लाल किले का भाषण और फासीवादी एजेंडा की खुलती परतें
'दिमागी नक्सलÓ के नाम पर किस तरह मौजूदा निजाम की तमाम वास्तविक आलोचनाओं को मोदीशाही निशाने पर रखने जा रही है,

मोदीशाही 'दिमागी नक्सलियों' का हौआ खड़ा करने का सहारा ले रही है, तो इसलिए कि उसे जेन ज़ी के हाल के उभार ने डरा दिया और उसे इस अप्रत्याशित हमले की कोई नयी काट सूझ ही नहीं रही है, जबकि हिंदू-मुस्लिम करने का पुराना पत्ता, इसके सामने बेकार साबित हो रहा है। इस उम्मीद में कि शायद जेन ज़ी रैडीकल विचारों से वैसे ही डरता होगा, जैसे कि नव-उदारीकरण के शुरू होने के बाद बड़ी हुई मिलेेनियल्स की पीढ़ी डरती थी।
यह संयोग ही नहीं है कि भारत के अपनी स्वतंत्रता के 80वें वर्ष मेें प्रवेश के मौके पर, अपने तेरहवें स्वतंत्रता दिवस संबोधन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, देश को और प्रकट तथा खुली तानाशाही की ओर धकेलने के अपने इरादों का ऐलान करने का मौका बनाया है। मोदी के इस आह्वïान का कि कथित 'हथियारी नक्सलों' के खात्मे के बाद, अब 'दिमागी नक्सलियों' को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा'; एक और एक ही अर्थ है—तानाशाही को आगे बढ़ाना। 'दिमागी नक्सली' की संज्ञा अटपटी हो सकती है, पर इसका निशाना एकदम स्पष्टï है—सत्ताधारी संघ-भाजपा के आंदोलनात्मक विरोध को ही नहीं, उसके प्रति आलोचनात्मक विचार को ही, जुर्म बना देना! यह सत्ता के विरोधी विचार मात्र को अपराध बना देना है, जिसकी जनतंत्र की किसी भी परिभाषा में गुंजाइश नहीं हो सकती है।
'दिमागी नक्सल' के नाम पर किस तरह मौजूदा निजाम की तमाम वास्तविक आलोचनाओं को मोदीशाही निशाने पर रखने जा रही है, इसका संकेत खुद मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में ही मौजूद था। बेशक, मोदी का खास निशाना इसमें भी यूपीए के दौर पर है, जब यूपीए-1 के दौरान, सरकार को बाहर से समर्थन दे रही वामपंथी पार्टियों के दबाव ने और फिर यूपीए-2 के दौरान, एक हद तक श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में गठित सलाहकार परिषद ने, बाजारवादी नीतियों के दुष्प्रभावों पर अंकुश लगाने का, उनकी धार को भोंथरा करने का काम किया था। मनरेगा, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार, वनाधिकार आदि, जनता के अधिकारों का विस्तार करने वाले कानून, इसी प्रकार के अंकुश से निकले थे।
जाहिर है कि इजारेदार पूंजी को अपने 'राज' पर ये अंकुश कभी गवारा नहीं थे और इसीलिए ये अंकुश इजारेदार पूंजी के सबसे मुकम्मल प्रतिनिधि, संघ-भाजपा को भी गवारा नहीं थे। 12 साल में, सत्ता के गलियारों में औपचारिक और अनौपचारिक, दोनों ही हैसियतों से जैसे ठूंस-ठूंसकर आरएसएस-सर्टीफाइड लोगों को भरा जा चुका है, जिसमें भांति-भांति के वंचकों को भरा जाना भी शामिल है, उसके बाद जाहिर है कि ऐसे अंकुश लगाने वाले विचारों के वाहक सत्ता के गलियारों में दूर-दूर तक भी नहीं रहे होंगे। इसके बावजूद, मोदी अगर इस तरह के विचार के लोगों और विचारों का हौआ दिखा रहे हैं, तो इसके तीन ही मकसद हो सकते हैं।
पहला, जनता के हित के ऐसे तमाम विचारों तथा उसके अधिकारों की ऐसी चिंताओं को एक प्रकार से अपराध ही बनाकर, शासन से जुड़े लोगों के सोच-विचार के लिए वर्जित ही कर देना। संविधान में गारंटीकृत निजी स्वतंत्रताओं जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता आदि को सचेत रूप से संकुचित किया है, उससे जनता को अधिकार-संपन्न नागरिकों के बजाए, लाभार्थी बनाकर, कृपाकांक्षी प्रजा में तब्दील करने का छल साफ हो जाता है।
दूसरा मकसद, यह हो सकता है कि संघ-भाजपा की सारी घेरेबंदी के बावजूद, अगर सत्ता के गलियारों के किन्हीं कोने-अंतरों में कुछ ऐसे लोग कॉकरोचों की तरह छुपे रह गए हों, जो मौजूदा नीतियों की चौतरफा विफलता के कारणों को पहचानते हों, तो उनके फिर से मुखर होने और दूसरों को प्रभावित करने के रास्ते पहले से ही बंद कर दिए जाएं। और तीसरा तथा शायद बाकी दोनों मकसदों से बड़ा मकसद, यह लगता है कि मौजूदा चौतरफा संकट के बीच, जब अब तक अपनी पांचों उंगली घी में होने के बावजूद, इजारेदार पूंजी को अपने दूरगामी लक्ष्यों को लेकर चिंताएं होने लगी हैं, इजारेदार पूंजी को इसका भरोसा दिलाया जाए कि संकट के दबाव में भी मोदीशाही, यूपीए के समय जैसे संतुलनों और अंकुशों की ओर लौटने वाली नहीं है। अपने 13वें स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रधानमंत्री ने जो बार-बार 'सुधारों' का वादा किया है, उसका मकसद बड़ी पूंजी को इसी का भरोसा दिलाना है कि मोदी राज में आम जनता की कीमत पर उसके स्वार्थों की सेवा इसी तरह की जाती रहेगी।
