Top
Begin typing your search above and press return to search.

केजरीवाल की विचारहीन राजनीति का यही अंजाम होना था

निहित स्वार्थों से प्रेरित कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया के भरपूर समर्थन से परवान चढ़े एक विचारहीन और अराजक आंदोलन से पैदा हुई आम आदमी पार्टी का यही हश्र होना था, जो अभी हो रहा है

केजरीवाल की विचारहीन राजनीति का यही अंजाम होना था
X
  • अनिल जैन

राजनीति को हिकारत से देखने वाले केजरीवाल इस पार्टी के माध्यम से राजनीति में आए और छा भी गए। तब केजरीवाल, उनके साथियों, प्रशंसकों और मीडिया के भी एक बड़े हिस्से ने आम आदमी पार्टी के उदय को एक 'नई राजनीति' के रूप में पेश किया था। हालांकि आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास से और राजनीति को पर्दे के पीछे से संचालित करने वाली ताकतों से परिचित लोग तब भी इस 'नयेपन' की हकीकत से बाखूबी वाकि़फ थे।

निहित स्वार्थों से प्रेरित कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया के भरपूर समर्थन से परवान चढ़े एक विचारहीन और अराजक आंदोलन से पैदा हुई आम आदमी पार्टी का यही हश्र होना था, जो अभी हो रहा है। यह सही है कि आम आदमी पार्टी के विभाजन यानी राज्यसभा में उसके 10 में से 7 सांसदों को तोड़कर अपने पाले में लाने के काम को भाजपा ने अपने कुु ख्यात 'ऑपेशन लोटस' के जरिये अंजाम दिया है, जिसमें हमेशा की तरह उसने ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग का भी इस्तेमाल किया है। मगर आम आदमी पार्टी की इस स्थिति के लिए मूलत: उसके सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने राज्यसभा के लिए अपने जैसे ही विचारहीन और सिद्धांतहीन लोगों का चयन किया था। इस सिलसिले में उन पर राज्यसभा के टिकट बेचने और अपने सजातीय लोगों को उपकृत करने के आरोप भी लगे।

दरअसल डेढ़ दशक पहले 2011 में जब तथाकथित गांधीवादी अण्णा हजारे को भ्रष्टाचार के विरोध का 'प्रतीक पुरुष' बना कर दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन किया जा रहा था, तब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उस आंदोलन की तुलना अरब स्प्रिंग और काहिरा (मिस्र) के तहरीर चौक पर हुई क्रांति से कर रहा था। कॉरपोरेट घरानों से पोषित टेलीविजन चैनलों पर उस आंदोलन का 24 घंटे सीधा प्रसारण हो रहा था। अरविंद केजरीवाल उस आंदोलन के मंच से राजनीतिक दलों और नेताओं को चोर, बेईमान और भ्रष्ट करार देते हुए राजनीति से अपनी नफरत का इज़हार कर रहे थे। उनके तेवरों को देखते हुए कोई नहीं कह सकता था कि जिस राजनीति को यह व्यक्ति पानी पी-पीकर कोस रहा है, कुछ ही महीनों बाद यही व्यक्ति उसी राजनीति का एक महत्वपूर्ण किरदार बन जाएगा। टीवी चैनलों में कार्यरत कुछ पत्रकार तो केजरीवाल में 'दूसरा चे ग्वारा' और अण्णा हजारे में 'दूसरा गांधी' तक देखने लगे थे।

मगर चंद महीनों बाद ही अण्णा हजारे से अलग होकर केजरीवाल ने अपने साथियों के साथ सक्रिय राजनीति में उतरने का ऐलान कर दिया। आंदोलन की कोख से जन्मी उनकी आम आदमी पार्टी को भ्रष्टाचार के खिलाफ़ शहरी मध्य वर्ग के गुस्से का प्रतिनिधित्व करती हुई एक विद्रोही पार्टी माना गया, जिसका गर्भधारण सड़कों पर विरोध-प्रदर्शनों से हुआ था। राजनीति को हिकारत से देखने वाले केजरीवाल इस पार्टी के माध्यम से राजनीति में आए और छा भी गए। तब केजरीवाल, उनके साथियों, प्रशंसकों और मीडिया के भी एक बड़े हिस्से ने आम आदमी पार्टी के उदय को एक 'नई राजनीति' के रूप में पेश किया था। हालांकि आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास से और राजनीति को पर्दे के पीछे से संचालित करने वाली ताकतों से परिचित लोग तब भी इस 'नयेपन' की हकीकत से बाखूबी वाकि़फ थे।

