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दस्तावेजी सबूत हैं कि संघ ने आपातकाल का समर्थन किया था

आपातकाल को हर साल सिर्फ 25-26 जून को ही नहीं बल्कि अक्सर याद करते रहते हैं।

दस्तावेजी सबूत हैं कि संघ ने आपातकाल का समर्थन किया था
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  • अनिल जैन

पिछले 12 वर्षों के दौरान अपने क्रिया-कलापों के जरिए आपातकाल को बहुत पीछे छोड़ कर लोकतंत्र को लगभग खत्म कर चुके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए तो राजनीतिक विमर्श में आपातकाल सबसे प्रिय विषय रहता है। इसलिए वे आपातकाल को हर साल सिर्फ 25-26 जून को ही नहीं बल्कि अक्सर याद करते रहते हैं।

पंच दशक पहले देश में लगे आपातकाल की 25 जून को 51वीं बरसी है। इस मौके पर मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए भारतीय लोकतंत्र के उस त्रासद और शर्मनाक कालखंड को अलग-अलग तरह से याद किया जाएगा। याद करने वालों में ऐसे तो होंगे ही जो आपातकाल के दौरान पूरे समय जेल में रहे थे या भूमिगत रहते हुए आपातकाल और तानाशाही के खिलाफ संघर्ष में जुटे हुए थे, मगर आपातकाल को वे तमाम लोग सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर याद करेंगे जो आपातकाल के दौरान अपनी गिरफ्तारी के चंद दिनों बाद ही माफीनामे लिखकर जेल से बाहर आ गए थे, ठीक उसी तरह, जिस तरह विनायक दामोदर सावरकर अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से बाहर आए थे।

आपातकाल को याद करते हुए कांग्रेस को कोसने वालों में वे लोग भी शामिल रहेंगे जो जेल जाने से बचने के लिए रातों-रात अपनी राजनीतिक पहचान बदलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी की जय-जयकार करने लगे थे। सरकार से माफी मांगकर जेल से बाहर आने वालों ने अपने माफीनामों में इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय और संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करते हुए वादा किया था कि वे भविष्य में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। ऐसा करने वालों में ज्यादातर लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और तत्कालीन जनसंघ यानी आज की भाजपा से जुड़े हुए थे।

पिछले 12 वर्षों के दौरान अपने क्रिया-कलापों के जरिए आपातकाल को बहुत पीछे छोड़ कर लोकतंत्र को लगभग खत्म कर चुके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए तो राजनीतिक विमर्श में आपातकाल सबसे प्रिय विषय रहता है। इसलिए वे आपातकाल को हर साल सिर्फ 25-26 जून को ही नहीं बल्कि अक्सर याद करते रहते हैं। यह और बात है कि मोदी आपातकाल के दौरान न तो जेल गए थे और न ही आपातकाल विरोधी किसी संघर्ष से उनका कोई जुड़ाव था।

एक साल पहले आपातकाल के पांच दशक पूरे होने पर मोदी ने कहा था, 'आपातकाल के दौरान हमारे देश ने देखा कि किस तरह संवैधानिक संस्थाओं का विनाश किया गया। हम संकल्प लेते हैं कि हम भारत की लोकतांत्रिक भावना को मजबूत करने का हर संभव प्रयास करेंगे और हमारे संविधान में निहित मूल्यों पर खरा उतरने की कोशिश करेंगे।'

उस मौके पर गृहमंत्री अमित शाह के नाम से कुछ अखबारों में लेख भी छपे थे, जिनमें दावा किया गया था कि भाजपा ही देश में एक मात्र ऐसी पार्टी है जो लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखती है और देश में लोकतंत्र इसलिए बचा हुआ है, क्योंकि आज सरकार चला रहे नेता उन लोगों में से हैं जिन्होंने आपातकाल के खिलाफ़ कथित 'दूसरी आजादी की लड़ाई' लड़ी थी।

हालांकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के दावों के बरअक्स संसद, न्यायपालिका और चुनाव आयोग सहित विभिन्न संस्थानों की पिछले 12 वर्षों के दौरान किस कदर दुर्गति हुई है, संविधान को किस कदर नजरअंदाज किया जा रहा है और असहमति की आवाजों का कितनी निर्ममता से दमन किया जा रहा है, यह सब एक अलग बहस का विषय है।

अमित शाह का यह दावा पूरी तरह हास्यास्पद है कि देश में लोकतंत्र इसलिए बचा हुआ है, क्योंकि आज सरकार चला रहे नेता उन लोगों में से हैं जिन्होंने आपातकाल के खिलाफ दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ी थी। वैसे तो उनके इस दावे को फर्जी साबित करने वाले कई तथ्य सरकारी और गैर सरकारी दस्तावेजों में दर्ज भी हैं, लेकिन यहां सिर्फ आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उर्फ बालासाहेब देवरस के उन पत्रों का उल्लेख करना ही पर्याप्त होगा जो उन्होंने आपातकाल लागू होने के कुछ ही दिनों बाद जेल में रहते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सर्वोदयी चिंतक विनोबा भावे को लिखे थे। उन्होंने यरवदा जेल से इंदिरा गांधी को पहला पत्र 22 अगस्त, 1975 को लिखा था जिसकी शुरुआत इस तरह थी- 'मंैने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल किले से राष्ट्र के नाम आपके संबोधन को यहां कारागृह (यरवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समयानुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फै़सला किया।'

