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आत्मनिर्भर बन रही हैं केरल की महिलाएं

कुछ समय पहले में केरल गया था, और वहां के एक महिला समूह की गतिविधियों के बारे में जानने का मौका मिला था

आत्मनिर्भर बन रही हैं केरल की महिलाएं
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कुछ समय पहले में केरल गया था, और वहां के एक महिला समूह की गतिविधियों के बारे में जानने का मौका मिला था। आज के कॉलम में इस पर ही चर्चा करना चाहूंगा, जिससे इस तरह की पहल के बारे में जाना जा सके, और इस दिशा में कु छ काम किया जा सके। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से घिरा यह इलाका प्राकृतिक रूप से सम्पन्न है। यहां के जंगल हरे-भरे व विपुल वन संपदा से भरपूर हैं।

मौजूदा दौर में आत्मनिर्भर होने की सोच बहुत ही उपयोगी है। कुछ साल पूर्व कोविड और अब मध्य पूर्व में युद्ध के अवसर पर यह और भी प्रासंगिक है। कुछ समय पहले में केरल गया था, और वहां के एक महिला समूह की गतिविधियों के बारे में जानने का मौका मिला था। आज के कॉलम में इस पर ही चर्चा करना चाहूंगा, जिससे इस तरह की पहल के बारे में जाना जा सके, और इस दिशा में कु छ काम किया जा सके।

पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से घिरा यह इलाका प्राकृतिक रूप से सम्पन्न है। यहां के जंगल हरे-भरे व विपुल वन संपदा से भरपूर हैं। कु छ समय पूर्व मेरा इस इलाके में जाना हुआ था। इस दौरान में मैं त्रिचूर जिले में गया था, जहां हमें काडर आदिवासियों की उद्यमी पहल को देखने का मौका मिला था।

शोरनूर से चालकुडी नदी तक का पूरा रास्ता जंगल का था। सुबह का समय था, आसमान साफ था। पक्की सड़क पर बस दौड़ रही थी, पर मेरी आंखें हरियाली पर टिकी थी। कभी हरियाली के बीच से छनकर धूप आ रही थी, कभी ऊंचे पेड़ों की छाया खिड़की पर आ रही थी। हरे-भरे पेड़, रबर और पाम के बगीचे, सड़कों के किनारे सुंदर घर, किचिन गार्डन, धान के खेत और छोटे-छोट कल-कल, छल-छल बहते झरने, नदी नाले सभी चलचित्र की तरह साथ चल रहे थे। नारियल व केले के पेड़ बहुत ही मनमोहक थे। पारंपरिक पोशाकों में स्री-पुरुष थे। ऐसा लग रहा था मानो पूरा त्रिचूर का जंगल मेरी खिड़की पर था।

कुछ देर बाद हमारी बस रुकी और हम फारेस्ट पोस्ट संस्था के कार्यालय में दाखिल हुए। कार्यालय क्या था, वन उत्पादों की सुगंध से भरा एक छोटा कमरा था। हम करीब 25 लोग थे। हमारी मौजूदगी से कमरे में गरमी और उमस बढ़ गई थी।

पर्यावरणविद् मंजू वासुदेवन ने बतलाया कि जंगल आदिवासियों का घर है और वे उसे बहुत प्यार करते हैं। जंगल और नदी पर ही उनका जीवन निर्भर है। वे जंगल की निगरानी भी करते हैं। हालांकि वे पारंपरिक रूप से भी फल-सब्जियां और जड़ी-बूटियां बेचकर गुजारा करते हैं पर हमने उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए आर्थिक आमदनी बढ़ाने पर जोर दिया। गांवों में घूमते हुए हमारी सोच बनी कि जंगल के गांवों में रहकर ही उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए कुछ करना चाहिए। इसके लिए महिला समूहों का गठन कर वनोपज से कुछ उत्पाद बनाना शुरू किया है।

मंजू वासुदेवन आगे बतलाती हैं कि काडर, मलयार और मुथुवर आदिवासी सालों से केरल के चालकुडी और करुवन्नूर नदी के आसपास रहते हैं। उन्होंने शुरूआत में रिवर रिसर्च संस्था से जुड़कर काम किया, फिर यहीं की होकर रह गईं और अब आदिवासियों की आमदनी बढ़ाने के लिए वनोपज से उत्पाद बनाने के उद्यम में जुटी हैं। फारेस्ट पोस्ट नामक संस्था के माध्यम से यह काम किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि आदिवासी महिलाएं शतावरी का अचार, शहद, अचार, मोम का साबुन और बांस की टोकरियां बनाने इत्यादि का काम रही हैं। शतावरी के अचार को लोग बहुत पसंद कर रहे हैं। इससे उनकी आमदनी बढ़ रही हैं। बांस की टोकरियां व साज-सज्जा के सामानों की मांग बढ़ गई है। शहद व पारंपरिक केश तेल के भी उत्पाद बनाए जा रहे हैं।

