देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करते प्रधानमंत्री
नरवणे ने रक्षा मंत्री को एक और फोन किया, जिन्होंने वापस कॉल करने का वादा किया। समय खिंचता गया। हर मिनट चीनी टैंकों के शिखर तक पहुंचने के और करीब ले जा रहा था।

-सर्वमित्रा सुरजन
संभावित टकराव वाले क्षेत्रों की निगरानी की जा रही थी। लेकिन निर्णायक बिंदु रेचिन ला था। नरवणे ने रक्षा मंत्री को एक और फोन किया, जिन्होंने वापस कॉल करने का वादा किया। समय खिंचता गया। हर मिनट चीनी टैंकों के शिखर तक पहुंचने के और करीब ले जा रहा था। रात 10:30 बजे राजनाथ सिंह का फोन आया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी
लोकतांत्रिक परंपराओं और प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारियों को कैसे नकारा जाता है, इसकी ताजा मिसाल संसद के बजट सत्र में नरेन्द्र मोदी ने पेश की। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के लिए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जब अपनी बात रखना चाही, तो उन्हें बार-बार टोका गया और संसदीय इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि नेता प्रतिपक्ष का भाषण पूरा ही नहीं हुआ। पहले सोमवार 2 फरवरी को राहुल गांधी ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी से कुछ अंश सदन में पढ़ने चाहे, तो उन्हें नियम 349 का हवाला देकर टोका गया। इसके बाद राहुल गांधी का भाषण अधूरा ही रह गया, इसके बाद 3 फरवरी को भी राहुल गांधी ने अपनी बात सदन में रखना चाही, लेकिन उन्हें फिर बोलने नहीं दिया गया। सोमवार को जब राहुल गांधी ने अपना भाषण शुरु किया और राष्ट्रपति के भाषण का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर आए, वैसे ही सत्ता पक्ष में हलचल दिखने लगी। राहुल के भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तीनों मौजूद थे। उन्हें शायद अंदेशा हुआ कि अब राहुल गांधी कुछ ऐसा बोल जाएंगे, जिससे मोदी की दिखावटी 56 इंची वाली बहादुरी की पोल खुल जाएगी। इसलिए जैसे ही राहुल गांधी ने चीन का नाम लिया, सत्ता पक्ष की तरफ से हंगामा होने लगा। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला भी सरकार की ढाल बनकर खड़े हो गए। ओम बिड़ला राहुल गांधी को बार-बार याद दिलाने लगे कि संसद की मर्यादा कैसे बना कर रखी जाए और उन्हें नियमों के हिसाब से ही चलना पड़ेगा।
जानकारी के लिए बता दूं कि लोकसभा की नियम पुस्तिका का नियम 349 सदन के भीतर सदस्यों के आचरण और मर्यादा से संबंधित है। नियम कहता है कि सदस्य सदन में नारे नहीं लगा सकते और न ही किसी तरह का प्रदर्शन कर सकते हैं। इस नियम की उपधारा एक में कहा गया है कि कोई भी सदस्य किसी अखबार की क्लिपिंग या मैगजीन में प्रकाशित अंश, कोई पुस्तक के अंश सदन में नहीं पढ़ सकते। इसके अलावा सदन के भीतर झंडे, प्रतीक चिन्ह, पोस्टर, तख्तियां या धार्मिक चित्र दिखाना वर्जित है। लेकिन अगर कोई सदस्य किसी प्रकाशित अंश को सत्यापित यानी वेरिफाई करे तो फिर उसमें समस्या नहीं है। राहुल गांधी ने अगले दिन मंगलवार को अपने हस्ताक्षर के साथ उस अंश को सत्यापित करके आसंदी को सौंपा ताकि उन्हें अपना भाषण पूरा करने दिया जाए। लेकिन तब भी उन्हें बीच में ही रोका गया और उनके बाद जिन सदस्यों के नाम भाषण देने के लिए सूची में थे, उन्हें