कुलपति का उखड़ना उर्फ जिंदा समाज होने का ढोंग
साल 2026 के शुरुआती हफ्ते में ही साहित्य जगत में एक ऐसा प्रकरण घटित हुआ, जिसने याद दिला दिया कि हम समाज के तौर पर जिंदा नहीं बचे हैं

बच्चों को स्कूल न मिले, लेकिन मुसलमान स्कूल बनवाए ये अब समाज को मंजूर नहीं है। कट्टरता का ऐसा जहर समाज में घुल चुका है, जिसका इलाज करने में बरसों लग जाएंगे। और समाज को आईना दिखाने वाले साहित्यकार अगर मुद्दे पर आने की बात करें तो उन्हें सभा से अपमानित करके निकाला जा रहा है।
साल 2026 के शुरुआती हफ्ते में ही साहित्य जगत में एक ऐसा प्रकरण घटित हुआ, जिसने याद दिला दिया कि हम समाज के तौर पर जिंदा नहीं बचे हैं, केवल जिंदा होने का ढोंग कर रहे हैं। मानसिक तौर पर इतने गुलाम, इतने डरपोक और इतने चाटुकार तो हम तब भी नहीं थे, जब देश गुलाम था। लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षकों और कलाकारों इन सब में इतना साहस होता था कि वे न केवल ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लिखते थे, बल्कि समाज को भी जागरुक करते थे। अगर उनके पर्चों पर प्रतिबंध लगता, तो उनकी लेखनी बंधती नहीं थी, वो फिर चल पड़ती थी। लेकिन आज अपनी ही चुनी हुई सरकार का ऐसा खौफ नजर आ रहा है कि अपने सामने गलत होते देख कर भी नजरें फेर ली गई हैं। बिलासपुर के गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में 7 जनवरी को लेखक और कहानीकार मनोज रुपड़ा को अपमानित करने का जो प्रसंग घटा, उससे सब वाकिफ हैं। कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल समकालीन हिंदी कहानी पर आधारित एक गोष्ठी में कहानीकारों और शोधार्थियों के बीच भाषण दे रहे थे। श्री चक्रवाल का विषय वाणिज्य और प्रबंधन रहा है, लेकिन कार्यक्रम विश्वविद्यालय का था, लिहाजा कुलपति उसमें भाषण दे रहे थे। एक कुलपति हर विषय का ज्ञाता हो, यह कतई जरूरी नहीं है। लेकिन कुलपति से कम से कम इतनी उम्मीद तो रखी जाती है कि वे भले विषय पर केन्द्रित भाषण न दें, भले उनका भाषण उबाऊ हो, लेकिन अपने अतिथियों से वे सम्मान का व्यवहार करें। इसके लिए तो केवल अच्छा इंसान होने की ही जरूरत है, संस्कार और शिष्टता निभाने के लिए कोई डिग्री जरूरी नहीं होती। मगर गुरु घासीदास विवि के इस प्रकरण में कुलपति ने सामान्य शिष्टता भी नहीं दिखाई। इस घटना का जो वीडियो प्रसारित हुआ है, उसमें नजर आ रहा है कि कुलपति चक्रवाल ने सामने श्रोताओं में बैठे मनोज रूपड़ा से ही पूछ लिया कि आप बोर तो नहीं हो रहे और उन्होंने केवल इतना कहा कि आप विषय पर बोलिए, तो श्री चक्रवाल एकदम उखड़ गए और मंच से ही उन्होंने मनोज रूपड़ा से कहा कि आपको कुलपति से बात करने की तमीज नहीं है। आपको यहां किसने बुलाया। उन्होंने उस अधिकारी को भी तलब किया जिसने श्री रूपड़ा को आमंत्रित किया था। इस सबके बीच मनोज रूपड़ा उठे और सभा से निकल गए। दो-तीन लोग उन्हें रोकने की कोशिश करते हुए दिखते हैं, अन्यथा पूरी सभा में सब लोग ऐसे शांत बैठे रहे मानो कुछ गलत हुआ ही नहीं है। विश्वविद्यालय की वह सभा सही मायनों में आज के समाज का चेहरा दिखा रही थी।
इतना सब होने के बाद भी कुलपति चक्रवाल रुके नहीं, वे कहते रहे कि हमने बुलाया है, हमीं जाने को कह रहे हैं। और इस घटना के बाद भी 'इंडियन एक्सप्रेसÓ को दी गई अपनी सफ़ाई में कुलपति ने कहा कि वे बोलते वक्त देर से देख रहे थे कि मनोज रूपड़ा का ध्यान कहीं और है और वे लगातार मोबाइल देख रहे थे। मैं उनसे अदब से पूछा कि क्या वे बोर हो रहे हैं। इस पर उन्होंने मुझसे विषय पर बोलने को कहा। यह मंच का अपमान था इसलिए मैंने उनसे कमरे से जाने को कहा। इसके बाद श्री चक्रवाल ने शिकायत की कि अब मुझे फोन पर गालियां दी जा रही हैं और मेरे ख़िलाफ़ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। क्या यही हमारी संस्कृ ति है?
