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ये हल्के डुबाने वाले

एक नाव में पचास लोग सवार थे, जिनमें दस बुद्धिजीवी थे। नाव में छेद हो गया और पानी भरने लगा

ये हल्के डुबाने वाले
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  • संजीव परसाई

एक नाव में पचास लोग सवार थे, जिनमें दस बुद्धिजीवी थे। नाव में छेद हो गया और पानी भरने लगा। सबने सोचा कि वजन कम हो तो बचने की संभावना ज़्यादा होगी। वे नाव से समान फेंकने लगे, फिर भी वज़न कम न हुआ। तो बुद्धिजीवियों पर नज़र गई, उनके पास फेंकने को कुछ नहीं था। जान, और सम्मान बचाने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपनी बुद्धि को नदी में फेंक दिया। नाव हल्की हो गई, सब सुरक्षित पार उतर गये।

आज का दौर इसी तरह यथासंभव हल्के होने का दौर है।

आर्किमिडीज़ के सिद्धान्त को मानें तो हल्के और भारी का अंदाजा लगाना बहुत आसान है। जो डूबे सो भारी, तैरता रहे तो हल्का। लेकिन अगर बात मनुष्य की हो तो ये बड़ा मुश्किल हो जाता है। आखिर कितनों को डुबा-डुबा कर परखेंगे। तैरते रहने का ये मंत्र आज के दौर में बड़े काम का है। भारी होगा तो उसका अंत तय है। हल्का है तो किसी न किसी के सहारे किनारे लग ही जाएगा। अगर किनारे न लगा तो भी कम से कम डूबेगा तो नहीं।

राजनीति में हल्के लोगों की बड़ी कदर है। भारी को ढोने कोई तैयार नहीं है। सबको ऐसे लोग चाहिए जो भारहीनता में सिद्धहस्त हों, उड़ते फिरें, आनंद लें और वैचारिक भार से मुक्त हों।

हल्का होना एक निजी अनुभव है, इसका निरंतर अभ्यास जरूरी है। यह अगर स्थाई नहीं है, तो बड़ा मुश्किल होगा। कल्पना करो, कि जिस आदमी को हल्का जान कांधे पर बिठाया, उसका वजन अचानक बढ़ जाये तो क्या हो। एक नेता जी ने सार्वजनिक मंच से विरोधी पक्ष को गाली बक दी। $फजीहत हुई तो ऊपर वाले के कहने पर खेद भी जता दिया। दो दिन बाद ऊपर वाले का मन बदल गया उसने कहा फिर बक दो, अबकी बार उसने विरोधी को नहीं अपने नेता का ही अपमान कर दिया। इस घटना के दो पहलू हैं - एक तो पहले वो हल्का था, दूसरी बार में अचानक उसका भार बढ़ गया । हल्के होने पर वो विचार शून्य था, लेकिन दूसरी बार उसने अपना दिमाग चला दिया।

एक कुलपति ने आमंत्रित लेखक को ही कार्यक्रम से बाहर करवा दिया। सब शुक्र मना रहे हैं, वो धकिया भी सकते थे। लेखकों को अब लेखकीय गरिमा को घर पर छोड़कर ही निकलना चाहिये। मंच की आस में थर्माकोल के ढेर पर क्या बैठना। इस संवेदना शून्य मजमे में विक्रम का नैसर्गिक न्याय संभव नहीं है, क्योंकि उसके अंदर सिंहासन नहीं सिर्फ और सिर्फ कचरा है। ज्ञानार्जन का दौर तो अब रहा नहीं। चाटुकार सार्वजनिक मंचों की शोभा बढ़ा रहे हैं। नपुंसक लोग लैंगिक समानता पर, $फुरसतिया लोग काम के घंटे बढ़ाने, भ्रष्टाचारी शुचिता पर और व्हाट्सएप ज्ञानी लेखन पर ज्ञान बांट रहे हैं। सो अब खुले दिमाग की कोई ज़रूरत नहीं है।

बुद्धिजीवी बेमतलब का वजन ढ़ो रहे हैं। अकेला ही चला था जानिबे मंजिल, लोग मिलते गए कारवां बनता गया से खुद को प्रेरित कर रहे हैं। अब पीछे पलट कर देख रहे हैं, तो कौन सा कारवां, कौन लोग, असल में कोई है ही नहीं। अकेले ही भागे चले जा रहे हैं। जिसे कारवां समझ रहे हैं, असल में वो तो अपना ही अहम है - बस उड़ती हुई धूल। जिनकी आवाजें आ रहीं हैं, वो लोग तो असल में हैं ही नहीं। बस आवाज हैं।

विज्ञान कहता है, गुरुत्वाकर्षण का पूरा लाभ तब मिलेगा जब भार नीचे की ओर हो। इसलिए हमने सिर को हल्का कर दिया है। खुला दिमाग, अलहदा सोच, गांभीर्य के बोझ से शारीरिक संतुलन बिगड़ जाता है।

आज ऐसे लाखों कंकर पत्थर बिखरे हुए हैं, जो बहाव में बहे जा रहे हैं। उनको इस बात से $फर्क नहीं पड़ता कि वे नदी में हैं, तालाब में या किसी नाले में।

जिन्होंने अपने वजन हल्के कर लिए हैं, वो सुकून में हैं। असल में दौर उनका ही है। हल्का एक धक्के भर से आगे निकल जाएगा। एक दिन सारे हल्के मिलकर उसे महान चुन लेंगे। तब हल्के होने का अर्थ घटिया न होगा। चिंता उस दिन की भी है, जब ये हल्के ही जहाज़ डुबाने की वजह बन जाएंगे।

बहरहाल ये सरोकार और संवेदनाओं के समापन का दौर है। जो बचा है, उसे समेटकर, बचाकर रखने का दौर है। हल्केपन का उत्सव मनाने, भारी को ठेंगा दिखाने और अपमानित करने का समय है। समय सबका वज़न तय करेगा। अगर भारीपन नकली है, तो वो हल्के आघात से भी घिसेगा। ओस से भी घुलेगा। ये क्षरण धूल पैदा करेगा और ये धूल आंखों में किरकिरी।


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