न्यायपालिका में ए. आई. के उपयोग की संभावनाएं
भारत के संदर्भ में अभी कई चुनौतियां विद्यमान हैं, जिनमें न्यायिक प्रक्रियाओं में औपचारिक ढांचे का अभाव, अत्यधिक निर्भरता का जोखिम और ए.आई.के प्रशिक्षण की कमी प्रमुख हैं

- ज. अनिल कुमार शुक्ला
भारत के संदर्भ में अभी कई चुनौतियां विद्यमान हैं, जिनमें न्यायिक प्रक्रियाओं में औपचारिक ढांचे का अभाव, अत्यधिक निर्भरता का जोखिम और ए.आई.के प्रशिक्षण की कमी प्रमुख हैं। यदि सावधानीपूर्वक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग न्यायालयीन कार्यों में किया जाए, विशेषकर उन मामलों में जो डाटा आधारित हैं, जैसे संपत्ति विवाद, मोटर दुर्घटना दावे और नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स से संबंधित प्रकरण
सर्वप्रथम मैं ख्याति प्राप्त कवि एवं चिंतक डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की पंक्तियों से अपनी बात प्रारंभ करना चाहूंगा—
क्या हार में क्या जीत में,
किंचित नहीं भयभीत मैं,
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी
सही वह भी सही,
वरदान मांगूंगा नहीं।
विषय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए. आई. )अर्थात कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उसके न्यायपालिका में उपयोग से संबंधित है, जो जितना आधुनिक है उतना ही महत्वपूर्ण भी है। इसलिए इसके मूल स्वरूप को संक्षेप में समझना आवश्यक है, ताकि आगे हम न्यायपालिका में इसके प्रयोग को बेहतर ढंग से समझ सकें।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए. आई. )का विकास अनेक वैज्ञानिकों के योगदान से हुआ। समय के साथ यह तकनीक मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग के रूप में विकसित होकर ऐसी स्थिति में पहुंच गई है,जहां यह डाटा, एल्गोरिदम और कंप्यूटिंग शक्ति के आधार पर स्वयं सीखकर निर्णय लेने में सक्षम हो गई है। सरल शब्दों में कहें तो ए.आई. मनुष्य के व्यवहार को समझकर कार्य करने वाली एक बुद्धिमान प्रणाली है, जो जटिल समस्याओं का समाधान तेजी और सटीकता के साथ कर सकती है।
<>आज चिकित्सा के क्षेत्र में इसके माध्यम से रोगों की पहचान अधिक सटीक हो रही है और भविष्य में संभावित बीमारियों का अनुमान भी लगाया जा रहा है, वहीं मौसम विज्ञान में यह पूर्वानुमान देने में सक्षम है कि कब और कितनी वर्षा होगी, जिससे किसान अपनी फसलों की योजना पहले से बना लेते हैं और आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रोन के माध्यम से कृषि कार्य अधिक प्रभावी हो गए हैं।
इसी प्रकार कंप्यूटर विज़न और रोबोटिक्स के माध्यम से उद्योगों में उत्पादन क्षमता बढ़ी है और एक जैसे कार्य कम समय में अधिक दक्षता से संपन्न हो रहे हैं, शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में भी ए.आई. ने जानकारी को त्वरित और संक्षिप्त रूप में उपलब्ध कराकर कार्यों को सरल बना दिया है। वित्तीय क्षेत्र में यह धोखाधड़ी की पहचान करने और बाजार के रुझानों का विश्लेषण करने में सहायक है, वहीं अंतरिक्ष विज्ञान और रक्षा क्षेत्र में भी इसकी भूमिका निरंतर बढ़ रही है, जिससे स्पष्ट है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध हो रहा है, और इसी व्यापक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए अब यह आवश्यक हो जाता है कि हम न्यायपालिका जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इसके संभावित उपयोग पर विचार करें।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी सेल्फ लर्निंग क्षमता है, किंतु इसके लिए सही और प्रमाणिक डाटा अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि त्रुटिपूर्ण डाटा से प्राप्त परिणाम भी गलत हो सकते हैं। इसके साथ ही इसके उपयोग से समय की बचत और कार्यों में सटीकता तो आती है, परंतु डाटा की गोपनीयता, रोजगार पर प्रभाव और साइबर अपराध जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं। जैसे फर्जी प्रोफाइल बनाना, छवि का दुरुपयोग करना या भ्रामक जानकारी फैलाना। इसके अतिरिक्त यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यदि ए.आई.के माध्यम से किसी व्यक्ति के बारे में आपत्तिजनक सामग्री प्रस्तुत होती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? यह भविष्य का एक गंभीर विधिक प्रश्न है। इसलिए यह आवश्यक है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग पूरी सावधानी और नैतिकता के साथ किया जाए, क्योंकि यह मानव जीवन को सरल बनाने का एक प्रभावी साधन तो है, किंतु मानव की भावनाओं और नैतिक मूल्यों का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता।
इन्हीं आधारों को ध्यान में रखते हुए हम न्यायपालिका में इसके उपयोग की संभावनाओं को समझने का प्रयास करेंगे। सर्वप्रथम कानूनी शोध के क्षेत्र में यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहा है, जहां न्यायाधीश, अधिवक्ता और शोधार्थी इसके माध्यम से त्वरित रूप से आवश्यक सामग्री प्राप्त कर रहे हैं।