पुकारा गया। हालांकि विपक्ष ने पूरी एकता दिखाई और एक भी सांसद भाषण देने के लिए खड़ा नहीं हुआ तो फिर आसंदी ने सत्ता पक्ष के लोगों को मौका दे दिया। संसद के भीतर खुली बेईमानी की गई, लेकिन पूरी भाजपा राहुल गांधी पर देश विरोधी काम करने का आरोप लगा रही है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला भी पक्षपात के नए मापदंड स्थापित कर रहे हैं। क्योंकि जिस नियम के तहत राहुल गांधी को बोलने से रोका गया, वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लागू नहीं हुआ।
संसद के कुछ पुराने वीडियो सामने आए हैं, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी कु छ किताबों का उदाहरण देकर भाषण दे रहे हैं और ओम बिड़ला मुस्कुराते हुए उन्हें सुन रहे हैं। बुधवार को भी भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कम से कम छह किताबों का हवाला अपने भाषण में दिया और उन्हें रोका नहीं गया। लेकिन सारे नियम राहुल गांधी पर लागू किए गए।
दरअसल इसके पीछे मोदी सरकार का डर छिपा है कि चीन के अतिक्रमण पर जितनी लापरवाही और डर दिखाया गया, उसकी सच्चाई जनता के सामने आ जाएगी। मनोज नरवणे की किताब का जो अंश कारवां पत्रिका में छपा है और जिसे राहुल गांधी पढ़ना चाहते थे, उसमें बताया गया है कि 2020 में चीन के अतिक्रमण के वक्त जब भारत को तत्काल जवाबी कार्रवाई करनी चाहिए थी और जिसके लिए हमारी सेना सक्षम थी, तब शीर्ष नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह समेत तमाम लोगों ने तत्काल फैसला नहीं लिया, जिसका नुकसान देश को हुआ। मनोज नरवणे ने उन तथ्यों को किताब में लिख दिया। इसलिए सरकार घबरा रही है कि उसकी कमज़ोरी बाहर आ जाएगी। बता दूं कि रक्षा मंत्रालय ने इस किताब को प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी, हालांकि बुधवार को राहुल गांधी इस किताब को संसद में लेकर आए और उन्होंने बताया कि यह संभवत: विदेश में प्रकाशित हुई है। राहुल ने दावा किया था कि अगर प्रधानमंत्री आज संसद में आएं तो मैं खुद उन्हें यह किताब दूंगा, लेकिन वे नहीं आएंगे। और ऐसा ही हुआ, बुधवार को प्रधानमंत्री संसद में नहीं पहुंचे।
बता दें कि कारवां पत्रिका के मुताबिक इस किताब में जनरल नरवणे ने लिखा है:
भारतीय सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को 31 अगस्त 2020 की रात 8:15 बजे एक फोन कॉल मिला कि चार चीनी टैंक, पैदल सेना के साथ, पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर जाने वाले एक खड़ी पहाड़ी रास्ते पर चढ़ते हुए आगे बढ़ने लगे थे। जोशी ने इस गतिविधि की सूचना फौरन सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी। ये टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय ठिकानों से कुछ ही सौ मीटर की दूरी पर थे। भारतीय सैनिकों ने एक इल्यूमिनेटिंग राउंड दागा, जो चेतावनी थी। इसका कोई असर नहीं हुआ। चीनी आगे बढ़ते रहे। नरवणे ने बताया कि उन्होंने भारत के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के शीर्ष लोगों को फोन करने शुरू किए। जिनमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल थे।
नरवणे ने अपनी अप्रकाशित आत्मकथा फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी में लिखा, 'हर एक से मेरा सवाल था- 'मेरे लिए क्या आदेश हैं?'
