चुनावी लोकतंत्र बहाल करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को निर्णायक कदम उठाने होंगे
भारत का चुनावी लोकतंत्र एक ऐसे नाजुक मोड़ पर है जहां न्यायिक दखल सिर्फ प्रक्रिया की जांच और चिंता जताने तक सीमित नहीं रह सकता

सरकार का खुद को संवैधानिक रूप से स्वतंत्र संस्था के साथ इस तरह जोड़कर देखना बेहद चिंताजनक है। चुनाव आयोग न तो कार्यपालिका का कोई हिस्सा है और न ही सत्ताधारी पार्टी के प्रति जवाबदेह कोई प्रशासनिक विभाग। इसकी स्वतंत्रता एक ज़रूरी सुरक्षा कवच है जो यह सुनिश्चित करती है कि राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल करने वाले लोग उन हालात में हेरफेर न कर सकें जिनके तहत वह सत्ता दोबारा हासिल की जाती है।
भारत का चुनावी लोकतंत्र एक ऐसे नाजुक मोड़ पर है जहां न्यायिक दखल सिर्फ प्रक्रिया की जांच और चिंता जताने तक सीमित नहीं रह सकता। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर बढ़ता विवाद, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना, और जन-विरोध प्रदर्शनों पर सरकार का लगातार सख्त रवैया- इन सबने एक संवैधानिक संकट पैदा कर दिया है जिसके लिए असाधारण कदम उठाने की ज़रूरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक निगरानी में इस विवादित प्रक्रिया को आगे बढ़ने की इजाज़त दी थी, इसलिए अब यह सुनिश्चित करने की उसकी ही खास ज़िम्मेदारी है कि कहीं उसकी मंज़ूरी से अनजाने में ही वोट देने के मौलिक अधिकार को कमज़ोर न किया गया हो।
यह टकराव चुनावी प्रशासन के पारंपरिक दायरे से काफी आगे निकल चुका है। विपक्षी दल, नागरिक समाज संगठन और युवा आंदोलन न सिर्फ चुनाव आयोग के अलग-अलग फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि खुद इस संस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। 10 अक्टूबर के प्रदर्शनों से पहले नई दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेना, सार्वजनिक परिवहन पर रोक लगाना और हज़ारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती ने इस धारणा को और मज़बूत किया है कि नरेंद्र मोदी सरकार चुनाव आयोग की आलोचना को अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानती है।
सरकार का खुद को संवैधानिक रूप से स्वतंत्र संस्था के साथ इस तरह जोड़कर देखना बेहद चिंताजनक है। चुनाव आयोग न तो कार्यपालिका का कोई हिस्सा है और न ही सत्ताधारी पार्टी के प्रति जवाबदेह कोई प्रशासनिक विभाग। इसकी स्वतंत्रता एक ज़रूरी सुरक्षा कवच है जो यह सुनिश्चित करती है कि राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल करने वाले लोग उन हालात में हेरफेर न कर सकें जिनके तहत वह सत्ता दोबारा हासिल की जाती है। जब सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ शिकायतों को दूर करने के बजाय उन्हें सार्वजनिक जवाबदेही से बचाने के लिए ज़्यादा तत्पर दिखती है, तो संस्थागत अंतर खतरनाक रूप से धुंधला हो जाता है।
ज्ञानेश कुमार को हटाने का संसदीय रास्ता बेहद मुश्किल साबित हुआ है। अनुच्छेद 324(5) मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के जज के बराबर सुरक्षा देता है। उन्हें हटाने के लिए एक कठिन संसदीय प्रक्रिया से गु•ारना पड़ता है जिसमें विशेष बहुमत की ज़रूरत होती है, जिससे विपक्ष के अलावा बड़े पैमाने पर समर्थन के बिना सफलता लगभग असंभव हो जाती है। वह संवैधानिक सुरक्षा इसलिए बनाई गई थी ताकि चुनावी स्वतंत्रता में कार्यपालिका का मनमाना दखल रोका जा सके। इसका मकसद कभी भी असंवैधानिक कामकाज या प्रशासनिक गड़बड़ी की न्यायिक जांच से छूट देना नहीं था।
