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बजट सत्र का शेष हिस्सा प्रधानमंत्री के लिए और भारी

प्रधानमंत्री मोदी के लिए संसद के बजट सत्र का पहला हिस्सा बहुत मुश्किल था

बजट सत्र का शेष हिस्सा प्रधानमंत्री के लिए और भारी
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  • शकील अख्तर

अब बजट सत्र का दूसरा हिस्सा आ गया। राहुल फिर लोकसभा में होंगे और जैसा कि उनका दावा है और वह हर बार सही साबित हो रहा है कि प्रधानमंत्री सदन में मेरे सामने नहीं आ सकते। अब जब अमेरिका ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर दिया है भारत की सारी तेल और गैस की आपूर्ति रुक गई है। और अमेरिका बहुत दया दिखाकर हमें 30 दिन के लिए रूस से तेल खरीदने की छूट दे रहा है

प्रधानमंत्री मोदी के लिए संसद के बजट सत्र का पहला हिस्सा बहुत मुश्किल था। लेकिन दूसरा हिस्सा उससे भी ज्यादा मुश्किल होगा यह उन्होंने नहीं सोचा था।

सोमवार 9 मार्च से दूसरा हिस्सा शुरू हो रहा है। विपक्ष जोश में है। पहले हिस्से के दौरान अमेरिका के साथ डील पर मोदी कुछ नहीं बोल सके। इसके अलावा उनके सबसे बड़े मुद्दे राष्ट्रवाद पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना अध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवाणे की किताब के जरिए बड़ा हमला कर दिया। राहुल ने कहा कि जब चीनी टैंक अपनी पैदल सेना के साथ पूर्वी लद्दाख में हमारी सीमा में घुस रहे थे तो मोदी उन्हें रोकने का आदेश देने में असमर्थ साबित हुए। चीनी सीमा पर बिना प्रधानमंत्री से पूछे कोई कार्रवाई करने से मना कर रखा था।

थल सेना अध्यक्ष रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर विदेश मंत्री सुरक्षा सलाहकार सबसे फोन करके, हाट लाइन पर कहते रहे कि पूछिए क्या करना है? करीब ढाई घंटे तक कुछ नहीं बताने के बाद आखिरी में प्रधानमंत्री का जवाब आया जो उचित समझो वह करो! देश में कमजोरी छुपाने के लिए यह मुहावरा बन गया।

देश की सुरक्षा से समझौता! मगर प्रधानमंत्री ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। किया, सिर्फ यह कि लोकसभा में जहां उन्हें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देना था वहां आए ही नहीं। लोकसभा अध्यक्ष से कहलवा दिया कि विपक्ष की महिला सांसदों से खतरा! देश की सुरक्षा से समझौता और महिला सांसदों से डर!

संसदीय इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बिना प्रधानमंत्री या सदन के नेता के जवाब दिए पास करना पड़ा। अभी राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू कह रही हैं कि बंगाल जाने पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (विपक्ष) ने उऩका अपमान किया! भूल गईं कि अपमान तो एक महीने पहले प्रधानमंत्री ने उनके अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब न देकर किया था! लेकिन विपक्ष ने उस मामले में राष्ट्रपति का नाम जुड़ा होने के कारण अभिभाषण को मुद्दा नहीं बनाया और उसे पारित हो जाने दिया। सोचिए कि विपक्ष अगर उसे पास करने से इनकार कर देता तो राष्ट्रपति का कितना अपमान होता? मगर विपक्ष ने खुद को केवल प्रधानमंत्री तक ही सीमित रखा।

प्रधानमंत्री के लिए बजट सत्र की शुरूआत ही मुश्किलों के साथ हुई। बजट में तो कुछ आम आदमी के लिए था ही नहीं। मगर अमेरिका ने बजट पेश होने के अगले दिन ही डील की घोषणा करके अपने यहां से बिना किसी शुल्क ( टैरिफ) के जो कृषि उत्पाद भारत भेजे जाने हैं उसकी लिस्ट जारी कर दी। प्रधानमंत्री मोदी वादे कर रहे थे कि भारतीय बाजार विदेशों के कृषि उत्पाद के लिए नहीं खोला जाएगा। और यहां अमेरिका ने कह दिया कि उसके कृषि उत्पाद भारत जाएंगे भी और मोदी सरकार उन पर कोई टैरिफ भी नहीं लेगी। नेता प्रतिपक्ष राहुल ने इसे भारत के किसानों के साथ विश्वासघात बताया। डील पर मोदी बहुत बुरी तरह घिर गए। मगर यहां भी कोई जवाब नहीं दे पाए।

राहुल गांधी ने लोकसभा में ही एपस्टीन फाइल का नाम लेकर यह और कह दिया कि उसकी वजह से ट्रंप हमारे प्रधानमंत्री का मुंह बंद किए हुए है। नहीं तो भारत का कोई भी प्रधानमंत्री भारत की अर्थव्यवस्था को तबाह करने वाली ऐसी डील नहीं करता। साथ ही यह भी कहा कि ट्रंप के एक हाथ में एपस्टीन फाइल है जिससे वह एक तरफ से गर्दन पकड़े है तो दूसरे हाथ में अडानी के क्रिमिनल मामलों के केस हैं इससे दूसरी तरफ से गर्दन दबा रहा है। न प्रधानमंत्री और न अडानी इन स्पष्ट आरोपों का जवाब दे पाए।