पहले जहां किसी केस में लॉ (कानून )को खोजने के लिए अनेक पुस्तकों का अध्ययन करना पड़ता था, वहीं अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से वह कार्य तुरंत संभव हो गया है। इसके अतिरिक्त केस मैनेजमेंट और न्यायालयीन प्रक्रिया के प्रबंधन में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। न्यायालयों में अनुवाद और लिप्यांतरण के कार्य में भी ए.आई.सहायक बन रहा है। उच्चतम न्यायालय में इस प्रकार के प्रयोग प्रारंभ हो चुके हैं, जहां विभिन्न भाषाओं में दिए गए निर्णयों और दस्तावेजों का त्वरित अनुवाद संभव हो रहा है, जिससे कार्य की दक्षता बढ़ती है, सटीकता में सुधार होता है और त्रुटियों की पहचान करना भी सरल हो जाता है। साथ ही मैनुअल कार्य में कमी आने से समय और खर्च दोनों की बचत होती है। किन्तु इसके साथ यह संभावना भी बनी रहती है कि यदि डाटा त्रुटिपूर्ण है तो उसके आधार पर अनुचित परिणाम सामने आ सकते हैं। इसके अतिरिक्त ए.आई. आधारित निर्णयों में पारदर्शिता और स्पष्टीकरण का अभाव भी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है, तथा अत्यधिक निर्भरता से मानवीय संवेदनाओं और न्यायाधीश के अनुभव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया में केवल साक्ष्य ही नहीं बल्कि गवाह की भाव-भंगिमा, व्यवहार और आचरण भी कई बार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही यदि समस्त सूचनाएं डाटा के रूप में संरक्षित होती हैं तो गोपनीयता का जोखिम भी बना रहता है। अत: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपनाने के लिए आवश्यक सावधानियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए ए.आई.गवर्नेंस फ्रेमवर्क विकसित किया जाना चाहिए तथा न्यायालयों में इसके उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित होने चाहिए। निष्पक्षता और सटीकता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था आवश्यक है और गोपनीयता की सुरक्षा को भी सुदृढ़ किया जाना चाहिए, साथ ही कानूनी शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
भारत के संदर्भ में अभी कई चुनौतियां विद्यमान हैं, जिनमें न्यायिक प्रक्रियाओं में औपचारिक ढांचे का अभाव, अत्यधिक निर्भरता का जोखिम और ए.आई.के प्रशिक्षण की कमी प्रमुख हैं। यदि सावधानीपूर्वक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग न्यायालयीन कार्यों में किया जाए, विशेषकर उन मामलों में जो डाटा आधारित हैं, जैसे संपत्ति विवाद, मोटर दुर्घटना दावे और नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स से संबंधित प्रकरण, तो इनका त्वरित निपटारा संभव हो सकता है, जिससे न्यायालय का समय बचेगा और जटिल तथा गंभीर मामलों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा, क्योंकि वर्तमान में निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक सभी स्तरों पर लंबित प्रकरणों का दबाव बना हुआ है।
न्यायाधीशों की संख्या की अपेक्षा उनके समक्ष लंबित मामलों की संख्या अत्यधिक है और उनके त्वरित निराकरण के लिए वर्तमान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अतिरिक्त कोई प्रभावी विकल्प स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। इस संदर्भ में कुछ प्रकरण भी उल्लेखनीय हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि न्यायालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग सहायक उपकरण के रूप में प्रारंभ हो चुका है। उदाहरण स्वरूप एक मामले में, जिसमें एक कर्मचारी को सेवा से पृथक किया गया था और उसे पर्याप्त कारणों की जानकारी नहीं दी गई थी,न्यायालय ने उपलब्ध तथ्यों और तकनीकी साधनों की सहायता से मामले का परीक्षण करते हुए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी।
इसी प्रकार वर्ष 2023 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति अनूप चितकारा द्वारा निर्णय प्रक्रिया के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उपकरण का संदर्भ लिया गया, जिसने इस दिशा में एक नई संभावनाओं को संकेत दिया। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी न्यायपालिका द्वारा ए.आई. के उपयोग की दिशा में प्रयास बढ़ रहे हैं, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में कुछ प्रकरणों में ए.आई.आधारित अनुसंधान उपकरणों का उपयोग देखा गया है, वहीं यूनाइटेड किंगडम में न्यायालयों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जिससे इसके व्यवस्थित और जिम्मेदार उपयोग की रूपरेखा स्पष्ट होती है।
चीन सहित कुछ अन्य देशों में भी न्यायालयीन प्रक्रियाओं को अधिक दक्ष और त्वरित बनाने के लिए तकनीकी साधनों, विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस(ए. आई. )न्यायपालिका में निर्णय का विकल्प नहीं, बल्कि एक सहायक साधन के रूप में उभर रहा है, जो न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, त्वरित और प्रभावी बनाने में योगदान दे सकता है। मैं यह आशा और विश्वास व्यक्त करता हूं कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को और अधिक सुदृढ़, त्वरित एवं न्यायसंगत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
( उज्जैन में आयोजित तेइसवीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में 21 नवम्बर 2025 को 'ए. आई. युग में सामाजिक सरोकार एवं न्याय के उपादान' विषय पर प्रमुख वक्ता के रूप में वीडियो कॉन्फ्रेंस में लेखक द्वारा दिए गए भाषण पर आधारित आलेख)
ठ्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट


