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पश्चिम एशिया युद्ध में परमाणु खतरे के प्रति लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की अंतिम घोषित तिथि बढ़ा दी है।

पश्चिम एशिया युद्ध में परमाणु खतरे के प्रति लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं
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— डॉ. अरुण मित्रा

संयुक्त राष्ट्र को लगातार हाशिए पर धकेला जा रहा है, फिर भी यह एकमात्र ऐसी वैश्विक संस्था है जिसके पास हस्तक्षेप करने की वैधता है। यह बेहद ज़रूरी है कि संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, इज़रायल और ईरान को शामिल करते हुए एक बाध्यकारी प्रस्ताव पर सहमति बनाने के लिए तत्काल कदम उठाए; जिसमें सभी पक्ष स्पष्ट रूप से यह वचन दें कि वे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की अंतिम घोषित तिथि बढ़ा दी है। ऐसा लगता है कि यह फैसला उनके वरीय सैन्य नेतृत्व की सलाह पर, और साथ ही यूरोपीय देशों और खाड़ी सहकारी परिषद् (जीसीसी) के देशों के दबाव में लिया गया है। इन देशों को डर है कि अमेरिका द्वारा ज़रूरी अवसंरचना पर बमबारी के बदले में, ईरान डीसेलिनेशन और जल शोधन संयंत्रों को निशाना बना सकता है, जिससे इस इलाके में लाखों लोगों को पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है।

ट्रंप ने यह भी कहा है कि ईरान के साथ अच्छी बातचीत चल रही है। लेकिन ईरान ने ट्रंप के इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत चल रही है। यह दावा ध्यान भटकाने की एक तरकीब हो सकती है, हालांकि इस बात की ज़्यादा संभावना है कि अमेरिकी प्रशासन को ईरान के खिलाफ अपने सैन्य विकल्प की सीमाओं का एहसास होने लगा है। अमेरिका के अंदर भी ट्रंप की बात को कोई बहुत ज़्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है। लोगों की राय का एक बढ़ता हुआ हिस्सा मानता है कि वह नेतन्याहू के सामरिक एजेंडा से प्रभावित हुए हैं और यह अमेरिका की लड़ाई नहीं है, बल्कि इस इलाके में विस्तार के एक बड़े ज़ायोनी नज़रिए का हिस्सा है।

ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि वह 30 मिनट के अंदर लड़ाई खत्म कर सकते हैं। सामरिक मामलों के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसा नतीजा सिफ़र् नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल से ही मुमकिन होगा। यह बयानबाज़ी बहुत चिंताजनक है, खासकर ऐसे नेता की तरफ़ से जिसे जल्दबाज़ी में काम करने वाला और अलग-अलग राय रखने वाला माना जाता है- जो अक्सर अचानक फ़ैसले लेता है, अपने बयान बदलता है, और लंबे समय की कोई सही रणनीति नहीं दिखाता।

लगभग तीन हफ़्ते की लड़ाई के बाद अमेरिका और इज़रायल दोनों ही निराश दिख रहे हैं। उन्हें उम्मीद थी कि ईरान कुछ ही दिनों में हार मान लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उम्मीदों के उलट, ईरान ने न सिर्फ अमेरिकी-इज़रायली हमले का विरोध किया है, बल्कि खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई भी की है। ईरान के एफ-35 जैसे अतिविकसित लड़ाकू विमान को गिराने की खबरों ने हैरानी और बढ़ा दी है- जिन्हें सिफ़र् अमेरिका और इज़रायल चलाते हैं। इसके अलावा, ईरान ने हिंद महासागर में 4,000 किलोमीटर दूरी तक मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलें दागी हैं, जिससे उसके दुश्मन परेशान हैं। डिमोना नाभिकीय संयंत्र समेत संवेदनशील जगहों के पास हाल के हमलों ने इज़रायल की चिंता बढ़ा दी है।

यह युद्ध एक बार फिर इज़रायली सरकार की मानवीय नियमों और अन्तरराष्ट्रीय समझौतों की अनदेखी को दिखाता है। बच्चों समेत आम लोगों को हमलों का सबसे ज़्यादा सामना करना पड़ा है, जबकि ज़रूरी अवसंरचना को सुनियोजित तरीके से नष्ट कर दिया गया है। गाजा में हुई तबाही और लेबनान में दुश्मनी का बढ़ना इस रूझान को और मज़बूत करता है। साथ ही, खाड़ी देश अमेरिका के सुरक्षा भरोसे की कमियों को तेज़ी से पहचान रहे हैं।