और अब बजट सत्र का दूसरा हिस्सा आ गया। राहुल फिर लोकसभा में होंगे और जैसा कि उनका दावा है और वह हर बार सही साबित हो रहा है कि प्रधानमंत्री सदन में मेरे सामने नहीं आ सकते। अब जब अमेरिका ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर दिया है भारत की सारी तेल और गैस की आपूर्ति रुक गई है। और अमेरिका बहुत दया दिखाकर हमें 30 दिन के लिए रूस से तेल खरीदने की छूट दे रहा है तब संसद के बजट सत्र का दूसरा हिस्सा शुरू हो रहा है।

मोदी जो हर मामले में बोलते हैं अमेरिका के मामले में एक शब्द भी नहीं बोल पा रहे हैं। पूरी तरह मौन हैं। बदनाम तो किया था सोच समझ कर बोलने वाले विद्वान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मौन मनमोहन बोल कर। मगर खुद तो केवल मौन ही नहीं हुए। ट्रंप के सामने हर मामले में मौन रहकर सहमति प्रकट करते हुए और दिख रहे हैं।

अमेरिका ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या कर दी। लेकिन 6 दिन तक मोदी सरकार कोई प्रतिक्रिया तक व्यक्त नहीं कर पाई। लेकिन फिर जब कांग्रेस ने इसकी निंदा की। सोनिया और राहुल बोले तो भारत के विदेश सचिव ने ईरान दूतावास जाकर वहां शोक पुस्तिका में श्रद्धांजलि लिखी।

अमेरिका का इतना डर। और यह डर अब सर्वव्यापी हो गया। डर भी छूत की बीमारी की तरह होता है। एक के होते ही तेजी से फैलने लगता है। सब में तो नहीं फैलता। जैसे राहुल पर डर का कोई असर नहीं है। मगर यह बात सबके लिए नहीं कही जा सकती।

अभी सबने देख लिया कि नीतीश कुमार जिन्हें लोग प्रधानमंत्री मटेरियल बता रहे थे वे टिन पत्तर वाले मटेरियल निकले। ऐसे डरे, दबे कि मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने को तैयार हो गए। खुद से लिखकर अपना मजाक उड़वा लिया कि राज्यसभा नहीं देखी थी वहां जाने की इच्छा है। पचासों उनके राज्यसभा में खड़े होकर बोले जाने वाले जवाब होंगे, दूरदर्शन के पास वीडियो होंगे कि जब वे केन्द्र सरकार में मंत्री थे कितनी बार राज्यसभा जाना होता था।

नीतीश कुमार शायद भूल गए कि मंत्री दोनों सदनों में जा सकता है। जाता है। सदस्य वे लोकसभा के बने थे। मगर मंत्री दोनों सदनों में जवाबदेह होता है। जाना पड़ता है। जैसे मीडिया अब मोदी के मौन पर मौन है। वैसे ही नीतीश की बाडी लेंग्वेज पर भी। यूपीए के टाइम में कांग्रेस के नेताओं की बाडी लेंग्वेंज ही मीडिया पढ़ता रहता था। मगर अब यह विद्या विस्मृत हो गई है। नीतीश की तो बाडी लेंग्वेंज के साथ मानसिक अवस्था पर भी बात करना जरूरी थी। मगर सारा मीडिया जिसमें बिहार के कई योग्य पत्रकार भी शामिल हैं इस मामले में कुछ नहीं बता रहे।

अगर कांग्रेस का या विपक्ष का कोई और मुख्यमंत्री होता तो उसकी ब्रेन रीडिंग भी यह कर देते और पूरे खानदान की भी। मगर यहां नीतीश की और जो उनके बेटे निशांत को बिहार में स्थापित करने की बात कही जा रही है उसकी राजनीतिक समझ की भी एक बात यह मीडिया नहीं करता है। संसद के सदनों के चाहे अंदर नहीं गूंजे मगर संसद सदस्यों के बीच तो यह मुद्दा सबसे हॉट टॉपिक रहेगा ही कि नीतीश का राजनीतिक कैरियर किस अपमानजनक तरीके से खत्म किया जा रहा है। सोमवार को पहले दिन ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा होगी। इसके नोटिस पर टीएमसी ने साइन नहीं किए थे। शायद कोई रियायत की उम्मीद होगी। मगर राष्ट्रपति को उनके खिलाफ खड़ा करके शिकंजा और कसा जा रहा है। ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष को हटाए जाने का प्रस्ताव जो वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी के ही खिलाफ है उस पर टीएमसी के तेवर भी अब कड़े होंगे।

मतलब बजट सत्र के पहले पार्ट में जो एक बड़ी विपक्षी पार्टी टीएमसी खुद को संयुक्त विपक्ष से अलग दिखा रही थी वह भी अब बजट सत्र के दूसरे पार्ट में साथ मिलकर काम करेगी। देखना मजेदार होगा संसद में ही यह घोषणा करने वाले कि एक अकेला सब पर भारी मोदी कितना विपक्ष के सामने टिक पाते हैं। पार्ट वन में तो लोकसभा ही नहीं आए थे। पार्ट टू में क्या राज्यसभा से भी बचेंगे?

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की घोषणा होने वाली है। संसद से वहां के लिए भी संदेशे जाएंगे। विपक्ष तो पहुंचाएगा ही। देखना प्रधानमंत्री को होगा कि वे किस तरह अब संसद को फेस कर पाते हैं?


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