यह प्रधानमंत्री की शर्मिंदगी नहीं, बौखलाहट है
देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों भारी अफरातफरी के माहौल में संपन्न हुए अंतरराष्ट्रीय आर्टिफिशल इंटेलिजंस यानी एआई समिट के दौरान कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित उनकी पूरी सरकार, उनकी पार्टी और उसका इको सिस्टम बेहद खफा और परेशान हैं

- अनिल जैन
दरअसल मोदी के लिए लोकतंत्र का मतलब महज किसी भी तरह से चुनाव जीतना है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्ता, विपक्ष से संवाद और सरकार से असहमति आदि के लिए उनके लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है। इसलिए वे अपनी सरकार के खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज को देशविरोधी करार देने में कोई देरी या संकोच नहीं करते।
देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों भारी अफरातफरी के माहौल में संपन्न हुए अंतरराष्ट्रीय आर्टिफिशल इंटेलिजंस यानी एआई समिट के दौरान कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित उनकी पूरी सरकार, उनकी पार्टी और उसका इको सिस्टम बेहद खफा और परेशान हैं। प्रधानमंत्री ने एक जनसभा में अपने गुस्से का इजहार करते हुए आहत स्वर में कांग्रेस के नेताओं को 'नंगा' कहते हुए उन पर विदेशी मेहमानों के सामने देश की छवि खराब करने का आरोप लगाया है। तमाम मंत्री और भाजपा के नेता मोदी से भी एक कदम आगे बढ़कर राहुल गांधी को 'देशद्रोही' और 'लफंगा' करार दे रहे हैं। चूंकि सरकार और भाजपा परेशान है, लिहाजा उसके प्रचार तंत्र की भूमिका निभाने वाले मीडिया का परेशान होना भी लाजिमी है, सो वह भी कुछ इसी तरह के लहजे में राहुल गांधी और कांग्रेस को कोस रहा है।
दरअसल मोदी के लिए लोकतंत्र का मतलब महज किसी भी तरह से चुनाव जीतना है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्ता, विपक्ष से संवाद और सरकार से असहमति आदि के लिए उनके लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है। इसलिए वे अपनी सरकार के खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज को देशविरोधी करार देने में कोई देरी या संकोच नहीं करते। इसकी वजह यह भी है कि उनकी राजनीतिक परवरिश लोकतांत्रिक माहौल में नहीं बल्कि एकचालकानुवर्तित्व के माहौल में हुई है। उन्होंने सत्ता में आने से पहले के अपने राजनीतिक जीवन में सरकारविरोधी किसी आंदोलन में शिरकत नहीं की और जेल जाना तो दूर, किसी पुलिस थाने का मुंह तक नहीं देखा। इसलिए उन्हें किसी भी मुद्दे पर अपनी सरकार का विरोध बेहद अटपटा लगता है और वे बौखला जाते हैं।
मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद दुनिया के अधिकांश देशों की यात्राएं कर चुके हैं। प्रधानमंत्री और गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले भी आधुनिक विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र कहे जाने वाले अमेरिका की यात्रा तो उन्होंने कई बार की है, जैसा कि वे खुद कई मर्तबा बतला चुके हैं। इसके बावजूद वे इस तथ्य से अनजान हैं कि लोकतांत्रिक देशों में अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के दौरान किसी मुद्दे को लेकर विरोध-प्रदर्शन होना कोई नई बात नहीं है। अमेरिका सहित यूरोप के तमाम देशों में अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के मौके पर वहां के राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, छात्र या मानवाधिकार संस्थाएं किसी मुद्दे को लेकर विरोध और प्रदर्शन करते रहते हैं, लेकिन वहां विरोध करने वालों को देशद्रोही कहना तो दूर गिरफ्तार भी नहीं किया जाता है। मोदी ने खुद भी प्रधानमंत्री के नाते ऐसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में शिरकत की है और कुछ आयोजनों के दौरान तो वहां मोदी के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए हैं।
हमारे ही देश में पहले कई अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के मौके पर ऐसे विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के आयोजन के खिलाफ़ लोकदल के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया था। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को कुछ घंटों के लिए हिरासत में लिया था और फिर छोड़ दिया था। किसी ने उन्हें 'देशद्रोही' या लोकदल के नेता चौधरी चरणसिंह को 'नंगा' नहीं कहा था। उसके बाद दिल्ली में ही 1983 में गुटनिरपेक्ष देशों का शिखर सम्मेलन हुआ था, जिसमें 100 से ज्यादा देशों ने हिस्सा लिया था। उस आयोजन के मौके पर लोकदल और वामपंथी दलों ने कुछ ही समय पहले असम में हुए शर्मनाक नेल्ली नरसंहार की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रदर्शन किया था, लेकिन किसी ने प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही नहीं कहा था और न ही देश की छवि खराब होने का राग अलापा था। दिल्ली में ही 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के मौके पर भाजपा ने विरोध प्रदर्शन किया था। तब भी किसी ने प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही नहीं कहा और न ही किसी को गिरफ्तार किया।
