राहुल गांधी का सच, जिससे भाजपा हार गई
राहुल गांधी को जब भाजपा किसी तरह हरा नहीं पाती है, तो आखिर में उनके चरित्र हनन पर उतर आती है।

राहुल गांधी की स्वीकार्यता इसीलिए बढ़ती जा रही है। इंडिया ब्लॉक के साथ-साथ अब सिविल सोसायटी से जुड़े वे लोग जो कभी राहुल गांधी की राजनीति और रणनीति पर संदेह जताते थे, उन्हें भी अब मानना पड़ रहा है कि राहुल गांधी ने भाजपा, संघ, अडानी-अंबानी आदि के आपसी संबंधों और इन सबको लेकर देश पर कब्जा करने की कोशिश के बारे में जो भी कहा है, वो सही है।
राहुल गांधी को जब भाजपा किसी तरह हरा नहीं पाती है, तो आखिर में उनके चरित्र हनन पर उतर आती है। यहां हराने से मतलब चुनाव में हराना नहीं है। बल्कि आशय भारत के लोकतंत्र और संविधान बचाने के उनके संघर्ष में हराने से है। इस संघर्ष में राहुल गांधी पहले लगभग अकेले ही चले थे, तब भट्टा परसौल और नियामगिरी के जंगलों में पूंजीवादी ताकतों के सामने खड़े लोगों का साथ देने का उनका मकसद था। फिर धीरे-धीरे संघर्ष का दायरा बढ़ता चला गया और साथ ही राहुल गांधी के आसपास खड़े होने वाले लोगों का भी। मजरूह सुल्तानपुरी की पंक्तियों को भी मानो असली अर्थ राहुल ने दिया है कि -
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
पहले कांग्रेस के लोग ही राहुल गांधी के साथ थे, उनमें भी जिन्हें सत्ता का लालच था, वो बहुत जल्द रंग बदलकर दूसरी तरफ चले गए। ऐसे डरपोक लोगों के लिए राहुल गांधी ने खुद ही दरवाजे खोल दिए थे कि जिन्हें भी भाजपा में जाना हो, वो चला जाए, हमें ऐसे लोगों की जरूरत नहीं। हमें तो बहादुर, निडर लोग चाहिए। कांग्रेस में अब भी कुछ लोग बचे हैं जो इधर से उधर होने की फिराक में रहते हैं, लेकिन अब राहुल गांधी ने कांग्रेस का दायरा इतना बड़ा कर दिया है कि उनके प्रतिद्वंद्वी भी साथ आने लगे हैं। भारत जोड़ो यात्रा के वक्त राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि उन्होंने 'राहुल गांधी को सालों पहले पीछे छोड़ दिया है'। नवंबर 2022 में दिए गए इस बयान में उनका कहना था कि पुराने 'राहुल गांधी' (जो मीडिया या राजनीतिक आलोचनाओं से प्रभावित होते थे) को वे पीछे छोड़कर वे एक नए रूप में जनता से जुड़ रहे हैं।
सत्ता के अहंकार में डूबी भारतीय जनता पार्टी ने तब न केवल भारत जोड़ो यात्रा के असर को नजरंदाज किया, बल्कि अपनी पुरानी रणनीति को ही कारगर मानते हुए उसी पर पैसे फूंकती रही। भाजपा की नजर में किसी भी राजनेता की सफलता उसकी चुनावी जीत से ही तय होती है। लेकिन जब पूरे संसाधन और संस्थानों पर कब्जा कर एकतरफा चुनाव कराए जा रहे हों, निष्पक्षता और पारदर्शिता को पूरी तरह खत्म कर दिया गया हो, तब जीत भी एकतरफा ही होती है, यह इस समय देश देख रहा है। तो भारत जोड़ो यात्रा को इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उसके बाद भी कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई। बल्कि उसके बाद भाजपा को बहुमत नहीं मिला, यह तथ्य याद रखा जाना चाहिए। इसमें नीतीश कुमार जैसे लोगों को कैसे भाजपा ने अपनी तरफ मिलाया, ऐसी कई कहानियां भी भाजपा की जीत के साथ जुड़ी हुई हैं।
