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फटा ढोल, खुली पोल!

गौरतलब है कि रीइमेजिनिंग स्किलिंग फार विकसित भारत एट 2047 की उक्त रिपोर्ट, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 78वें चक्र के यानी 2021 के आंकड़ों पर आधारित है।

फटा ढोल, खुली पोल!
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राजेंद्र शर्मा

नीति आयोग की एक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि भारत में 15 से 29 वर्ष तक आयु के करीब 8.7 करोड़ युवा 'न पढ़ाई कर रहे थे, न काम कर रहे थे और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण ले रहे थे।' गौरतलब है कि रीइमेजिनिंग स्किलिंग फार विकसित भारत एट 2047 की उक्त रिपोर्ट, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 78वें चक्र के यानी 2021 के आंकड़ों पर आधारित है। इसका अर्थ यह है कि कम से कम पिछले आधे दशक से देश के युवा ऐसी भयंकर बेरोजगारी झेल रहे हैं।

पुरानी कहावत है—बंद मु_ïी लाख की, खुल गयी तो खाक की! नरेंद्र मोदी के छिहत्तर वर्ष पूरे होने पर महीने भर चलने वाले भाजपायी से बढ़कर सरकारी आयोजनों का सिलसिला, बेशक अभी जारी ही है। फिर भी, ऐसा लगता है कि काफी हद तक इन आयोजनों की हवा निकल गयी है। यह हुआ है प्रधानमंत्री मोदी के जन्म दिन को, एक 'जन-समारोहÓ बनाकर दिखाने की कोशिश के उल्टा पड़ जाने और मोदी की न भूतो न भविष्यत्ï किस्त की लोकप्रियता की मु_ïी खुल जाने के चलते। जैसा कि लगभग सभी निष्पक्ष प्रेक्षकों ने दर्ज किया है, शासन की सत्ता व संसाधनों, संघ परिवार के संगठन व प्रभाव और मुख्यधारा के मीडिया के अपना पूरा जोर लगाने के बावजूद, तथाकथित 'एक दिया आशीर्वाद काÓ अभियान, न सिर्फ आम लोगों की हिस्सेदारी हासिल करने में बुरी तरह विफल रहा बल्कि उन हलकों की भी कोई दर्शनीय हिस्सेदारी नहीं हासिल कर सका, जो कम से कम नरेंद्र मोदी के नेतृत्ववाली भाजपा-संघ के अभियानों के पिछले कई वर्ष से मुखर समर्थक रहे थे।

प्राय: सभी प्रेक्षकों ने यह दर्ज किया है कि महानगरों की जिन मध्य वर्गीय से लेकर उच्च वर्गीय तक आवासीय सोसायटियों ने छ: साल पहले कोरोना के दौरान, नरेंद्र मोदी की ही पुकार पर बड़े जोर-शोर से ताली-थाली बजाने से लेकर, दीया-बाती करने तक के कर्मकांड किए थे, उन्होंने भी मोदी के जन्म दिन पर आशीर्वाद/ समर्थन के प्रदर्शन के दीपक जलाना गवारा नहीं किया। आशीर्वाद का दिया अभियान के प्रति जन-निरुत्साह इतना प्रकट था कि मोदी और भाजपा से बढ़कर, राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिष्ठïा की चिंता करने वालों ने, मोदी के ही हाथों में ज्यादा से ज्यादा ताकत केंद्रित होते जाने से आरएसएस की नाराजगी और मोदी की बढ़ती 'व्यक्ति पूजाÓ के प्रति आरएसएस की उदासीनता देखना भी शुरू कर दिया है। हैरानी की बात नहीं है कि उज्जैन के एक आयोजन में आरएसएस प्रमुख, भागवत की इस टिप्पणी को कि सब कुछ अपनी इच्छा से नियंत्रित करने का अहंकार निरर्थक है, कोई चाहे या न चाहे, उगने के बाद सूर्य अस्त होता ही है, नरेंद्र मोदी की सत्ता के सूर्य के ढल रहे होने की स्वीकृति के रूप में भी पढ़ा जा रहा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि नरेंद्र मोदी के लिए अपार जन-समर्थन और उनकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के दावों में पहले भी सच्चाई का तत्व थोड़़ा ही था और प्रचार का ही तत्व ज्यादा था। सच तो यह है कि न सिर्फ अपनी अभूतपूर्व चुनावी सफलताओं के बावजूद, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अकेले भाजपा ही नहीं, एनडीए का गठजोड़ भी हरेक चुनाव में कुल वोट के आधे से काफी कम तक सीमित रहने के बाद भी, फर्स्ट पॉस्ट द पोस्ट पर आधारित भारतीय चुनाव प्रणाली की असंतुलितता के चलते ही, लोकसभाई तथा विधानसभाई सीटों का बहुमत हासिल करता रहा है और इसे ही नरेंद्र मोदी की अपार लोकप्रियता के साक्ष्य के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है। 2024 के आम चुनाव में तो, चुनाव आयोग की सारी पक्षपाती भूमिका और वास्तव में उसके अनेक संदेहजनक फैसलों के बावजूद, न सिर्फ मोदी के नेतृत्व में भाजपा लोकसभा में पूर्ण बहुमत से काफी नीचे खिसक गयी थी बल्कि चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार और चिराग पासवान की पार्टियों की बैसाखियों के सहारे ही नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री पद पर तीसरा कार्यकाल हासिल कर पाए थे। उसके बाद से सबसे बढ़कर चुनाव आयोग की तिकड़मों के ही बल पर, मोदीशाही ने चुनाव के मैदान में अगर नुकसान की कुछ भरपाई कर भी ली है, तो उसे कम से कम जन-स्वीकृति का ठप्पा नहीं माना जा सकता है।