ऐसा लगता है कि अमेरिका भी बढ़ते अकेलेपन का सामना कर रहा है। नाटो ने कथित तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने में शामिल होने से मना कर दिया है, जबकि यूरोपीय देश सैन्य गतिविधियों में शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं। ट्रम्प ने इन देशों को 'कायर' कहकर उनकी बुराई की है, जिससे रिश्ते और खराब हो गए हैं। यूरोपीय नेताओं ने उनके शामिल होने की संभावना पर ही सवाल उठाते हुए जवाब दिया है, यह देखते हुए कि अगर अमेरिका- अपनी ज़बरदस्त नौसैनिक शक्ति के साथ- जलडमरूमध्य को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो छोटी यूरोपीय सेनाएं तो बेअसर हो जाएंगी।

खतरा यह है कि तनाव और बढ़ सकता है। अगर ईरान इज़रायल या पूरे इलाके में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ज़रूरी सामरिक हमला करने में कामयाब हो जाता है, तो अमेरिकी नेतृत्व में निराशा और बढ़ सकती है। ट्रंप के जल्दबाज़ स्वभाव को देखते हुए, इस बात की असली चिंता है कि वह नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल सहित बहुत ज़्यादा सख्त कदम उठा सकते हैं। इस खतरे को और बढ़ाने वाली बात मौजूदा अमेरिकी नेतृत्व की बनावट है, जिसमें अनुभवी राजनेता की कमी दिखती है और जो रणनीतिगत दूरदर्शिता के बजाय व्यापारिक सोच से ज़्यादा प्रेरित है। नेतन्याहू के राज में इज़रायल एक बदमाश देश बन गया है। इज़रायली विरासत मंत्री अमीचाईएलियाहू ने गाज़ा पर नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल की धमकी दी थी। यह उनकी सोच को दिखाता है जिसके अब बदलने की उम्मीद कम है, खासकर तब जब ईरान ने इज़रायल में डिमोना नाभिकीय संयंत्र के पास हमला किया है।

इस झगड़े के आर्थिक नतीजे दुनिया भर में पहले से ही महसूस किए जा रहे हैं। ऊर्जा आपूर्ति में रुकावट से एक बड़ा आर्थिक संकट पैदा हो रहा है। भारत, जो ऊर्जा आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, खास तौर पर कमज़ोर है। मुश्किल के शुरुआती संकेत दिख रहे हैं, जिनमें बढ़ती कीमतों की वजह से आबादी के एक हिस्से के जलाने की लकड़ी जैसे पारंपरिक ईंधन पर वापस लौटना भी शामिल है।

अगर हालात ऐसे ही रहे, तो इससे बड़े पैमाने पर औद्योगिक बंदी हो सकती है, छोटे व्यवसाय बंद हो सकते हैं, और परिवहन प्रणाली में गंभीर रुकावटें आ सकती हैं—जिसमें रेल, सड़क और हवाई यात्रा शामिल है। कई देशों के पास लंबे समय तक रुकावट झेलने के लिए तेल भंडार पर्याप्त नहीं हैं। रासायनिक खाद की कमी से दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा को और खतरा हो सकता है।

यह बेहद चिंता की बात है कि फिलहाल, कोई भी वैश्विक शक्ति इस संघर्ष को खत्म करने के लिए प्रभावी मध्यस्थता करने में सक्षम नहीं दिख रही है। ब्रिक्स, जिसकी अध्यक्षता अभी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, की विश्वसनीयता पर वैश्विक भू-राजनीति में सवाल उठने लगे हैं; खासकर, युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, उनके हाल ही में इज़रायल दौरे के बाद। इससे यह धारणा बनी है कि भारत, अमेरिका-इज़रायल गुट के साथ है।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र को लगातार हाशिए पर धकेला जा रहा है, फिर भी यह एकमात्र ऐसी वैश्विक संस्था है जिसके पास हस्तक्षेप करने की वैधता है। यह बेहद ज़रूरी है कि संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, इज़रायल और ईरान को शामिल करते हुए एक बाध्यकारी प्रस्ताव पर सहमति बनाने के लिए तत्काल कदम उठाए; जिसमें सभी पक्ष स्पष्ट रूप से यह वचन दें कि वे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

इस संदर्भ में, परमाणु हथियारों के 'निषेध पर संधि' (टीपीएनडब्ल्यू) का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। दुनिया को परमाणु हथियारों की होड़ से पैदा होने वाले गंभीर खतरों को पहचानना होगा, और एक ऐसी तबाही को रोकने के लिए निर्णायक कदम उठाने होंगे जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। नागरिक समाज संगठनों को परमाणु युद्ध के मानवीय परिणामों को उजागर करने में और अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इस मुद्दे पर व्यापक शोध और अध्ययन सामग्री, 'इंटरनेशनल फिजिशियंस फॉर द प्रिवेंशन ऑफ न्यूक्लियर वॉर' द्वारा पहले ही तैयार की जा चुकी है।


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