स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और स्पष्ट निर्देशों की मांग कर रही थी। लेकिन नरवणे को स्पष्ट आदेश थे कि 'ऊपर से मंजूरी मिलने तक' गोली न चलाई जाए। उनके वरिष्ठों की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिला। मिनट बीतते गए। रात 9:10 बजे ले.जन. जोशी ने फिर फोन किया। चीनी टैंक आगे बढ़ते रहे और अब दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे। रात 9:25 बजे नरवणे ने फिर राजनाथ सिंह को फोन कर 'स्पष्ट निर्देशÓ मांगे। कोई जवाब नहीं मिला।
इसी बीच, पीएलए कमांडर मेजर जनरल ल्यू लिन का संदेश आया। उन्होंने तनाव कम करने का प्रस्ताव रखा कि दोनों पक्ष आगे की गतिविधि रोक दें और स्थानीय कमांडर अगले दिन सुबह 9:30 बजे दर्रे पर मिलें, दोनों ओर से तीन-तीन प्रतिनिधि हों। यह एक उचित प्रस्ताव लग रहा था। कुछ देर के लिए ऐसा लगा कि टकराव से निकलने का रास्ता बन रहा है। रात 10 बजे नरवणे ने यह संदेश राजनाथ सिंह और अजित डोभाल तक पहुंचाया। दस मिनट बाद उत्तरी कमान से फिर फोन आया। चीनी टैंक नहीं रुके थे। वे अब शिखर से मात्र पांच सौ मीटर दूर थे। नरवणे को याद है कि जोशी ने कहा, 'उन्हें रोकने का एकमात्र तरीका हमारी अपनी मध्यम तोपखाने से फायर खोलना है, जो तैयार और तैनात है।' लेकिन पीएलए के साथ तोपखाने की भिड़ंत कहीं बड़े संघर्ष में बदल सकती थी।
नरवणे लिखते हैं, 'मेरी स्थिति बेहद नाजुक थी।' एक तरफ 'कमांड थी जो हर संभव साधन से फायर खोलना चाहती थी,' और दूसरी तरफ सरकार की एक कमेटी थी 'जो अब तक मुझे स्पष्ट कार्यकारी आदेश नहीं दे पाई थी।' सेना मुख्यालय के ऑपरेशन रूम में विकल्पों पर विचार हो रहा था और उन्हें खारिज किया जा रहा था। पूरा उत्तरी मोर्चा हाई अलर्ट पर था।
संभावित टकराव वाले क्षेत्रों की निगरानी की जा रही थी। लेकिन निर्णायक बिंदु रेचिन ला था। नरवणे ने रक्षा मंत्री को एक और फोन किया, जिन्होंने वापस कॉल करने का वादा किया। समय खिंचता गया। हर मिनट चीनी टैंकों के शिखर तक पहुंचने के और करीब ले जा रहा था। रात 10:30 बजे राजनाथ सिंह का फोन आया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी, जिनका निर्देश एक ही वाक्य में था- 'जो उचित समझो, वह करो।' अब यह तय था कि फैसला 'पूरी तरह सैन्य' स्तर पर होना था। नरवणे याद करते हैं, 'मुझे मुश्किल हालात में डाल दिया गया था। इस पूरी छूट के साथ अब पूरी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी।'
रात सवा आठ बजे से साढ़े दस बजे तक का वह समय कितना संघर्ष और तनावपूर्ण रहा होगा, यह बात सेना के लोग ही बेहतर समझ सकते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इस सनसनीखेज खुलासे से डरी मोदी सरकार इस किताब को प्रकाशित करने से रोक रही है। दो-ढाई घंटे सीमा पर सेना को अटकाए रखना, देश की सुरक्षा के साथ बड़ा खिलवाड़ है। और ये खेल नरेन्द्र मोदी ने क्यों किया, इसका जवाब उन्हें प्रधानमंत्री होने के नेता देश को देना चाहिए। लेकिन इसकी जगह मोदी एंड कंपनी इस साजिश में लगी है कि राहुल गांधी को ही बोलने न दिया जाए। हालांकि राहुल गांधी संसद में जो बात नहीं बोल सके, वो अब पूरे देश को पता चल गई है। ऑपरेशन सिंदूर के वक्त भी नरेन्द्र मोदी ने देश को ऐसे ही उलझाए रखा था। सैन्य वर्दी पहनकर अपनी आदमकद तस्वीरें चौराहों पर लगवाकर मोदी अपना प्रचार करते हैं, सेना का इस्तेमाल चुनावी प्रचार के लिए कर लेते हैं, लेकिन देश को बार-बार दांव पर लगा देते हैं। याद कीजिए कि गलवान के बाद मोदी ने कहा था कि न कोई आया था, न आएगा। तब चीन से सारे संबंध तोड़ने के दावे थे। अब चीन की सत्तारूढ़ पार्टी के साथ भाजपा बैठकें करती हैं और राहुल गांधी सदन में चीन का नाम लें, तो उसे देशविरोधी काम बताती है।


