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हैरान करती है सरकार और न्यायपालिका की यह जुगलबंदी

राज्यपालों के जरिए राज्यों के अधिकार क्षेत्र में केंद्र के दखल की शिकायतें हाल के वर्षों में बढ़ती चली गई हैं

हैरान करती है सरकार और न्यायपालिका की यह जुगलबंदी
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  • अनिल जैन

राज्यपालों के जरिए राज्यों के अधिकार क्षेत्र में केंद्र के दखल की शिकायतें हाल के वर्षों में बढ़ती चली गई हैं। विधानसभाओं से पारित ऐसे विधेयक, जिनसे केंद्र सहमत न हो, उन्हें कानून न बनने देने के लिए राज्यपालों ने उन पर दस्तखत न करने का तरीका अपनाया है। अत: इससे परेशान गैर-एनडीए शासित राज्य सरकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल के फैसले को बड़ी राहत माना गया।

पांच दशक पहले आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तो महज मंशा जाहिर की थी कि न्यायपालिका सरकार के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए, लेकिन उनकी यह मंशा पिछले कुछ वर्षों से मूर्तरूप लेती दिख रही है। सर्वोच्च और उच्च अदालतों के न्यायाधीश न सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी करते हुए प्रधानमंत्री की तारीफ कर रहे हैं, बल्कि उनके फैसले भी सरकार और सत्तारूढ़ दल की मंशा के मुताबिक आ रहे हैं। ऐसा सिर्फ संवैधानिक और नीतिगत मामलों में ही नहीं बल्कि गंभीरतम आपराधिक मामलों में भी हो रहा है। यह भी कम चिंताजनक बात नहीं है कि अगर सर्वोच्च अदालत की ओर से कोई फैसला सरकार की मंशा के मुताबिक नहीं आता है तो सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से फैसला देने वाले जज पर देशविरोधी होने का आरोप तक लगा दिया जाता है (संदर्भ : भारतीय जनता पार्टी सांसद निशिकांत दुबे का 20 अप्रैल 2025 को लोकसभा में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना पर आरोप)।

हाल के कुछ वर्षों का रिकॉर्ड उठाकर देखें तो पता चलता है कि सर्वोच्च अदालत और कुछ उच्च अदालतों ने भाजपा नेताओं और भाजपा से करीबी संबंध रखने वाले कारोबारियों, पूर्व नौकरशाहों व अन्य लोगों को राहत देने और विपक्षी पार्टियों के नेताओं की नकेल कसने में कोई कोताही नहीं बरती है। अपवाद के तौर पर भी किसी भाजपा नेता या भाजपा से जुड़े व्यक्ति को अदालत ने निराश नहीं किया है। गंभीर से गंभीरतम आपराधिक मामलों में फंसे जिस भी व्यक्ति ने राहत मांगी है, उसे राहत मिली है। उसी तरह अपवाद स्वरूप किसी विपक्षी नेता या सरकार से असहमत किसी व्यक्ति को राहत मिलना तो दूर, उल्टे उसे अदालत की सख्ती का सामना करना पड़ा है।

पिछले कुछ दिनों में ही न्यायपालिका के कुछ फैसले ऐसे आए हैं, जिनसे न सिर्फ न्यायापालिका पर से लोगों का विश्वास उठा है बल्कि यह भी आभास हुआ है कि न्यायपालिका भी अब सरकार का ही हिस्सा बन गई है। पिछले नवंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट ने बैंक धोखाधड़ी के एक बहुचर्चित मामले के अभियुक्तों को कुछ पैसा बैंक को चुकाने का निर्देश देकर मामला खत्म करने की इजाजत दे दी। स्टर्लिंग बायोटेक लिमिटेड कंपनी के मालिक संदेसरा बंधुओं पर 14,000 करोड़ रुपये के घपले का आरोप है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनसे कहा कि वे 5,100 करोड़ रुपये का भुगतान कर गंभीर आरोपों में चल रहे मुकदमों से मुक्त हो जाएं। नितिन एवं चेतन संदेसरा उन भगोड़ों में हैं, जो वित्तीय संस्थाओं को भारी चूना लगा कर देश से भाग निकले। चेतन की पत्नी दीप्ति और उनके परिवार के सदस्य हितेश पटेल को भी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भगोड़ा घोषित कर रखा है। सवाल यह है कि क्या भारतीय न्याय प्रणाली के तहत किसी व्यक्ति को वित्तीय जुर्माना चुका कर आपराधिक अभियोग से मुक्त होने का अवसर दिया जाना चाहिए? इस मामले में कोर्ट ने कहा है कि इसे भविष्य के लिए उदाहरण नहीं माना जाएगा। जो भी हो, संदेसरा बंधुओं को यह लाभ मिला है, तो आखिर किस तर्क पर विजय माल्या या नीरव मोदी या वैसे अन्य आर्थिक अभियुक्तों को इससे वंचित रखा जा सकता है?

