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चुनावी नतीजों से अधिक महत्वपूर्ण हैं हटाए गए मतदाता

मतदान का अधिकार रखने वाले किसी भी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाना मतदाता सूची में दर्ज सभी लोगों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

चुनावी नतीजों से अधिक महत्वपूर्ण हैं हटाए गए मतदाता
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डॉ.परकाला प्रभाकर

मतदान का अधिकार रखने वाले किसी भी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाना मतदाता सूची में दर्ज सभी लोगों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। याद कीजिए, अप्रैल 2026 में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से संबंधित सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने उन स्थितियों पर चिंता जताई थी जहां नाम हटाए जाने की संख्या जीत के अंतर से अधिक हो सकती है।

भारत में विपक्षी दल या तो भोले हैं या फिर हमें इस नतीजे पर पहुंचना होगा कि 'वोट चोरी' का नारा लगाते समय वास्तव में वे ईमानदार नहीं हैं। अगर वे वाकई 'वोट चोरी' और बड़े पैमाने पर लक्षित मतदाता सूची से नाम हटाने की बात पर यकीन करते हैं तो वे इन फर्जी चुनावों में हिस्सा क्यों ले रहे हैं और उन विधानसभाओं में क्यों बैठे हैं जिनका चुनाव 'वोट चोरी' और मतदाता सूची से नाम हटाने के आधार पर हुआ है? यह तर्क उचित है कि चुनावों में निष्पक्षता और उचित प्रक्रिया पर उठ रहे गंभीर सवालों के मद्देनजर पूरे विपक्ष को चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए और लोकसभा व सभी राज्य विधानसभाओं से इस्तीफा दे देना चाहिए। इससे जनता की नजरों में भाजपा की वैधता खत्म हो जाएगी।

ममता बनर्जी के रुख के बारे में बात करें। अगर वे वाकई घोषित जनादेश को अस्वीकार करने को लेकर गंभीर हैं और इस्तीफा देने से इंकार करती हैं तो इसका मतलब है कि वे नवगठित विधानसभा को मान्यता नहीं देतीं जिसका सीधा मतलब है कि वे निवर्तमान विधानसभा को अभी भी वैध मानती हैं। ऐसे में उन्हें यह कहना चाहिए कि इस अवैध चुनाव में चुने गए उनके दल के सभी लोग सदन से इस्तीफा दे दें और उनका इस्तीफा दिलवा देना चाहिए। तब ममता का दावा मजबूत लगेगा। अगर आप कहें कि 'मेरी पार्टी के विजेता ठीक हैं लेकिन आपकी पार्टी के विजेता अवैध रूप से चुने गए हैं', तो इससे उनके इस दावे के बारे में क्या पता चलता है?

अगर वे जीत भी जातीं तो भी नतीजों को अस्वीकार करना ही सही तर्क होता क्योंकि चाहे कोई भी जीता हो या हारा हो, 93 लाख वोटों को रद्द करना और 27 लाख लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करना पूरी प्रक्रिया को बिगाड़ देता है। अगर यही उनका रुख होता तो इसे वास्तविक माना जाता और उनके इस रुख को पूरे भरोसे के साथ लिया गया कदम समझा जाता। दुर्भाग्य से अब उन पर हार को स्वीकार न करने का आरोप लग सकता है। बड़े पैमाने पर वोटों को रद्द किए जाने और 'विचाराधीन श्रेणी' के मतदाताओं की बड़ी तादाद को वोट डालने से रोके जाने के बाद अब समय आ गया है कि सभी विपक्षी दल एक साथ बैठें और गंभीरता से विचार करें।

बिहार और राहुल गांधी के नेतृत्व में हुई 'वोट अधिकार' यात्रा पर विचार करें। इस यात्रा को 'हमारे लोकतंत्र के सबसे पवित्र अधिकार 'मतदान के अधिकार की रक्षा' के लिए एक सामूहिक लड़ाई' के रूप में वर्णित किया गया था। इस यात्रा ने 1,300 किलोमीटर से अधिक की दूरी और 20 से अधिक जिलों को कवर किया जिसका उद्देश्य 'मतदाता सूची में हेरा-फेरी को उजागर करना और चुनाव आयोग से त्रुटिरहित मतदाता सूचियों की मांग करना' था। उमड़ती भीड़ को देखकर कांग्रेस को लगा कि वे किसी तरह जीत जाएंगे। तो इसका अर्थ यह है कि वंचित लोगों के बजाय चुनाव में जीत ज़्यादा मायने रखती थी। यदि वे जीत जाते तो क्या इसका मतलब यह होता कि नाम मिटाना और मताधिकार से वंचित करना मायने नहीं रखता?