इस सच्चाई को वामपंथ के समर्थन से और कॉकरोच जनता पार्टी के माध्यम से तथा अन्यत्र भी, पिछले कुछ ही महीनों में सामने आयी युवाओं की आंदोलनात्मक बेचैनी ने, आंखें खोलने वाले तरीके से सामने लाकर रख दिया है। हैरानी की बात नहीं है कि खासतौर पर पढ़े-लिखे युवाओं तथा छात्रों की इस बगावत से बदहवास, नरेंद्र मोदी से लेकर भागवत तक ने, जेन जी कहलाने वाली इस युवा पीढ़ी को, सिर्फ बातों से खुश कर के पटाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। लेकिन, उनके दुर्भाग्य से इस युवा पीढ़ी की वास्तविक और वास्तव में उसका दम ही घोंट रही चिंताओं के ठोस समाधान का दिखावा करना भी, देसी-विदेशी इजारेदार पूंजी की सेवा में जुटी, संघ-भाजपा की इस बादशाहत के बस में नहीं है।

हैरानी की बात नहीं है कि ठीक उस समय, जब एक तिमाही के जीडीपी के बढ़े-चढ़े आंकड़ों के बल पर, जिनकी विश्वसनीयता इतनी कम है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तक ने वर्तमान निजाम के आर्थिक आंकड़ों को सी ग्रेड में रखा है, जो विश्वसनीयता के सबसे निचले स्तर को दिखाता है, प्रधानमंत्री मोदी संकटों से घिरी दुनिया में उनके राज में भारत के ही सबसे तेजी से विकास कर रहे होने का ढोल पीट रहे थे, तभी खुद उनकी सरकार के दूसरे आंकड़े वास्तव में जनता और खासतौर पर युवाओं के लिए हालात के भयावह से भयावह होते जाने की गवाही दे रहे थे। मिसाल के तौर पर, 2025 में पहली बार जब जिला स्तर पर पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे किया गया, तो उसमें यह आंखें खोलने वाला तथ्य सामने आया कि देश के करीब 250 जिलों में 15 से 29 वर्ष तक आयु का हर चौथा युवा पूरी तरह से खाली बैठा हुआ है—वह न तो किसी उत्पादक काम में लगा हुआ है, न शिक्षा हासिल कर रहा है और न रोजगार के लिए किसी तरह का प्रशिक्षण ही ले रहा है। प्रथमाक्षरों को जोड़कर सार्थक शब्द बनाने के शौकीन मोदी राज ने इन युवाओं के लिए भी एक नयी संज्ञा गढ़ी है—नीट यानी नॉट इन एम्प्लाइमेंट, एजुकेशन ऑर ट्रेनिंग (एनईईटी)।

सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा मोदी के जन्म दिन के जश्न के ठीक अगले ही दिन जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब तथा प. बंगाल जैसे राज्यों में करीब दो-तिहाई जिलों में हर चौथा युवा इसी तरह शुद्घ रूप से खाली बैठा हुआ है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, असम तथा तेलंगाना जैसे राज्यों में भी करीब आधे जिलों में हरेक चौथा युवा इसी तरह खाली बैठा हुआ है। दूसरे सिरे पर, इस सर्वे में शामिल किए गए 600 जिलों में से, करीब 25 जिले ही ऐसे हैं, जहां ऐसे खाली बैठे युवाओं का हिस्सा 10 फीसद से कम है यानी दस में से एक युवा की जवानी ही पूरी तरह से बर्बाद हो रही है। हैरानी की बात नहीं है कि युवतियों के मामले में यह अनुपात और भी ज्यादा है—सर्वे में शामिल जिलों में से तीन-चौथाई में, हर चौथी युवती इसी तरह खाली बैठी हुई है।

याद रहे कि यह स्थिति कोई आज ही पैदा नहीं हो गयी है। इससे कुछ ही पहले नीति आयोग की एक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि भारत में 15 से 29 वर्ष तक आयु के करीब 8.7 करोड़ युवा 'न पढ़ाई कर रहे थे, न काम कर रहे थे और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण ले रहे थे।Ó गौरतलब है कि रीइमेजिनिंग स्किलिंग फार विकसित भारत एट 2047 की उक्त रिपोर्ट, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 78वें चक्र के यानी 2021 के आंकड़ों पर आधारित है। इसका अर्थ यह है कि कम से कम पिछले आधे दशक से देश के युवा ऐसी भयंकर बेरोजगारी झेल रहे हैं। जाहिर है कि यह भयावह सच जो कि देश के युवा खुद अपने जीवन में अनुभव कर रहे हैं, मोदी सरकार के यह कहने से बदल नहीं जाता है कि इन लोगों को 'आम तौर पर बेरोजगार नहीं कहा जा सकता है!Ó वास्तविक स्थिति इन आंकड़ों से भी बुरी लगती है। इसी साल के शुरू में आए अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एक अध्ययन, 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026Ó में बताया गया था कि 15 से 25 वर्ष तक आयु के करीब 40 फीसद युवा बेरोजगार थे। यहां तक कि ग्रेजुएट युवाओं में से भी केवल 7 फीसद, एक साल के अंदर ही स्थायी वेतन वाली नौकरी हासिल कर पाए थे। हैरानी की बात नहीं है कि न तो इन युवाओं को मोदी के जन्म दिन पर आशीर्वाद दिया जलाना मंजूर हुआ है और न इनसे जुड़े करोड़ों परिवारों को।

बहरहाल, मोदीशाही भी जनता के वास्तविक जीवनानुभव की कठोर सच्चाइयों की ठोकर से अपनी सत्ता के सूरज का ढलना, हाथ पर हाथ रखकर बैठी देख भर नहीं रही है। एसआईआर समेत, विभिन्न कुचालों से चुनाव आयोग उसके राज को सहारा देने की जो कोशिशें कर रहा है, सभी के सामने हैं। उसकी मदद से और उसकी कोशिशों के अलावा भी, संघ-भाजपा की जोड़ी ने 2029 के चुनाव के लिए और जाहिर है कि उससे पहले के चुनावों के लिए भी, सांप्रदायिक धुंध फैलाकर, जनता के वास्तविक जीवन के मुद्दों को ढांपने की अपनी नीयत अभी से साफ कर दी है। इसका ऐलान और किसी ने नहीं, मौजूदा संघ-भाजपा का चाणक्य कहे जाने वाले, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह कहकर किया है कि, 2029 के चुनाव से पहले भाजपा तथा एनडीए-शासित सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का कानून बना दिया जाएगा! घुसपैठियों का हौवा चूंकि सीमावर्ती राज्यों के अलावा बहुसंख्यकों के बीच भी बहुत काम नहीं करता है, अब यूसीसी के जरिए सांप्रदायिक धु्रवीकरण ही वर्तमान सत्ताधारियों की चाणक्य रणनीति है। यह भी तो इसी का सबूत है कि मोदीशाही का विकास का ढोल फट चुका है और उसके जनहित की चिंता के स्वांग की पोल जनता के सामने खुलती जा रही है।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


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