असहमति और विरोध का सिमटता दायरा और उम्मीद के स्वर
कानून और मर्यादा के दायरे में असहमति और विरोध जताने की आजादी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।

- राजेश पांडेय
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में बोलने और लिखने की आजादी का प्रावधान है। असहमति और असंतोष समाज को दबावों से मुक्त करने के कारगर औजार हैं। लेकिन देश के कई राज्यों में बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की प्रवृत्ति बढ़ी है। धरना, रैली के माध्यम से सरकार के फैसलों का विरोध करने वालों के खिलाफ पुलिस कई बार सख्त कार्रवाई करती है।
कानून और मर्यादा के दायरे में असहमति और विरोध जताने की आजादी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। इसके माध्यम से लोग अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं। सरकार के सामने अपनी अपेक्षाएं रखते हैं। सरकार या अन्य प्रभावशाली तबकों की मनमानी के खिलाफ भावनाओं का इजहार करते हैं। यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था की जरूरी शर्त है। इसलिए किसी को नुकसान पहुंचाए बिना विरोध व्यक्त करने के तरीकों को सभी वास्तविक लोकतांत्रिक देशों में संवैधानिक और सामाजिक मान्यता मिली है। लिहाजा, सवाल उठता है कि क्या संसद से लेकर गांवों तक अपने प्रतिनिधि चुनने वाले भारत में लोगों को सही अर्थों में अभिव्यक्ति की आजादी हासिल है या नहीं? क्या मीडिया और अन्य नागरिक संगठन अपनी मर्जी से काम करने के लिए स्वतंत्र है? बहरहाल,पूर्ण स्वतंत्रता जैसी आदर्श स्थिति तो कल्पना से परे है। अगर धरती पर कोई स्वर्ग होता तो शायद वहां भी पूरी आजादी नहीं मिल सकती थी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में बोलने और लिखने की आजादी का प्रावधान है। असहमति और असंतोष समाज को दबावों से मुक्त करने के कारगर औजार हैं। लेकिन देश के कई राज्यों में बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की प्रवृत्ति बढ़ी है। धरना, रैली के माध्यम से सरकार के फैसलों का विरोध करने वालों के खिलाफ पुलिस कई बार सख्त कार्रवाई करती है। इसलिए बम्बई हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जयाजीराव जामदार का यह कथन उम्मीद जगाता है कि क्या सभी नागरिक भारत सरकार के गुलाम हैं? जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा एक राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता को नागरिकता कानून में संशोधन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और नारे लगाने पर एक साल के लिए जिलाबदर करने के आदेश को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 में नागरिकों को अपनी राय व्यक्त करने और शान के साथ रहने का अधिकार है। लोगोंं को जनहित के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाने का हक है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के सेवक नहीं बल्कि जनता के सेवक हैं।
जस्टिस जामदार की टिप्पणी ध्रुवीकरण और संवैधानिक संस्थाओं को महत्वहीन बनाने की कोशिश के दौर में बेहद अहम है। आम नागरिक की स्वतंत्रता का दायरा सिमट रहा है। उस पर लगातार संदेह और दबाव बढ़ा है। अभी हाल के कुछ फैसलों और मामलों पर नजर डालें तो लोगों को कदम-कदम पर परीक्षा देना पड़ रहा है। मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया में वोटर पर अपनी पहचान साबित करने की पूरी जिम्मेदारी डाल दी गई है। तार्किक विसंगति जैसा अटपटा और अनोखा प्रावधान वोटर को मतदाता सूची में शामिल करने की बजाय बाहर करने से ज्यादा प्रेरित नजर आता है। पश्चिम बंगाल की एसआईआर का एक करिश्मा अभी हाल ही प्रकाश में आया है। कोलकाता के अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर राजगोपाल के पासपोर्ट का नवीनीकरण खटाई में पड़ गया। दरअसल, एसआईआर के दौरान उनका नाम मतदाता सूची से बाहर हो गया है। पासपोर्ट में देर के कारण वे अपनी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए अमेरिका नहीं जा पाए।
अभी हाल में विदेश मंत्रालय ने यह कहकर लोगों की चिंता बढ़ा दी है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इससे नया विवाद खड़ा हो गया है। लोगों की पहचान से जुड़े कई दस्तावेज सरकार जारी करती है। फिर उन पर खुद सवाल उठाती है। एक अन्य फैसला नागरिक समाज पर सरकार की गहराती छाया की तस्वीर दिखाता है। विदेशी अंशदान विनियमन नियम (एफसीआरए) 2026 में संशोधन के जरिये विदेशी धन लेने वाले अशासकीय संगठनों (एनजीओ) को अपनी गतिविधियों को परिभाषित करना पड़ेगा, कामकाज का क्षेत्र बताना होगा और कई सूक्ष्म जानकारियां सरकार को देना होंगी। जाहिर है, ऐसे नियमों से अशासकीय संगठनों पर सरकार का शिकंजा मजबूत होगा। कुछ एनजीओ शिक्षा, स्वास्थ्य और कई अन्य क्षेत्रों में अच्छा मैदानी काम करते हैं। वे जरूरी मुद्दों पर जनमत जगाते हैं। नए नियम उनकी गतिविधियों पर असर डालेंगे। सरकार ने विदेशी धन के दुरुपयोग और गैरकानूनी धर्मपरिवर्तनों पर चिंता जताते हुए विदेशी सहायता लेने वाले एनजीओ पर नजर रखने के लिए कड़े नियम बनाए हैं।