कमाल है कि संस्कृति की याद कितने सुविधाजनक तरीके से आलोक चक्रवाल को याद आई है। वे यह बता दें कि अतिथि देवो भव क्या हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। मनोज रूपड़ा वहां खुद नहीं आए थे। उन्हें बाकायदा आमंत्रित किया गया था। मान लें कि वे बतौर अतिथि वहां शामिल नहीं होते, तब भी उन्होंने कुलपति के पूछने पर ही कहा था कि आप विषय पर बोलें। इसमें श्री चक्रवाल को कुलपति पद का अपमान किस तरह दिख गया। दरअसल कुर्सी पर बैठे लोगों को अब आलोचना सुनने की आदत ही नहीं रही है। दिन-रात चाटुकारों से घिरे रहना, हां में हां मिलाने वाले लोगों को अपने साथ रखना, यही हर सरकारी दफ्तर की कुर्सी का किस्सा है। ऐसे में कोई कह दे कि आप विषय से भटक रहे हैं, तो इसे वे सही सलाह नहीं अपमान ही मानेंगे। बहरहाल, इस प्रकरण के बाद मनोज रूपड़ा के समर्थन में कई बयान आए। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक इस घटना की खबर आई। क्या इससे यह माना जाए कि बतौर समाज हम पूरी तरह मरे नहीं हैं।
इस घटना को एक हफ्ते हो चुके हैं। आलोक कुमार चक्रवाल अब भी अपने पद पर बने हुए हैं। चूंकि मामला केन्द्रीय विश्वविद्यालय का है, इसलिए इसमें राज्यपाल कुछ कर नहीं सकते। वैसे भी मोदी सरकार की तरफ से नियुक्त किसी भी व्यक्ति से यह उम्मीद करना ही बेकार है कि वह किसी भी किस्म के अन्याय या अनाचार पर मुंह खोलेगा। लेकिन राजनैतिक दल, शिक्षक संघ, छात्र संघ, साहित्य संगठन, पत्रकार जगत, क्या इन सबकी भूमिका चंद पंक्तियों का बयान देने तक ही सीमित रहनी चाहिए।
सही-सही तारीख और वर्ष तो याद नहीं लेकिन शायद 2002 या 2003 में राज्य के वरिष्ठ पत्रकार राजनारायण मिश्र के खिलाफ कोई मामला दर्ज हुआ था तो ललितजी ने बाकायदा पत्रकार साथियों के साथ प्रेस क्लब से राजभवन तक विरोध मार्च निकाला था। यह सत्ता के सामने समर्पण न करने का ऐलान था। यह समाज के जिंदा रहने का सबूत था। लेकिन अब सत्ता के सामने लोटने को ही कौशल मान लिया गया है। ऐसे में साहित्य अकादमी में बैठे लोगों से क्या ही उम्मीद की जाए कि साहित्यकारों के सम्मान के लिए आवाज बुलंद करेंगे। दरअसल मौजूदा सत्ता में हर उस चीज के लिए हिकारत का भाव भरा है, जो उनके मुताबिक चलने से इंकार कर दे। इसलिए कहीं जेएनयू में विवाद खड़े करवाए जाते हैं, कहीं अल्पसंख्यकों के खिलाफ बोलने वालों को ज्ञानपीठ जैसा पुरस्कार देकर बाकी साहित्यकारों को औकात दिखाई जाती है। स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और समाज के सारे कमजोर तबकों को कुचलने का सिलसिला लगातार चल रहा है, फिर भी समाज में व्यापक तौर पर चुप्पी ही पसरी रहती है, तो सरकार का दुस्साहस बढ़ता ही जा रहा है। मौजूदा सरकार भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर उच्च शिक्षण संस्थानों में अंधविश्वास और रूढ़िवादी परंपराओं का विकास कर रही है। अभी खबर आई कि जबलपुर के नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में गौमूत्र और गोबर से कैंसर के इलाज के नाम पर रिसर्च के लिए मंजूर साढ़े तीन करोड़ की धनराशि का बेजा उपयोग किया गया है। कोई आश्चर्य नहीं कि डॉ. मनमोहन सिंह जैसे विद्वान का मजाक उड़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमें हार्वर्ड रिटर्न नहीं हार्ड वर्क चाहिए। कैसा हार्ड वर्क मोदीजी को चाहिए इस तरह की खबरों से जाहिर होता है। ज्ञान के प्रति गहरी हिकारत की भावना मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान में शुरु से नजर आती थी, अब उसकी मिसाल कदम-कदम पर मिल रही है।
मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में ढाबा गांव में एक स्कूल के भवन को प्रशासन ने तोड़ दिया, जिसे अब्दुल नईम नामक व्यक्ति अपने 20 लाख रुपए खर्च करके बनवा रहा था। प्रशासन का आरोप है कि यह अवैध निर्माण है, जबकि नईम का कहना है कि वह एमपी बोर्ड के तहत नर्सरी से 8वीं तक का स्कूल खोलना चाहता था। बता दें कि गांव की आबादी करीब दो हजार है और उसमें केवल तीन मुस्लिम परिवार हैं। नईम के मुताबिक उन्होंने 30 दिसंबर को ही स्कूल शिक्षा विभाग में नर्सरी से 8वीं तक स्कूल खोलने का आवेदन दे रखा था और जमीन के कागज भी पूरे थे। लेकिन कुछ दिनों पहले किसी ने अवैध मदरसे की खबर चलाई और फिर प्रशासन ने स्कूल पर बुलडोजर ही चला दिया। जबकि मध्यप्रदेश में 83,000 से ज्यादा सरकारी स्कूल हैं, जिनमें 200 से अधिक स्कूल पेड़ की छांव या खुले में ही चलते हैं, उनका कोई भवन नहीं है।
बच्चों को स्कूल न मिले, लेकिन मुसलमान स्कूल बनवाए ये अब समाज को मंजूर नहीं है। कट्टरता का ऐसा जहर समाज में घुल चुका है, जिसका इलाज करने में बरसों लग जाएंगे। और समाज को आईना दिखाने वाले साहित्यकार अगर मुद्दे पर आने की बात करें तो उन्हें सभा से अपमानित करके निकाला जा रहा है। बाकी जनता यही देखकर खुश रहे कि मोदीजी पतंगबाजी कितनी उम्दा करते हैं।


