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नाज़ुक आर्थिक दौर में संरचनात्मक बदलावों का समय

भारत को अनुसंधान और नवाचार में निवेश, श्रम उत्पादकता में सुधार, व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत और क्षेत्रीय व्यापार एकीकरण को सुदृढ़ करना चाहिए।

नाज़ुक आर्थिक दौर में संरचनात्मक बदलावों का समय
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  • जीएन बाजपयी-दीपाली गर्गे

भारत को अनुसंधान और नवाचार में निवेश, श्रम उत्पादकता में सुधार, व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत और क्षेत्रीय व्यापार एकीकरण को सुदृढ़ करना चाहिए। ये निवेश अर्थव्यवस्था में आवश्यक संरचनात्मक बदलावों को गति दे सकते हैं और वर्तमान संकट से उबरने के दौरान भी दीर्घकालिक विकास को समर्थन प्रदान करेंगे। यह संकट एक ऐसा सबक साबित हो सकता है जो भारत को विकास की गति को बनाए रखने हेतु आवश्यक बदलाव लाने के लिए बाध्य करेगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सुधारों को नई गति देने पर ध्यान देना समयोचित है। गुरुवार को मंत्रिपरिषद की साढ़े चार घंटे चली बैठक में हुई चर्चा से लगता है कि मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए कई नये सुधारों का रास्ता खुलेगा। मध्य पूर्व का मौज़ूदा संकट, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल के बाजारों में अस्थिरता आदि अब क्षेत्रीय चिंताएं मात्र नहीं रह गई हैं- ये आपूर्ति में व्यवधान और बढ़ती कीमतों से उत्पन्न वैश्विक आर्थिक झटके बन गए हैं। जापान से लेकर अमेरिका तक, विश्व भर की अर्थव्यवस्थाएं व्यापक आर्थिक अनिश्चितता एवं असुरक्षा से जूझ रही हैं।

भारत अपने कच्चे तेल का 80 प्रतिशत से अधिक, एलपीजी का 60 प्रतिशत, प्राकृतिक गैस 50 फीसदी, उर्वरक 30 फीसदी, हीलियम शत-प्रतिशत और अन्य तेल उप-उत्पादों का आयात करता है। इसमें मध्य पूर्व से 54 फीसदी कच्चा तेल, 90 फीसदी एलपीजी, 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस, 31 प्रश उर्वरक और 50 फीसदी से अधिक हीलियम और ऐसे अन्य उप-उत्पाद प्राप्त होते हैं। वास्तव में ऊर्जा आयात व्यापारिक मार्गों, प्रेषण और प्रवासी भारतीयों के संबंधों के माध्यम से भारत पश्चिम एशिया से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह स्थिति भारत को मध्य पूर्व में किसी भी दीर्घकालिक संघर्ष के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। यह उथल-पुथल मुद्रास्फीति, व्यापार संतुलन, राजकोषीय प्रबंधन, औद्योगिक उत्पादन और उपभोक्ता मांग को प्रभावित कर रही है।

उल्लेखनीय है कि छह महीने से भी कम समय पहले आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति को 'दुर्लभ स्वर्णिम काल' (रेयर गोल्डी लॉक पीरियेड) बताया था- एक ऐसी आर्थिक स्थिति जहां अर्थव्यवस्था 'न तो बहुत गर्म है और न ही बहुत ठंडी' होती है। यह नाम बच्चों की कहानी 'गोल्डिलॉक्स एंड द थ्री बेयर्स' (गोल्डिलॉक्स और तीन भालू) से लिया गया है। इसका प्रयोग 'बिल्कुल सही' स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जाता है।

उस समय असाधारण रूप से उच्च आर्थिक विकास के साथ-साथ उल्लेखनीय रूप से कम मुद्रास्फीति का दौर चल रहा था, लेकिन भू-राजनीतिक घटनाओं के तेजी से बदलते स्वरूप और वैश्विक स्तर पर झटकों के कारण स्थिति में नाटकीय रूप से बदलाव आया है।

भारत में थोक मुद्रास्फीति अप्रैल 2026 में ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण तेजी से बढ़कर 8.3 प्रतिशत हो गई। खुदरा मुद्रास्फीति 3.48 प्रति सैकड़ा तक पहुंच गई है। 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तेल की कीमतें स्थिर रहने से मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ जाएगा। तेल की बढ़ती कीमतों का प्रभाव भारत तक ही सीमित नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक जापान में अप्रैल 2026 में पिछले तीन वर्षों में सबसे तेज थोक मुद्रास्फीति दर्ज की गई। थाईलैंड, फिलीपींस और कई अन्य दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाएं गंभीर स्थिति में हैं। हालांकि शुरुआत में निर्यात में वृद्धि देखी गई लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास परिवहन में बाधा ने व्यापार प्रवाह को प्रभावित करना शुरू कर दिया है जिससे खाद्य पदार्थों, निर्मित वस्तुओं और औद्योगिक इनपुट की कीमतें बढ़ गई हैं। उपभोग कमजोर हो रहा है, यात्रा और पर्यटन बाधित हैं और वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ गया है।

सवाल यह है कि भारत को वर्तमान संकट का प्रबंधन कैसे करना चाहिए? जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है- 'ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक सुरक्षा का आधार है।' नवीकरणीय ऊर्जा- सौर, पवन, परमाणु, हरित हाइड्रोजन और जलविद्युत को बढ़ावा देकर ऊर्जा सुरक्षा को 'मिशन मोड' में लाना होगा। भारत को अनुसंधान और नवाचार में निवेश, श्रम उत्पादकता में सुधार, व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत और क्षेत्रीय व्यापार एकीकरण को सुदृढ़ करना चाहिए। ये निवेश अर्थव्यवस्था में आवश्यक संरचनात्मक बदलावों को गति दे सकते हैं और वर्तमान संकट से उबरने के दौरान भी दीर्घकालिक विकास को समर्थन प्रदान करेंगे। यह संकट एक ऐसा सबक साबित हो सकता है जो भारत को विकास की गति को बनाए रखने हेतु आवश्यक बदलाव लाने के लिए बाध्य करेगा।