बेशक, 'दिमागी नक्सलियों' के खिलाफ नरेंद्र मोदी द्वारा छेड़ी गयी यह मुहिम इस अर्थ में नयी भी नहीं है कि कथित 'शहरी नक्सलियों' के खिलाफ मोदी राज ने एक प्रकार से शुरू से ही मुहिम छेड़ रखी है। इसी मुहिम के हिस्से के तौर पर एक तरफ जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, जादवपुर यूनिवर्सिटी आदि को मिसाल बनाकर, शासन के प्रति आलोचनात्मक रुख को बढ़ावा देने वाली मानी जाने वाली उच्च शिक्षा संस्थाओं को और आलोचनात्मक रुख अपनाने वाले सार्वजनिक बुद्घिजीवियों तथा मूलगामी सामाजिक कार्यकर्ताओं को और दूसरी ओर जनता के हित के मुद्दों पर अभियान चलाने वाले एनजीओज़ को, शासन की दमनकारी ताकत का निशाना बनाया गया।
जेएनयू छात्र संघ के तत्कालीन नेताओं के खिलाफ गढ़ा गया 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' नारों का केस, नागरिक अधिकार व जनतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ताओं व बुद्घिजीवियों के खिलाफ थोपा गया भीमा कोरेगांव षड्यंत्र केस और सीएए-विरोधी आंदोलन में सक्रिय हुए विशेष रूप से मुस्लिम युवा बुद्घिजीवी सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ थोपा गया दिल्ली दंगा वृहत्तर षड्यंत्र केस, जनतांत्रिक आवाजों के खिलाफ मोदी निजाम की लगातार जारी रही मुहिम के कुछ ही उदाहरण हैं। इसके साथ ही विपक्ष को साम, दाम, दंड, भेद, हर तिकड़म से कमजोर करने और संसदीय बहुमत को हथियार बनाकर तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा किए जाने को और जोड़ लें तो, व्यावहारिक माने में तानाशाही का ही नक्शा हमारे सामने आ जाता है।
इसके बावजूद, मोदीशाही 'दिमागी नक्सलियों' का हौआ खड़ा करने का सहारा ले रही है, तो इसलिए कि उसे जेन ज़ी के हाल के उभार ने डरा दिया और उसे इस अप्रत्याशित हमले की कोई नयी काट सूझ ही नहीं रही है, जबकि हिंदू-मुस्लिम करने का पुराना पत्ता, इसके सामने बेकार साबित हो रहा है। इस उम्मीद में कि शायद जेन ज़ी रैडीकल विचारों से वैसे ही डरता होगा, जैसे कि नव-उदारीकरण के शुरू होने के बाद बड़ी हुई मिलेेनियल्स की पीढ़ी डरती थी,'दिमागी नक्सली' कहकर, रैडीकल विचारों से डराकर, इस पीढ़ी को नव-उदारवादी अंधविश्वासों के बाड़े में बंद रखने की और उसके सहारे बहुसंख्यकवाद के भी दायरे में बांधे रखने की, कोशिश की जा रही है। इसीलिए, मोदी के भाषण में 'दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा' को सीधे इससे जोड़ा गया है कि 'राष्ट्र को विकसित राष्टï्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा।'
लेकिन, मोदी जी के दुर्भाग्य से इस युवा पीढ़ी ने नव-उदारवादी नीतियों की तबाही से लेकर, राम मंदिर की लूट तक सब देखा है और पूंजी के पश्चिमी गढ़ों में बढ़ती प्रगतिशील विचारों की स्वीकृति से उनका नजदीकी परिचय है। यह पीढ़ी मोदी जी के खड़े किए हौवे से डरकर, मौजूदा निजाम को नियति मानकर स्वीकार करने वाली नहीं है। लाल किले से अपने 76 मिनट के भाषण में मोदी ने 20 बार युवा या युवाओं का इस्तेमाल किया और 16 बार नौजवानों तथा 4 बार नौजवान शब्द का। इसके अलावा उन्होंने 4 बार युवा शक्ति की भी बात की। लेकिन, युवाओं के हाल के आंदोलन, परीक्षा-शिक्षा धांधली को लेकर उनकी चिंताओं का जिक्र करने सचेत रूप से बचते रहे। सारे हाथ-पांव मारने के बाद भी इस मोर्चे पर कुछ हासिल नहीं होगा और यह संकट बढ़ता ही जाएगा, इसका एहसास मोदी को हो गया है।
लालकिले से प्रधानमंत्री मोदी ने जो घोषणा की है कि, 'एक बहुत बड़ा वालंटरी फोर्स सिविल डिफेंस का आधुनिक चुनौतियों को पार करने वाला हम बनाने वाले हैं', जेन ज़ी तथा जेन अल्फा समेत, जनता के बढ़ते असंतोष तथा आने वाले समय में उठने वाले आंदोलनों से शासन की दमनकारी ताकत के बल पर निपटने की मोदीशाही की तैयारियों का ही हिस्सा है। याद रहे दिल्ली में युवाओं पर दमन में गैर-वर्दीधारियों की सेवाएं खूब ली गयी थीं। नयी सिविल डिफेंस फोर्स, इसी को व्यवस्थित तथा संस्थागत रूप देने का प्रयास लगती है। क्या यह वर्तमान तानाशाही के तेजी से फासीवाद के रास्ते पर बढ़ने का ही मामला नहीं होगा?
(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