ऐसे ही एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन आइडिया (वीआई) कंपनी पर बकाया एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) की कुल रकम का पुनर्मूल्यांकन करने और उसे माफ करने की अनुमति केंद्र को दे दी है। यह फैसला भी पिछले नवंबर महीने में ही आया और उसी दिन आयकर विभाग ने ट्रांसफर प्राइसिंग केस में इस कंपनी पर 8,500 करोड़ रुपये के बकाया से संबंधित मुकदमे को वापस ले लिया। 2020 के न्यायिक निर्णय के मुताबिक वीआई पर 58,254 करोड़ रुपये का बकाया एजीआर तय किया गया था। ब्याज, जुर्माना और जुर्माने पर ब्याज के साथ यह रकम 83,400 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। अब यह सारी रकम माफ की जा सकेगी। दरअसल, जब कभी ऐसे कदम उठाए जाते हैं तो उसके लिए तर्क गढ़ लिए जाते हैं। रोजगार बचाना एक आम दलील है। वीआई के मामले में यह भी कहा गया कि अगर कंपनी $फेल हुई, तो बाजार में जियो और एयरटेल का द्वि-अधिकार हो जाएगा। मगर भारत सरकार को द्वि या एकाधिकार से कोई दिक्कत है, इसे मानने का शायद ही कोई आधार मौजूद हो! असल मकसद है अपनी अक्षमताओं के कारण नाकाम हो रही एक कंपनी को बचाना। जाहिर है कि ऐसे कदम याराना पूंजीवाद के दायरे में आते हैं। मगर आज इसकी शायद ही किसी को $िफक्र हो। सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं।

कानून यह है कि कोई किसी भी निर्माण परियोजना पर काम पर्यावरण संबंधी मंजूरी मिलने के बाद ही होना चाहिए। मगर सरकार ने पहले 2017 में एक अधिसूचना और फिर 2021 में ऑफिस मेमोरेंडम के माध्यम से प्रावधान कर दिया कि बिना पर्यावरण संबंधी हरी झंडी लिए जिन परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ चुका है, उन्हें बाद में ऐसी मंजूरी दी जा सकेगी। इस प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस वर्ष मई में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को रद्द कर दिया। दो जजों की बेंच ने उचित निर्णय दिया कि ऐसा करना कानून और उसकी भावना के खिलाफ़ है। मगर चूंकि इस फैसले से बड़े-बड़े हित प्रभावित हो रहे थे, तो पुनरीक्षण याचिका पर कोर्ट ने तीन जजों की बेंच बनाई। उस बेंच ने 2-1 के बहुमत से मई में दिए गए फैसले को पलट दिया है। यानी पर्यावरण मंजूरी की बिना परवाह किए काम शुरू करो और बाद में मंजूरी ले लो- यह चलन जारी रहेगा। संदेश साफ है, जब धनी-मानी लोगों के हित जुड़े हों तो अक्सर कानून की परिभाषा बदल जाती है!

इससे कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के मामले में अपने ही एक फैसले को पलट दिया है। बल्कि उससे भी आगे जाते हुए तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने व्यवस्था दे दी कि राज्यपाल के विधेयकों को लटकाए रखने जैसे मामलों को कोर्ट में नहीं लाया जा सकता। यानी बीते अप्रैल में तमिलनाडु सरकार बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में खुद उसने जो निर्णय दिया, उसके बारे में अब उसकी राय है कि उसने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर व्यवस्था दी! तब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 200 की व्याख्या करते हुए कहा था कि विधानसभाओं से दोबारा पारित विधेयकों पर राज्यपालों को 90 दिन के अंदर सहमति देनी होगी। ऐसा न होने पर समझा जाएगा कि संबंधित विधेयक को मंजूरी मिल गई है।

राज्यपालों के जरिए राज्यों के अधिकार क्षेत्र में केंद्र के दखल की शिकायतें हाल के वर्षों में बढ़ती चली गई हैं। विधानसभाओं से पारित ऐसे विधेयक, जिनसे केंद्र सहमत न हो, उन्हें कानून न बनने देने के लिए राज्यपालों ने उन पर दस्तखत न करने का तरीका अपनाया है। अत: इससे परेशान गैर-एनडीए शासित राज्य सरकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल के फैसले को बड़ी राहत माना गया। मगर वह फैसला केंद्र सरकार को हजम नहीं हुआ। उसने सीधे पुनर्विचार याचिका दायर करने के बजाय राष्ट्रपति के रेफरेंस से मामले को दोबारा कोर्ट के पास भेजा, जिस पर आए फैसले से धारणा यही बनी कि सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक व्यवस्था की व्याख्या केंद्र सरकार की सोच के अनुरूप की है।

यह तो हुए आर्थिक अपराध, याराना पूंजीवाद और संवैधानिक प्रावधान की व्याख्या से जुड़े मामले। इनके अलावा सबसे हैरतअंगेज मामला दो सप्ताह पहले का है, जिसमें उन्नाव के सामूहिक बलात्कार कांड में उम्र कैद की सजा पाए भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत दे दी। अदालत के इस फैसले का व्यापक और तीव्र विरोध हुआ। महिला संगठनों ने दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया। यही नहीं, सामूहिक बलात्कार कांड की पीड़िता ने सरेआम हाई कोर्ट के जजों पर पैसा खाकर फैसला देने का आरोप लगाया। यह सीधे तौर पर अदालत की अवमानना है मगर अब भारत में ऐसा होने लगा है और इसके लिए सिर्फ न्यायपालिका ही जिम्मेदार है। हालांकि मामले की गंभीरता को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगानी पड़ी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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