना, झीना, भदेल जैसी कम पानी वाली किस्में भी प्रचलन में है। कम पानी या पानी नहीं होने के कारण तुअर और चना की फसल प्रमुख रूप से होती हैं।

विद्याअर्जन के दो स्त्रोत माने जाते हैं। एक है-किताबी और दूसरा है-अनुभव आधारित। इस इलाके के लोग मौखिक परंपरा के वाहक हैं, लिखित नहीं। पहले तो शिक्षा ही नहीं थी। आजादी के बाद हमारी पहली या दूसरी पीढ़ी शिक्षित हो रही है। बिना पढ़े-लिखे लोगों ने ही खेती-बाड़ी, पानी का काम, तालाब, बावड़ी, कुंओं का निर्माण, जड़ी-बूटियों की जानकारी, बांस के सामान सब कुछ अनुभव से सीखा और बढ़ाया। यह कौशल अनुभव से प्राप्त होता है। जो लोकविद्या का भी स्रोत है।

हाल के वर्षों में इतिहासकारों ने भी मौखिक परंपरा द्वारा स्थानीय इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र की है। राजनीति शास्त्रियों और नृतत्वशास्त्रियों ने अपने अध्ययन के लिए साक्षात्कार का उपयोग किया है। स्थानीय वृद्ध लोगों से बातचीत कर आदिवासी पारंपरिक जीवनशैली व संस्कृति के अध्ययन के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों-जल, जंगल, जमीन के पारंपरिक उपयोग, स्वामित्व व प्रबंधन के बारे में जाना जा सकता है। लोकविज्ञान चाहे वह खेती व सिंचाई से संबंधित हो या जंगल में पाए जाने वाले औषधि या पौधे हों, आज भी वृद्ध लोगों के पास सुरक्षित है। बहरहाल, मेरे लिए बरसों बाद अपने क्षेत्र को नजदीक से जानने का यह काम काफी रोमांचक, दिलचस्प और ज्ञानवर्द्धक है। स्थानीय और परंपरागत ज्ञान आज पर्यावरण व जैव विविधता के संरक्षण व संवर्धन में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसके साथ आधुनिक ज्ञान को सीखकर, दोनों के मेल से पर्यावरण व जैव विविधता का संरक्षण किया जा सकता है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ेंगे?


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