इंदिरा गांधी ने देवरस के इस पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा गांधी को एक और पत्र लिखा। इस पत्र की शुरुआत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ै सले के ख़िलाफ़ दिए गए फैसले के लिए इंदिरा गांधी को बधाई देने के साथ की। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में भ्रष्ट साधनों के उपयोग का दोषी मानते हुए प्रधानमंत्री पद के अयोग्य क़रार दिया था। देवरस ने अपने इस पत्र मे लिखा- 'सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने आपके चुनाव को वैध घोषित कर दिया है, इसके लिए आपको हार्दिक बधाई।'

देवरस ने अपने इस पत्र में यहां तक कह दिया कि, 'सरकार ने अकारण ही संघ का नाम गुजरात के छात्र आंदोलन और जयप्रकाश नारायण के बिहार आंदोलन के साथ जोड़ दिया है, जबकि संघ का इन आंदोलनों से कोई संबंध नहीं हैं।'

चूंकि इंदिरा गांधी ने देवरस के इस पत्र का भी जवाब नहीं दिया। लिहाजा जनसंघ के राजनीतिक प्रेरणा पुरुष देवरस ने विनोबा भावे से संपर्क साधा, जिन्होंने आपातकाल को 'अनुशासन पर्व' की संज्ञा दी थी। देवरस ने 12 जनवरी, 1976 को लिखे अपने पत्र में विनोबा भावे से आग्रह किया कि संघ पर लगा प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गांधी को सुझाव दें।

विनोबा भावे ने भी देवरस के पत्र का जवाब नहीं दिया। हताश देवरस ने विनोबा को एक और पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में लिखा, 'अख़बारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधानमंत्री 24 जनवरी को वर्धा, पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थितियों के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में संघ के बारे में जो ग़लत धारणा घर कर गई है, आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें, ताकि संघ पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलों में बंद संघ के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश की प्रगति के लिए सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।'

विनोबा ने देवरस के इस पत्र का भी कोई जवाब नहीं दिया। यह भी संभव है कि दोनों ही पत्र विनोबा तक पहुंचे ही न हों। जो भी हो, इंदिरा गांधी और विनोबा को लिखे गए ये सभी पत्र देवरस की पुस्तक 'हिंदू संगठन और सत्तावादी राजनीति' में परिशिष्ट के तौर पर शामिल हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन जागृति प्रकाशन, नोएडा ने किया है।

इंदिरा गांधी और विनोबा को लिखे देवरस के पत्रों से यह तो जाहिर होता ही है कि आरएसएस आधिकारिक तौर पर आपातकाल विरोधी संघर्ष में शामिल नहीं था। संगठन के स्तर पर आपातकाल का समर्थन करने और सरकार को सहयोग देने की देवरस की औपचारिक पेशकश जब बेअसर साबित हुई तो संघ के जो कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिए गए थे, उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर माफीनामे देकर जेल से छूटने का रास्ता अपनाया। जेल से बाहर आने की छटपटाहट सिर्फ संघ के कार्यकर्ताओं में ही नहीं थी बल्कि जनसंघ के कई नेता भी जेल से बाहर आने के लिए कसमसा रहे थे।

भाजपा की नैतिकता के प्रथम पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी खुद अपने स्वास्थ्य के आधार पर इलाज के बहाने जेल से कुछ ही सप्ताह बाद पैरोल पर रिहा हो गए थे। जेल से बाहर आने के बाद वे कुछ दिनों तक अस्पताल में रहे और बाकी पूरे आपातकाल के दौरान दिल्ली में फिरोजशाह रोड स्थित अपने सरकारी आवास पर रहे।

1976 में जब पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल खत्म हुआ तो इंदिरा गांधी ने लोकसभा की अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ाकर उसका कार्यकाल छह साल कर दिया था। इंदिरा गांधी के इस अनैतिक, अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक फैसले के खिलाफ सोशलिस्ट पार्टी के दो सांसदों मधु लिमये और शरद यादव ने ही जेल से अपना इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष को भेजा था। मधु लिमये ने जेलों में बंद विपक्षी दलों के अन्य सांसदों से भी इस्तीफा देने की अपील की थी। उस लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी सहित जनसंघ के 23 सदस्य थे, लेकिन किसी ने भी इस्तीफा नहीं दिया और वे सभी जेल में या जेल से बाहर रहते हुए सांसद के रूप में मिलने वाले वेतन-भत्ते लेते रहे।

आरएसएस और जनसंघ के जो लोग व्यक्तिगत माफीनामे भरकर जेल से बाहर आए थे वे सभी आज अपने-अपने प्रदेशों में राज्य सरकार से मीसाबंदी के नाम पर 10 से 25 हजार रुपए तक की मासिक पेंशन ले रहे हैं। पेंशन लेने वालों में कई तो सांसद, विधायक और मंत्री भी हैं। ऐसे भी कई लोग हैं जो आपातकाल के दौरान जेल तो दूर, पुलिस थाने तक भी नहीं गए थे लेकिन वे अपने जेल जाने के फर्जी दस्तावेज पेश कर मीसाबंदी की पेंशन ले रहे हैं।

आपातकाल के दौरान जो लोग माफीनामे लिख कर जेल जाने से बचे थे या जेल से छूटे थे, उनसे संबंधित दस्तावेज और संघ प्रमुख देवरस के इंदिरा गांधी तथा विनोबा को लिखे पत्र शाह आयोग के समक्ष भी साक्ष्य के तौर पर पेश किए गए थे। यह आयोग जनता पार्टी की सरकार ने आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए सुप्रीम के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जेसी शाह की अध्यक्षता में गठित किया था। ऐसे सभी दस्तावेज अगर योजनापूर्वक नष्ट नहीं कर दिए गए हों तो आज भी आज गृह मंत्रालय की फाइलों में दबे हो सकते हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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