अण्णा-केजरीवाल के आंदोलन को काफी कुछ बौद्धिक ऊर्जा उस विवेकानंद फाउंडेशन से मिली थी, जो व्यावहारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का थिंक टैंक है। उस आंदोलन के लिए सभी जरूरी साधन-संसाधन जुटाने में भी संघ का परोक्ष सहयोग था। आंदोलन के दौरान भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ केजरीवाल और उनके साथियों की बैठकें भी होती थीं। हालांकि आम लोगों के सामने भी इस 'नयेपन की राजनीति' को उजागर होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा, जब 2014 आते-आते उस आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख चेहरे भाजपा से जुड़ते गए और केंद्र में उसकी सरकार बनने पर ऊंचे-ऊंचे पदों को प्राप्त हो गए।

अण्णा-केजरीवाल का भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन और आम आदमी पार्टी के उदय की परिघटना इस लिहाज से भी गौरतलब थी कि अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियों की मदद से फल-फूल रहे गैर सरकारी संगठनों व एनजीओ ने जन-आंदोलनों की धार कुंद करते हुए आक्रामक तेवर के साथ राजसत्ता तक अपनी पकड़ मजबूत करने की मुहिम तेज कर दी थी। देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों की हमदर्द इन एजेंसियों के सिपहसालार आम जनता की बदहाली और बेसब्री का फायदा उठाते हुए उसे यह समझाने में जुट गए कि भ्रष्टाचार, गरीबी और महंगाई जैसी दुश्वारियों से निजात पाने के लिए किसी विचार की जरूरत नहीं है। ऐसा समझाने वालों में खुद अरविंद केजरीवाल भी थे।

फिर भी यह सच है कि इतना सब कुछ उजागर होने के बावजूद केजरीवाल दस साल मुख्यमंत्री भी रह लिए। इस दौरान एक विरोधाभासी नारा भी लगा- 'मोदी फॉर पीएम-केजरीवाल फॉर सीएम।' इस नारे के अनुरूप केंद्र में मोदी की सरकार बनी और दिल्ली में केजरीवाल की। यह हैरानी की बात है कि एक ही मतदाता ने एक ही समय में दो अलग-अलग तरह की धाराओं में तैरने वालों को एक साथ कैसे चुन लिया? जाहिर है कि दोनों किरदारों के बीच दिखने वाला फर्क आभासी ही था।

राजनीति को संभावनाओं का खेल माना जाता है तो केजरीवाल संभावनाओं की पैदाइश है । उनके पास अपनी राजनीति का कोई मौलिक विचार नहीं है। उन्होंने अपने को भाजपा से भी बड़ा हिंदुत्ववादी दिखाने के लिए कई हास्यास्पद उपक्रम किए। देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए करेंसी नोटों पर लक्ष्मी-गणेश की तस्वीरें छापने जैसी मूर्खतापूर्ण मांग भी उन्होंने की। अपने को हनुमान भक्त बताया और लोगों को सरकारी खर्च पर अयोध्या सहित तमाम तीर्थस्थलों की यात्राएं भी कराईं। कोरोना महामारी के दौरान भाजपा की तर्ज पर तब्लीगी जमात के जरिए मुसलमानों को बदनाम करने में भी उनकी सरकार ने कोई कोताही नहीं की और दिल्ली में दंगों के दौरान भी उनकी सरकार व पार्टी पीड़ितों के साथ न खड़ी होकर पुलिस के साथ और प्रकारांतर से केंद्र सरकार व भाजपा के साथ खड़ी दिखी।