बहरहाल, भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी की असली पहचान जनता से करवा दी। जनता ने देखा कि जिस शख्स को भाजपा ने पप्पू कहकर मूर्ख बताने का प्रचार किया, वह तो असल में भारत की असली संस्कृति, उदार इतिहास और समावेशी ताने-बाने को अच्छे से समझता है। जिस शख्स को भाजपा ने युवराज, शाहजादा, राहुल बाबा, जर्सी गाय का बछड़ा आदि अपशब्द कहे, वह तो साधारण कपड़ों में पैदल पूरे देश में बिना किसी तामझाम के चल पड़ा। रात को कहीं भी सोना, किसी के भी साथ खाना खाना, चाय पीना, कहीं कोई दिखावा ही नहीं है। फकीरी अगर किसी को कहते हैं तो वह सही मायने में राहुल गांधी ने ही दिखाई। जिस शख्स को भाजपा ने उसके परिवार के नाम पर बार-बार अपमानित किया। उस परिवार ने तो दो-दो शहादतें दीं और खुद राहुल गांधी ने कहा कि मेरी सफेद टी शर्ट लाल हो जाएगी, इससे ज्यादा और क्या होगा। यानी उनमें अपनी जान बचाने को लेकर कहीं कोई डर ही नहीं है। राहुल गांधी की राजनैतिक समझ पर भी भाजपा ने बहुत सवाल उठाए। अब भी उठा ही रही है और उनके कार्यक्रमों को खारिज करने के लिए रटी-रटाई बात कहती है कि कांग्रेस अपने युवराज को लॉन्च कर रही है, यानी उन्हें राजनीति में जगह दिलाने की कोशिश कर रही है। मगर राहुल गांधी 2004 से लगातार सांसद हैं, और समूचे विपक्ष ने लोकसभा में उन्हें अपना नेता बनाया है, तो यह कम से कम लॉन्चिंग नहीं कहलाएगी। हां, जय शाह को बिना किसी अनुभव के सीधे बीसीसीआई की कमान सौंप देना जरूर लॉन्चिंग थी। बहरहाल, राहुल गांधी की राजनैतिक समझ ऐसी है कि नोटबंदी, जीएसटी, लॉकडाउन, कोरोना वैक्सीन, शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव, रूपए की गिरती कीमत, अमेरिका के सामने समर्पण और अब वोट चोरी, जब जो उन्होंने कहा, वही कुछ समय बाद सच हो गया। यह सब किसी ज्योतिषी की तरह भविष्यवाणी करने का काम नहीं था, हिंदुस्तान में घूम-घूमकर, लोगों की नब्ज टटोलकर देश को समझने का काम था।
राहुल गांधी की स्वीकार्यता इसीलिए बढ़ती जा रही है। इंडिया ब्लॉक के साथ-साथ अब सिविल सोसायटी से जुड़े वे लोग जो कभी राहुल गांधी की राजनीति और रणनीति पर संदेह जताते थे, उन्हें भी अब मानना पड़ रहा है कि राहुल गांधी ने भाजपा, संघ, अडानी-अंबानी आदि के आपसी संबंधों और इन सबको लेकर देश पर कब्जा करने की कोशिश के बारे में जो भी कहा है, वो सही है। इस समय ज्ञानेश कुमार और एसआईआर के जरिए वोट चोरी के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन की अगुवाई भी राहुल गांधी ही कर रहे हैं। सोमवार को उनके एक आह्वान पर लाखों लोग सुप्रीम कोर्ट की तरफ मार्च करने के लिए जुट गए। भाजपा के लिए यह सब अप्रत्याशित था। क्योंकि उसने मान लिया था कि उसके दुष्प्रचार तंत्र का असर अब भी होगा और लोग वोट चोरी के आरोपों पर राहुल गांधी के साथ नहीं आएंगे। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ और भाजपा को इससे बड़ा झटका लगा। लिहाजा वह फिर अपने उसी पैंतरे पर उतर आई कि राहुल गांधी को बदनाम करो।
इस बार उसने एक महिला पत्रकार के जरिए यह काम करने की कोशिश की। राहुल गांधी पर न्यूज चैनल वनइंडिया की पत्रकार ऋचा पाराशर ने आरोप लगाया कि जब सुप्रीम कोर्ट के भीतर राहुल गांधी पहुंचे तो उन्होंने उन्हें धक्का मारकर नीचे गिराया। ऋचा पाराशर ने यह भी बताया कि वह गर्भवती हैं और गिरने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी। बहरहाल, अच्छी बात यह है कि अब ऋचा पाराशर बिल्कुल स्वस्थ हैं, उनकी पूरी जांच सर गंगाराम अस्पताल में हुई है और डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें और उनके भ्रूण में पल रहे बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। दोनों स्वस्थ हैं।
