ललित सुरजन की कलम से साथ-साथ चुनाव करवाने का विचार
'पहले एक सदस्यीय चुनाव आयोग था वह तीन सदस्यीय हो गया। चुनाव का जो उत्सवी माहौल था उस पर अनेक तरह के बंधन लगा दिए गए।

'पहले एक सदस्यीय चुनाव आयोग था वह तीन सदस्यीय हो गया। चुनाव का जो उत्सवी माहौल था उस पर अनेक तरह के बंधन लगा दिए गए। चुनाव की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से बहुत लंबी कर दी गई। मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। चुनावों में कोई धांधली न हो तथा कानून व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े इसके लिए पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। जब एक साथ चुनाव होंगे तो एक के बजाय दो वोट डालने में पहले से दोगुना समय तो लगेगा ही इसके लिए अमला भी दोगुना लगाना पड़ेगा। इसकी पूर्ति कहां से होगी तथा वोट डालने के लिए दोगुना समय कहां से लाया जाएगा? अगर आज की तरह दो-दो माह तक चुनाव चले तो क्या पूरे देश में सारे सरकारी काम स्थगित कर दिए जाएंगे? इन सारी बातों पर विचार कर सरकार ने अगर कोई रूपरेखा बनाई हो तो वह आम जनता के सामने आना चाहिए। उस पर जनता में खुलकर बहस होना चाहिए उसके बाद ही कोई निर्णय लेना उचित होगा।'
(देशबन्धु में 23 जून 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/06/blog-post_22.html