यहां अतीत की स्थिति पर नजर डालना भी उचित होगा। आम नागरिकों, मीडिया, गैर सरकारी संगठनों पर सरकार की पैनी नजर रखने के प्रावधान सिर्फ बीते दस-बारह सालों में नहीं किए गए हैं। पहले भी सरकारें मीडिया और सिविल सोसायटी पर अंकुश लगाने के उपाय करती रही हैं। मिसाल के तौर पर देश में सबसे पहले सेंसरशिप इमरजेंसी के दौरान (1975-1977) लागू हुई थी। उस वक्त जानकारी के मुख्य स्रोत अखबार और सरकारी रेडियो, टेलीविजन (बहुत सीमित क्षेत्र में) थे। अखबारों के दफ्तरों में केंद्र सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अफसरों का आना-जाना रहता था। पीटीआई, यूएनआई, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार को मिलाकर बनी सिर्फ एक न्यूज एजेंसी 'समाचार' काम करती थी। सभी अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और प्रादेशिक समाचार एक स्रोत से आते थे।
आपातकाल के दौरान सरकार की सख्ती के कारण अधिकतर अखबार सरकार की लाइन पर चलते थे। इस संबंध में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की टिप्पणी गौरतलब है। इमरजेंसी के बाद उन्होंने कहा था, सरकार ने तो अखबारों से बैठने के लिए कहा था लेकिन वे तो उसके सामने जमीन पर लेट गए थे। 1976 में एफसीआरए कानून लागू किया गया था। उसमें 2010 में कुछ और सख्त प्रावधान किए गए। 2020 में सहयोगी संगठनों को विदेशी अंशदान ट्रांसफर करने पर रोक लगाई गई। इसका असर संगठनों के कामकाज पर पड़ा है। पिछले 12 वर्षों में मार्च 2026 तक लगभग बीस हजार संगठनों के एफसीआरए लायसेंस खत्म हो गए हैं।
असहमति और विरोध को कुचलने का सुनियोजित दौर 2014 से ज्यादा तेज हुआ है। अलबत्ता 2024 के बाद उसमें थोड़ी गिरावट आई है। लोकसभा में 240 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण सरकार के तीखे तेवर ढीले पड़े हैं। फिर भी, सरकार एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) की घनघोर सक्रियता से विरोध को दबाने की कोशिश कर रही है। ईडी ने विपक्षी दलों के नेताओंं की नाक में दम कर रखा है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले ईडी की हलचल कुछ ज्यादा ही तेज रहती है। ऐसी खबरें कई बार आई हैं कि 2014 से 2024 के बीच ईडी की 90 प्रतिशत से अधिक कार्रवाई विपक्षी नेताओं के खिलाफ हुई है। मीडिया भी ईडी की चपेट में आया है। इधर बीते एक-दो वर्षों से ईडी ने आईएएस और अन्य अधिकारियों, कुछ व्यवसायियों के खिलाफ ज्यादा सक्रियता दिखाई है। शायद इससे उसे यह बताने की सहूलियत मिल जाएगी कि उसकी कार्रवाई विपक्षी नेताओं तक सीमित नहीं है।
वैसे, ईडी को अपनी ताबड़तोड़ हलचल के बीच आघात भी लगा है। उसे एक चर्चित मामले में अदालत की फटकार सुननी पड़ी है। जून में दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यूज पोर्टल न्यूजक्लिक और उसके संस्थापक प्रधानसंपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दिल्ली पुलिस की एफआईआर और ईडी की कार्रवाई को रद्द कर दिया। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने अपने आदेश में कहा कि 'ईडी द्वारा लगभग डेढ़ वर्ष तक की गई जांच के बाद आज तक ऐसा कोई भी आपत्तिजनक आरोप सामने नहीं आया है, जो बताए कि मनीलांडरिंग कानून- पीएमएलए की धारा 4 के तहत अपराध हुआ है।
सरकार की प्रलोभन और दंड देने की दोतरफा रणनीति ने मीडिया के बड़े हिस्से को प्रभावित किया है। लोकतंत्र, आजादी और जनहित के मुद्दों को बेखौफ उठाने वाले संस्थानों की आवाज दबाने के लिए पूंजीपतियों का इस्तेमाल किया गया है। असहज और असुविधाजनक मीडिया संस्थानों को सरकार के पसंदीदा पूंजीपतियों ने खरीद लिया है। मीडिया का बड़ा हिस्सा हास्यास्पद तरीके से सत्ताधारियों के एजेंडा को आगे बढ़ा रहा है। लेकिन एक वर्ग ऐेसा भी है जो तमाम जोखिम और नुकसान के बीच सच बताने के रास्ते पर चल रहा है। वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की असली भूमिका को सार्थक करता है।
सरकार का दमन और उत्पीड़न अधिकतर आवाजों को खामोश कर देता है। लोग यथास्थिति से समझौता कर लेते हैं। बहुत कम लोग नागरिक आजादी, न्याय, समानता और मानव अधिकारों के पक्ष में आवाज उठाते हैं। मामूली विरोध प्रदर्शन के लिए लंबे समय तक हिरासत में रखने के बढ़ते मामले लोगों का साहस और मनोबल कमजोर करते हैं। फिर भी, कुछ कोनों से उम्मीद की आवाजें उभरती रहती हैं। इसलिए जस्टिस जामदार की दो टूक राय दूसरे लोगों को रास्ता दिखाती है। संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका से निराशा के दौर में उनका फैसला ताजी हवा के झोंके की तरह है। जस्टिस जामदार के फैसले पर इंडियन एक्सप्रेस की संपादकीय टिप्पणी का शीर्षक असरदार तरीके से बहुत कु छ कहता है। शीर्षक पर गौर कीजिए- धन्यवाद जस्टिस जामदार (थैंक यू जस्टिस जामदार)। लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी और इंसाफ के पक्ष में खड़ी हर आवाज जस्टिस जामदार को धन्यवाद दे रही होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