अब आते हैं ऋचा पाराशर के आरोपों पर कि राहुल गांधी ने उन्हें धक्का दिया। पहली बात तो यह कि जब उन्हें पता था कि वे गर्भवती हैं और शुरुआती महीने ही चल रहे हैं, तो उन्हें ऐसे प्रदर्शन में जाना ही क्यों था, जहां लाखों लोगों की भीड़ थी। अगर उनके संपादक या वरिष्ठों को यह बात पता नहीं थी, तो उन पर सवाल नहीं किए जा सकते, लेकिन खुद ऋचा को अपना ख्याल रखने से किसने रोका था। दूसरी बात, इस घटना के जो वीडियो सामने आए हैं, उनमें तमाम एंगल से यही नजर आया है कि राहुल गांधी ने खुद अपने हाथों से ऋचा के निकलने की जगह बनाई, ऐसा वो अपने आसपास की हर महिला के लिए करते, यह सब जानते हैं। बहुत भीड़ में राहुल किसी को अपने हाथ से आगे करते हुए दिख रहे हैं, लेकिन वो एक पुरुष है (शायद ऋचा के साथ आया कैमरामैन) वहां ऋचा नजर नहीं आ रही। ऋचा गिरते हुए भी नहीं दिखी, बल्कि कैमरा तेजी से हिलता है, जिससे कुछ भी ठीक से दिखाई नहीं देता, इसके बाद ऋचा चिल्लाते हुए कह रही हैं कि राहुल गांधी ने मुझे धक्का दिया, मैं घुटनों पर गिरी। तीसरी बात ऋचा के गिरने की खबर उनकी बहन ने भाजपा नेताओं को बताई, वे अस्पताल में उनसे मिलने पहुंचे, प्रदीप भंडारी समेत दो-तीन लोग ऋचा के आसपास खड़े हैं और इसके फोटो वीडियो जारी हुए हैं। अस्पताल की जगह भाजपा नेताओं के पास जाने की जरूरत क्यों पड़ी। चौथी बात ऋचा ने अपने गिरने का बयान करते हुए स्मैश द पैट्रियार्की का जिक्र कर राहुल को घेरा। यहां राहुल गांधी जिस पितृसत्ता को खत्म कर लड़कियों को बराबरी का हक देने की बात कह रहे हैं, उसी पर सवाल उठाए गए। पांचवी बात, 2 अक्टूबर से चल रहे प्रदर्शन में कई लड़कियों को पुलिस द्वारा मारे जाने, उनके साथ यौन हिंसा करने के वीडियो सामने आए हैं, कहीं शारीरिक तो कहीं शाब्दिक तौर पर लड़कियों के साथ हिंसा हो रही है, ऋचा पाराशर ने इतने दिनों में एक बार भी इन लड़कियों के साथ हुई बदसलूकी पर सवाल क्यों नहीं उठाए। जबकि वे कहती हैं कि मैं तो पत्रकार हूं तो अपना काम करूंगी ही।
ऋचा पाराशर के कुछ पुराने वीडियो सामने आए हैं, जिनमें वे मोदी को पूकी (प्यार जताने वाला अंग्रेजी जुमला) पीएम कह रही हैं। खुद को अंधभक्त होने की बात कह रही हैं। बहरहाल, ये उनका हक है कि वे किस पर प्यार जताएं और किस पर नहीं। लेकिन मातृत्व के नाम पर उनका बोला गया झूठ बेहद निंदनीय है। इस देश में लाखों स्त्रियां इसलिए प्रताड़ित होती हैं, क्योंकि वे मां नहीं बन पाती। कई स्त्रियां इसलिए अत्याचार का पात्र बनती हैं, क्योंकि वे बेटा पैदा नहीं कर पातीं। गरीब गर्भवती महिलाएं अच्छे पोषण को तरस जाती हैं। जाति या धर्म के नाम पर कई बार गर्भवतियों को सही इलाज नहीं मिल पाता। बिल्किस बानो जैसी महिला की तो बात ही क्या करें, जिनके गर्भ को दंगाइयों ने चीर डाला। उन सबको किनारे कर विक्टिम कार्ड ऋचा पाराशर ने खेला है। लेकिन देश सच जानता है कि सूरज पश्चिम से उग जाए, मगर राहुल गांधी किसी महिला के साथ अनजाने में भी बदसलूकी नहीं कर सकते।