मतदान का अधिकार रखने वाले किसी भी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाना मतदाता सूची में दर्ज सभी लोगों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। याद कीजिए, अप्रैल 2026 में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से संबंधित सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने उन स्थितियों पर चिंता जताई थी जहां नाम हटाए जाने की संख्या जीत के अंतर से अधिक हो सकती है जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गहन जांच की आवश्यकता को आमंत्रित करता। इसका एक निहितार्थ यह है कि नाम हटाए जाने का मुद्दा केवल उन लोगों की प्राथमिकताओं के आधार पर बनता है जिनका नाम नहीं हटाया गया है! यदि मतदाता सूची में शामिल लोग किसी पार्टी/उम्मीदवार को चुनते हैं और उस पार्टी/उम्मीदवार की जीत का अंतर हटाए गए नागरिकों की संख्या से कम है तो क्या हटाए गए लोगों का कोई महत्व है? ध्यान देने वाली बात है कि बिहार में चुनाव परिणाम आने के बाद मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के बारे में अब कोई बात नहीं करता।

तमिलनाडु, केरल, पुड्डुचेरी जैसे राज्यों में भी ऐसी ही कहानी दोहराई जा रही है जहां चुनाव तो हुए लेकिन विवाद उतना नहीं है। वहीं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी यही हाल है जहां चुनाव नहीं हुए लेकिन एसआईआर लागू था और वहां 2.8 करोड़ लोगों के अकाउंट डिलीट किए गए- इन लोगों के बारे में क्या विचार किया जा रहा है? कोई राजनीतिक दल, मीडिया, यहां तक कि तथाकथित स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इनके बारे में बात नहीं करते। दूसरे शब्दों में कहें तो जब चुनाव ही नहीं हैं तो 2.8 करोड़ लोगों का हमारे लिए कोई महत्व नहीं है?

जब तक यह संस्थागत कब्ज़ा टूट नहीं जाता, चुनावों का बहिष्कार करना और विधानसभाओं से इस्तीफा देना सुनने और देखने में तो आदर्श लगता है लेकिन व्यावहारिक समाधान प्रतीत नहीं होता। वास्तविक जीवन में आदर्श और व्यावहारिक होने का मेल बहुत कम ही होता है। हमारे देश के जनजीवन में यही वह क्षण है जब ऐसे मेल की सख्त जरूरत है। हमारे गणतंत्र के इस मोड़ पर जब हम एक गहरे संकट का सामना कर रहे हैं तो प्रेक्टिकल होना ही आदर्श है और आदर्श ही प्रेक्टिकल है।

यदि हम ममता बनर्जी को एक सच्चा योद्धा मानते हैं तो उन्हें यह तय करना चाहिए कि उनके सभी नव निर्वाचित विधायक इस्तीफा दे दें या उस नई विधानसभा में शपथ लेने से इंकार कर दें जिसकी वैधता पर वे सवाल उठा रही हैं। तब वे विश्वसनीय साबित होंगी अन्यथा उन पर यह आरोप लग सकता है कि वे केवल एक हारी हुईं नेता हैं। लेकिन क्या विपक्ष इस चुनौती का सामना कर सकता है? अब यह सामान्य स्थिति नहीं रही। असाधारण समय में असाधारण उपायों की आवश्यकता होती है। आखिरकार लोकतंत्र दांव पर लगा है। यह हमारा गणतंत्र है, हमने संविधान स्वयं को सौंपा है।

1950 में हमारे बीच परस्पर किए इस वादे को केवल एक शांतिपूर्ण, गांधीवादी जमीनी आंदोलन ही बचा सकता है। उस वादे में निहित मूल्य-स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, न्याय, धर्मनिरपेक्षता केवल उसी के माध्यम से संरक्षित किए जा सकते हैं। हममें से प्रत्येक को लोकतंत्र और भारत के विचार को बचाने का निर्णय लेना होगा और इसके लिए काम करना पड़ेगा। याद रखें कि इस भूमि पर रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस देश का मालिक है। यह किसी एक संप्रदाय, धर्म, जाति, पंथ, क्षेत्र, रंग, खान-पान और परंपराओं का नहीं है। यह सबका है। भारत के इस विचार से असहमत ताकतों ने इस पर आक्रमण किया और इसे कमजोर करने के लिए सौ वर्षों तक काम किया। आज भारत के मूल स्वरूप की रक्षा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है - एक ऐसा देश, एक ऐसा क्षेत्र, एक ऐसा स्थान जो सभी के लिए उपलब्ध है और होना चाहिए।

(लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


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