बहरहाल एआई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का विरोध-प्रदर्शन रणनीतिक रूप से सही था या गलत, इस पर तो बहस हो सकती है मगर इसमें शर्मसार होने जैसी कोई बात नहीं है। फिर भी प्रधानमंत्री और उनके तमाम सहयोगी नाराज़ हुए जा रहे हैं। जबकि एआई समिट के दौरान के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के अलावा ऐसी कई बातें हुई हैं, जिनके लिए प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को शर्मसार होना चाहिए था, लेकिन वे नहीं हो रहे हैं। आयोजन के पहले दिन प्रधानमंत्री के फोटो सेशन के लिए आयोजन स्थल को पांच घंटे के लिए पूरी तरह खाली करा लिया गया था, जिससे विदेशी मेहमानों को काफी परेशानी हुई और उस दौरान कई विदेशी मेहमानों के कीमती सामान चोरी हो गये परन्तु इस पर किसी को शर्म नहीं आ रही है।
एआई समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन में बने रोबोटिक डॉग को अपने यहां निर्मित हुआ बताते हुए उसका प्रदर्शन किया। यही नहीं, उस चीनी रोबोटिक डॉग को भारत सरकार के सूचना तकनीकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी भारतीय आविष्कार और प्रधानमंत्री मोदी के विजन का परिणाम बताया, जिससे दुनिया भर में भारत की किरकिरी हुई, लेकिन मोदी सहित किसी को भी शर्म ने छुआ तक नहीं। गौरतलब है कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी ने इस गलगोटिया यूनिवर्सिटी को टॉप यूनिवर्सिटी के अवार्ड से नवाजा था।
वैसे एआई समिट के अलावा भी पिछले 12 वर्षों के दौरान देश में ऐसे कई वाकये हुए हैं जिनसे दुनिया में भारत की छवि खराब हुई है लेकिन किसी को शर्म नहीं आई- न प्रधानमंत्री को, न उनकी सरकार व पार्टी को और न ही मुख्यधारा के मीडिया को। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने देश के मीडिया के समक्ष कहते हैं, 'मैं प्रधानमंत्री मोदी का कैरियर बर्बाद कर सकता हूं, इसलिए मुझे खुश करना मोदी की मजबूरी है।' संप्रभुता संपन्नता भारत को अपमानित करने वाले इस बयान पर किसी को शर्म नहीं आती। यही नहीं, ट्रंप ने 50 से अधिक बार कहा है कि उन्होंने ही भारत और पाकिस्तान को धमका कर उनके बीच सीज़फायर करवाया। ट्रम्प के इस दावे पर किसी का जमीर नहीं जागता।
सुदूर पूर्वोत्तर के मणिपुर में जब एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय की महिलाओं को नंगा करके सड़कों पर घुमाते हैं, जिसकी खबरें दुनिया भर के मीडिया में प्रमुखता से जगह पाती हैं, तब भी प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी को शर्म नहीं आती है। देश में हिंदू राष्ट्र और सनातन का राग अलापने वाले महंत और महामंडलेश्वर जब यौन दुराचार के मामलों में रंगे हाथों पकड़े जाते हैं तब भी किसी को शर्म नहीं आती। उस समय भी किसी को शर्म नहीं आती जब बलात्कार के सज़ायाफ्ता लोगों की सज़ा माफ कर दी जाती है और उनके जेल से रिहा होने पर हार-फूलों से उनका स्वागत किया किया जाता है।
भारत की छवि तब भी खराब नहीं होती है जब देश की उच्च अदालतें बलात्कार जैसे वीभत्सतम अपराध की उलजुलूल व्याख्या करते हुए बलात्कारियों की हौसला अफजाई करती हैं, लेकिन किसी को शर्म नहीं आती। जब भाजपा शासित उत्तराखंड में 20 साल की एक युवती को सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली नेता अपनी हवस का शिकार बनाकर उसकी हत्या कर देते हैं, तब भी किसी को शर्म नहीं आती है। शर्मसार होने से जैसे और भी कई मामले हैं और संचार क्रांति के दौर में उनकी जानकारी दुनिया भर को है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार उनसे बेखबर रहती है।
अमेरिका के कुख्यात यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन की फाइलों में नाम आने पर दुनिया भर में कई सत्तारूढ़ नेताओं और उच्च अधिकारियों के इस्तीफे हो चुके हैं। उन फाइलों में भारत के प्रधानमंत्री मोदी, उनके मंत्रियों और उनके दोस्त उद्योगपतियों का भी नाम आना तथा सरकार के एक मंत्री के एपस्टीन से करीबी संबंधों का खुलासा हो जाना पूरे देश के लिए शर्म की बात है, पर सरकार, सत्तारूढ़ दल और मीडिया के स्तर पर शर्म का कोई अता-पता नहीं है। इन सभी को शर्म आती है तो सिर्फ प्रधानमंत्री की छवि चमकाने की कवायद के तहत हुए एआई समिट में प्रमुख विपक्षी पार्टी के 12 कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन पर।
मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान एक टीवी इंटरव्यू में कहा था, 'लोकतंत्र में ऐसा मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरूरी है, जो सरकार को तलवार की धार पर चलने के लिए मजबूर कर दे। मुझे प्रधानमंत्री बनने के बाद एक ही बात का अफसोस है कि मुझे मजबूत विपक्ष नहीं मिला, इससे मेरा दिल दुखता है।' उस चुनाव में व्यापक पैमाने पर हुई गड़बड़ियों और चुनाव आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये के बावजूद चुनाव परिणामों से प्रधानमंत्री की इच्छा पूरी हुई। उन्हें एक मजबूत विपक्ष मिला लेकिन अफसोस है कि वह विपक्ष प्रधानमंत्री को रास नहीं आ रहा है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