इसके अलावा सेमीकंडक्टर, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात प्रतिस्थापन से बाहरी निर्भरता को कम किया जा सकता है। उच्च विकास वाली प्रौद्योगिकी और मूल्य वर्धित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने से संयुक्त रूप से बीस खरब डॉलर के वस्तु और सेवा निर्यात के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। आपूर्ति स्थिरीकरण, मुद्रास्फीति नियंत्रण और मांग प्रबंधन को प्राथमिकता देने के साथ यह दिशा तात्कालिक नुकसान को कम करने में मदद करेगी और भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी। इसके अलावा मानसून से संबंधित जोखिमों के उभरने से पहले वैकल्पिक स्रोतों से पर्याप्त ईंधन की खरीद तथा भंडार बनाए रखने, रसद संबंधी बाधाओं को कम करने, सट्टेबाजी के कारण कीमतों में होने वाली वृद्धि की निगरानी करने, लक्षित सब्सिडी के माध्यम से कमजोर परिवारों का मदद करने एवं खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।

भारतीय रिज़र्व बैंक को लिक्विडिटी को अत्यधिक सख्त किए बिना मौद्रिक सतर्कता को भी मजबूत करना चाहिए क्योंकि ब्याज दरों में वृद्धि से निवेश की मांग और कमजोर हो सकती है। नीति-निर्माताओं को अब अल्पकालिक समस्याओं से निपटने से आगे बढ़कर एक बहुस्तरीय प्रतिक्रिया रणनीति बनानी चाहिए। ध्यान केंद्रित करने योग्य मुख्य बिंदु हैं- लचीलापन, खरीद के कई विकल्प, घरेलू विनिर्माण, आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण, रेल और बहुस्तरीय रसद निवेश में वृद्धि और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार। भारत को व्यापार लागत को कम करना होगा तथा निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए बढ़ती इनपुट कीमतों से प्रभावित सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यम (माइक्रो, स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेस) को सहायता देनी चाहिए।

हम जिस संकट का सामना कर रहे हैं वह एक क्लासिक मैक्रो इकॉनॉमिक समस्या को जन्म दे रहा है: एक ऐसी समस्या जो कुल आपूर्ति और कुल मांग दोनों को एक साथ चुनौती देती है। तेल की ऊंची कीमतें निर्माताओं के लिए इनपुट लागत बढ़ाती हैं। उत्पादन लागत में वृद्धि या नकारात्मक आपूर्ति झटके के कारण, फर्म हर मूल्य स्तर पर कम उत्पादन करने का फैसला करती हैं। इसकी वजह से कीमतें बढ़ती हैं। निर्माता इन लागतों को उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं जिससे मुद्रास्फीति होती है। ईंधन एवं खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों का सामना कर रहे परिवार ऐच्छिक खर्च कम कर देते हैं। इससे कुल मांग कमजोर हो जाती है। यह संयोजन 'स्टैगफ्लेशन' की खतरनाक संभावना पैदा करता है- उच्च मुद्रास्फीति के साथ धीमी वृद्धि।

गुणक प्रभाव समस्या को और भी गंभीर बना देता है। जब व्यवसायों को बढ़ती लागत और कमजोर मांग का सामना करना पड़ता है तो वे निवेश में कटौती करते हैं, भर्तियां घटाते हैं और विस्तार को स्थगित कर देते हैं। अनिश्चितता का सामना कर रहे श्रमिक कम खर्च करते हैं जिससे समग्र मांग और भी कम हो जाती है। एक क्षेत्र द्वारा खर्च में गिरावट दूसरे क्षेत्र की आय को कम कर देती है जिससे पूरी अर्थव्यवस्था में मंदी और बढ़ जाती है। भारत के वित्त मंत्रालय ने कहा है कि मौजूदा आपूर्ति संकट घरेलू मांग को संकु चित और आर्थिक गतिविधियों को धीमा कर सकता है। इसके राजकोषीय परिणाम जल्द ही सामने आने वाले हैं। वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत का राजकोषीय घाटा लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद का 4.3 फीसदी अनुमानित था लेकिन बढ़ती सब्सिडी, ईंधन प्रबंधन लागत और कमजोर उपभोक्ताओं के संरक्षण के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है। गिरता रुपया आयात लागत को बढ़ा रहा है और मुद्रास्फीति के चक्र को और मजबूत कर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है और न ही यह आखिरी बार होगा। भारत जिस समस्या का सामना कर रहा है वह कूटनीतिक पहेली नहीं बल्कि एक मूलभूत आर्थिक और रणनीतिक असुरक्षा है। मध्य पूर्व संघर्ष राष्ट्रीय आर्थिक निर्भरताओं को कम करने का एक अवसर है जिसके तहत केन्द्रीकरण को कम किया जा सकता है, आपूर्ति और पारगमन मार्गों के वैकल्पिक स्रोत बनाए जा सकते हैं, उत्पादों तथा सेवाओं का प्रतिस्थापन किया जा सकता है और विकास के कारकों में विविधता लाई जा सकती है। जैसा कि जॉन मेनार्ड कीन्स ने सलाह दी थी- 'कठिनाई नए विचारों को विकसित करने में उतनी नहीं है जितनी पुराने विचारों से छुटकारा पाने में है।'

(लेखक बाजपेयी एलआईसी और सेबी के पूर्व अध्यक्ष व गर्गे राष्ट्रीय बीमा अकादमी सदस्य हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


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