अनुच्छेद 370, राम मंदिर, रोहिंग्या और बांग्लादेशी, नागरिकता कानून जैसे मुद्दों पर भी केजरीवाल भाजपा के साथ रहे। फिर जब उन्हें सुविधाजनक लगा तो वह कांग्रेस के साथ चले गए। दिल्ली में पहली बार सरकार बनाने के लिए उस कांग्रेस से भी समर्थन लेने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ, जिसकी 15 साल पुरानी सरकार को उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हराया था। यह सब करना उनके लिए इसलिए आसान था क्योंकि उन पर विचारधारा का कोई बोझ नहीं था। यही वजह रही कि कई मौकों पर उन्होंने महात्मा गांधी की समाधि पर जाकर अपने को बापू के प्रति आस्थावान दिखाया तो मौका आने पर अपनी पार्टी और सरकार के दफ्तरों से गांधीजी की तस्वीरें हटाकर उनकी जगह भगत सिंह और डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर की तस्वीरों का इस्तेमाल करने लगे। इस समय भी वे अदालती लड़ाई लड़ते हुए अपने को गांधी मार्ग का अनुगामी बता रहे हैं।

केजरीवाल की राजनीति सिर्फ विचारधारा विहीन ही नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपनी पार्टी को भी संगठनात्मक शक्ल देने में कोई रूचि नहीं दिखाई। अक्टूबर 2012 में आम आदमी पार्टी का गठन हुआ था और केजरीवाल इसके संयोजक बने थे। तब से लेकर आज तक वे ही इसके संयोजक बने हुए हैं। दिखावे के तौर पर पार्टी में एक राष्ट्रीय सचिव, एक कोषाध्यक्ष और 34 सदस्यीय एक राष्ट्रीय परिषद भी हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर इन सबका कोई मतलब नहीं है। केजरीवाल पार्टी के सुप्रीमो हैं और सारे फैसले वे ही करते हैं।

तो जहां विचारधारा की अनुपस्थिति हो, कोई विधिवत बना हुआ सांगठनिक ढांचा न हो- स्वाभाविकत: वहां मूल्य पनप नहीं सकते। यही कारण है कि डिज़ाइनर आंदोलन के अति उत्साह से निकला राजनीतिक दल केजरीवाल का निजी उपक्रम बन कर रह गया जिसमें असहमतियों के लिए कोई जगह नहीं रही। आम आदमी पार्टी कभी भी इस आरोप के साये से बाहर नहीं निकल सकी कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आनुषंगिक उपकरणों की एक कड़ी मात्र अथवा भाजपा की बी टीम है।

केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी का गठन करने के बाद झाड़ू को अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह बनाते हुए उसका प्रतीकात्मक अर्थ बताया था कि आम आदमी पार्टी इस झाड़ू से देश की राजनीति को साफ करेगी, लेकिन व्यवहार में उन्होंने अपने इस दावे के ठीक उलट काम किया। असुरक्षा और हीनता के बोध से ग्रस्त केजरीवाल ने सबसे पहले इस झाड़ू से पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, जस्टिस संतोष हेगडे, अधिवक्ता प्रशांत भूषण, समाजवादी चिंतक प्रो. आनंद कुमार, प्रो. अजीत झा, मेधा पाटकर, योगेंद्र यादव, राजमोहन गांधी, पत्रकार आशुतोष, एडमिरल (सेवानिवृत्त) रामदास आदि जैसे उन सभी लोगों को पार्टी से बाहर किया, जो राजनीति को स्वच्छ करने की थोड़ी सी भी इच्छा रखते थे, जो अपनी वैचारिकी और अपने व्यक्तित्व से पार्टी को एक आभा प्रदान कर सकते थे। इन सब लोगों को बाहर करने के बाद उन्होंने इसी झाड़ू से इधर-उधर पड़ा तमाम तरह का कूड़ा-करकट बटोरकर उससे अपनी पार्टी को सजाया। अब सात सांसद के रूप में वही कचरा अपनी थोड़ी सी हैसियत बनाकर हवा में उड़ता हुआ सड़ांध फैला रहे कूड़े के विशाल ढेर (लैंडफिल साइट) पर जा बैठा है।

कुल मिला कर आम आदमी पार्टी की वही गति होती दिख रही है, जो असम में चार दशक पहले बनी असम गण परिषद की हुई है। असम के छात्रों की वह पार्टी भी आंदोलन से जन्मी थी और धूमधाम से ताजा हवा के झोंके की तरह सत्ता में आई थी लेकिन एक दशक के भीतर ही असम की राजनीति में उसने अपनी भूमिका खो दी। आज उसका कोई नामलेवा नहीं है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it