यह फ़र्क बहुत ज़रूरी है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करके मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता। हटाने से जुड़े संवैधानिक नियम गंभीर संस्थागत संकट के समय भी लागू रहते हैं। फिर भी, न्यायपालिका के पास गैर-कानूनी फैसलों की जांच करने, असंवैधानिक प्रक्रियाओं को रद्द करने, संस्थागत जवाबदेही तय करने और यह पता लगाने का काफी अधिकार है कि क्या आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों से बाहर जाकर काम किया है। असरदार न्यायिक दखल की शुरुआत ज़रूरी नहीं कि हटाने के आदेश से ही हो। इसकी शुरुआत उन फैसलों की कड़ी जांच से होनी चाहिए जिन्होंने आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में हुई घटनाओं ने ऐसी जांच को ज़रूरी बना दिया है। ये आरोप कि ज्ञानेश कुमार ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना एसआईआर से जुड़े अहम फैसले लिए, सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया पर बुनियादी सवाल उठाते हैं। तीन सदस्यीय आयोग के भीतर मतभेदों की खबरों ने उन फैसलों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लिए आधार दिया है जो कथित तौर पर एकतरफा लिए गए थे। अगर ये आरोप साबित हो जाते हैं, तो ये प्रशासनिक मतभेदों से कहीं ज़्यादा गंभीर बात की ओर इशारा करेंगे। ये उन संस्थागत सुरक्षा उपायों के संभावित टूटने का संकेत देंगे जिनका मकसद चुनावी अधिकार को एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित होने से रोकना था।
सर्वोच्च न्यायालय की 5 अक्टूबर की कार्रवाई में इन आरोपों की गंभीरता और बिना पक्के सुबूतों के कार्रवाई करने में न्यायपालिका की हिचकिचाहट, दोनों ही बातें दिखीं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सिर्फ अखबारों की खबरों के आधार पर कुमार को निलंबित करने से इन्कार कर दिया। फिर भी, उसने आयोग और अन्य पक्षों से जवाब मांगा और संकेत दिया कि कानूनी ज़रूरतों के खिलाफ पाए गए फैसलों पर रोक लगाई जा सकती है या उन्हें रद्द किया जा सकता है। जल्दबाजी में सज़ा देने से इन्कार करने और सार्थक दखल से पीछे हटने के बीच का अंतर अब न्यायालय के नज़रिए का आधार बनना चाहिए।
तुरंत ज़रूरत इस बात की है कि आयोग के अंदरूनी रिकॉर्ड की पारदर्शी जांच हो, जिसमें विवादित फैसले, दर्ज आपत्तियां और एसआईआर को मंज़ूरी देने में अपनाई गई प्रक्रियाएं शामिल हों। न्यायिक जांच से यह पता चलना चाहिए कि क्या आयोग ने मिलकर काम किया, क्या अलग राय पर ठीक से विचार किया गया और क्या लाखों मतदाताओं पर असर डालने वाले फैसले संवैधानिक गारंटी के मुताबिक थे? जहां नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, वहां राजनीतिक नतीजों की परवाह किए बिना सुधार के आदेश दिए जाने चाहिए।
नागरिकता पुष्टिकरण और मतदाता का निबंधन के बीच का रिश्ता एक और संवैधानिक पेंचीदगी पैदा करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले एसआईआर की जांच करते समय चुनावी ढांचे के अंदर योग्यता की जांच करने के आयोग के अधिकार को माना था, जिसमें नागरिकता से जुड़े सवाल भी शामिल थे। हालांकि, उस अधिकार को राष्ट्रीयता के बारे में अंतिम फैसला लेने की आम शक्ति नहीं समझा जाना चाहिए। मतदाता सूची से नाम हटाने से नागरिकता खत्म नहीं हो सकती, और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को इस बुनियादी कानूनी अंतर को धुंधला करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।
कोर्ट के पिछले नज़रिए की आलोचना, जिसमें पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज वी. गोपाला गौड़ा की आपत्तियां भी शामिल हैं, पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। न्यायिक फैसलों पर दोबारा विचार किया जा सकता है अगर उनके लागू होने से संवैधानिक खतरे सामने आते हैं। न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता हर पूर्व निर्णय का बचाव करने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि त्रुटियों को सुधारने और अपने पर्यवेक्षण में प्रयोग की जाने वाली शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने की उसकी तत्परता को प्रदर्शित करने पर निर्भर करती है।
प्रदर्शनों से निपटने के सरकार के तरीके ने इस जिम्मेदारी को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। सार्वजनिक व्यवस्था के संदर्भ में आनुपातिक प्रतिबंध उचित ठहराए जा सकते हैं, लेकिन व्यापक परिवहन व्यवधान, निवारक गिरफ्तारियां और आम नागरिकों को प्रभावित करने वाली सीमाएं वैध सुरक्षा व्यवस्थाओं को राजनीतिक प्रतिरोध के साधन में बदलने का जोखिम पैदा करती हैं। दिल्ली विरोध प्रदर्शनों से पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंगत उपायों के खिलाफ दी गई चेतावनी शांतिपूर्ण असहमति के संवैधानिक महत्व को स्वीकार करती है।