इसके अलावा- पारंपरिक इलाज के लिए जड़ी-बूटियां, तेल, पेड़ों की छाल, शहद, आंवला, कटहल, मोम और कई तरह के फल व कंद-मूल भी जंगल में मिलते हैं। यह अनोखे स्वाद, सुगंध व मोहित करने वाले रंगों के होते हैं। उत्पाद बनाने के लिए महिलाओं को प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इसके लिए समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर भी लगाए जाते हैं।

वे बतलाती हैं कि यहां विशेष साबुन जिसे दालचीनी, गुलाब की पंखुडियों व चमेली जैसी सामग्री का उपयोग कर बनाया जाता है, नीम और जड़ी-बूटियों से तेल व नारियल तेल का भी इस्तेमाल किया जाता है। कन्नडिपाया, जिसे छोटी चटाई व टोकरियां बांस से बनाई जाती हैं। काली मिर्च, बांस करील, शतावरी और आम, अदरक से अचार व जंगली खाद्य तैयार किए जाते हैं।

बिक्री के बारे में मंजू वासुदेवन ने बताया कि स्थानीय स्तर पर, मेलों व प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाए जाते हैं। इसके साथ ही ऑनलाइन आर्डर लिए जाते हैं और उत्पादों को देशभर में पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं,जिसमें अब तक आंशिक सफलता भी मिली है।

मंजू वासुदेवन ने बतलाया कि जो वन उत्पाद दुर्लभ व सीमित हैं,उन्हें इस्तेमाल न करने का निर्णय लिया गया है। क्वीन सागा इनमें से एक है। इसे बेचने से अच्छी आमदनी होती है, पर हमने जंगल से इसे निकलने पर रोक लगाई है, जिससे इसका संरक्षण किया जा सके।

मंजू वासुदेवन बताती हैं कि सीएफआर ( सामुदायिक वन अधिकार) मिल चुका है पर इसमें पैरवी की जरूरत है। इसमें रिवर रिसर्च सेन्टर संस्था मदद कर रही है। इसलिए हमने महिला समूहों के साथ मिलकर वनोपज से उत्पाद बनाने और बेचने का उद्यमी काम शुरू किया है।

वाजाचल गांव की मुखिया ने बताया कि वे काडर आदिवासी समुदाय से हैं, जिसका अर्थ जंगल में रहने वाले आदिवासी होता है। सोयलायार गांव की बुजुर्ग चंद्रिका जंगल की कई जड़ी-बूटियों की पहचान व उपयोग बताती हैं। वे कई तरह के कंद, फल, फूल व पत्तियां एकत्र करती हैं, जो उनकी खाद्य सुरक्षा होती है। वाजाचल के रमन व जयन सुबह जाते हैं और कंद खोदकर लाते हैं, जो उनके पूरे परिवार की एक सप्ताह की भोजन की जरूरतों को पूरा कर देते हैं।

मैंने देश के कई हिस्सों में घूमकर इस तरह की आत्मनिर्भरता की पहल को देखा है। इस दिशा में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। ऐसे उदाहरण हमें यह दिखाते हैं कि हमें स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्थायी आजीविका के साथ पर्यावरण की रक्षा करना चाहिए, जिससे आमदनी भी बढ़े और पर्यावरण भी सुरक्षित बना रहे। यह उदाहरण इसी की एक बानगी है।

कुल मिलाकर, यह पूरी पहल से पर्यावरण संरक्षण के साथ आजीविका की रक्षा हो रही है। महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं और उनका सशक्तिकरण हो रहा है। आदिवासियों की जंगल की विरासत और उनके परंपरागत ज्ञान को सहेजा जा रहा है। मौखिक ज्ञान जो कहानियों व गीतों में मौजूद है, उसे आगे बढ़ाया जा रहा है। इससे यह भी पता चलता है अगर आदिवासियों को प्राकृतिक संसाधन के संरक्षण व प्रबंधन का मौका मिले तो वह इसमें सक्षम हैं। आज के निराशा और हिंसा-प्रतिहिंसा के दौर में आत्मनिर्भरता की सोच बहुत ही उपयोगी व प्रासंगिक हो गई है। फिलहाल, यह पूरी पहल सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।


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