संसदीय गतिरोध की राजनीति
सदन में किताब की जानकारी पर चर्चा नहीं हो सकती जैसा तर्क भी लचर है पर ये छोटी बातें हैं बड़ी बात सदन न चलना और संसदीय कामकाज का पटरी से उतरना है

सदन में किताब की जानकारी पर चर्चा नहीं हो सकती जैसा तर्क भी लचर है पर ये छोटी बातें हैं बड़ी बात सदन न चलना और संसदीय कामकाज का पटरी से उतरना है। सदन की कमेटियों में काम नहीं हो रहा है। बिल को चुपचाप और झटपट लाकर बहुमत के जोर से पास कराया जाता है। मात्र दो संयुक्त संसदीय समितियां काम कर रही हैं, वक्फ बिल पर बनी समिति ने विपक्ष के एक भी सुझाव को नहीं माना और सबको खारिज किया।
कहने को संसद का बजट सत्र चल रहा है लेकिन संसदीय कार्य और उसकी मंजूरी से चलने वाले जरूरी सरकारी कामकाज के हिसाब को देखा जाए तो एक बड़ा शून्य न भी दिखे लेकिन सरकार और विपक्ष ने पास नंबर भी हासिल किया हो ऐसा नहीं लगता। दूसरी ओर राष्ट्रपति का अभिभाषण और बजट पेश होने जैसी न्यूनतम जरूरी कार्रवाइयों के अलावा जितनी राजनीति हावी रही है वह दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, उसने संसदीय काम नहीं होने दिया है या जो काम हुए हैं उनकी मर्यादा को भी कम किया है। लोकसभा अध्यक्ष ने एक हास्यास्पद बहाना बनाकर प्रधानमंत्री को सदन में उपस्थित होकर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के पक्ष में बोलने से बचने की इजाजत दे दी। ऐसा मुल्क के इतिहास में ही नहीं दुनिया के इतिहास में भी शायद ही कहीं हुआ होगा कि प्रधानमंत्री विपक्षी की महिला सांसदों के संभावित हमले के अंदेशे से सदन में भाषण न दें। और फिर जब वे राज्य सभा में बोलें तो विपक्ष की महिला सांसदों का व्यवहार पूरा मर्यादित रहा। विपक्ष के नेता को बोलने से रोका गया हो लेकिन उसे तरह की 'गलतियां' करते हुए भाजपा के विवादास्पद सांसद निशिकांत दुबे को बोलने की इजाजत दे दी जाए।
जब विपक्ष के नेता को सदन में बोलने से लगातार रोका जाए और हंगामे के नाम पर सदन न चले तो कई तरह के सवाल उठेंगे ही। और हैरानी की बात नहीं है कि सरकारी पक्ष ही नहीं मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सदन न चलने के साथ सार्वजनिक धन की बर्बादी का वही पुराना राग आलाप रहा है जो जमाना पहले कहा जाता था। इसी शासक दल या मीडिया ने आजकल सरकार की तरफ से होने वाले किसी भी शाहखर्ची पर, चुनाव में भारी धन की बर्बादी या नेताओं/पैसे वालों द्वारा सामाजिक आयोजनों पर भारी खर्च पर कभी आपत्ति की होती तो उनकी विश्वसनीयता भी रही। यह सवाल उठाकर मीडिया भी सरकारी भोंपू लगती है पर असली सवाल सदन चलाने का है। और राहुल गांधी जिस बात पर आड़े हैं और और पूरे विपक्ष को एक बार और गोलबंद करने में सफल लगते हैं वह काफी हल्का है। यह सही है कि सदन में विपक्ष के नेता को बोलने की आजादी तो रहनी चाहिए और अगर अध्यक्ष और सरकारी पक्ष किसी भी कारण से उन्हें रोकता है तो गलत कर रहा है। लेकिन राहुल जो मुद्दा उठा रहे हैं क्या वह इतना बड़ा है कि सारी राजनीति उसी पर केंद्रित हो जाए। साफ लगता है कि उससे ज्यादा बड़े मुद्दे मौजूद हैं जिस पर सरकार को घेरा जा सकता था। पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब की जानकारी उनकी तुलना में छोटा मुद्दा है बल्कि राज्य सभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने ज्यादा व्यापक मुद्दे उठाकर सरकार को घेरा।
प्रदर्शन का मामला हो तो प्रधानमंत्री का राज्यसभा में दिया भाषण और भी एकतरफा और कमजोर था। वे नेहरू विरोध का एक विमर्श चला रहे हैं जिसमें 2014 से एक काल विभाजन भी दिखाते हैं। इस बार उन्होंने और नीचे स्तर पर उतर कर इस विमर्श में यह भी जोड़ा कि इस परिवार ने गांधी उपनाम चुराया। उनके इस बार के भाषण से यह भी लगा कि अब उनकी (और जाहिर तौर पर भाजपा की) रणनीति गैर-कांग्रेसवाद की जगह नेहरू-गांधी परिवार को ही निशाना बनाने की है। इससे राहुल गांधी का महत्व बढ़ रहा है या घट रहा है इस सवाल पर भी विचार किया जाना चाहिए। लोक सभा में अध्यक्ष ओम बिड़ला ने अगर भाजपा के निशिकांत दुबे को बोलने का अवसर दिया तो उन्होंने भी अनेक किताबें उद्धृत करके नेहरू को ही निशाना बनाया। अब लोक सभा तथा संसद के मंच का इस्तेमाल इस तरह के राजनैतिक एजेंडा के लिए होना कितना उचित है, इस सवाल को थोड़ी देर के लिए भूल भी जाएं तो साफ है कि यह खराब राजनीति है। राहुल द्वारा उठाया मुद्दा भी हल्का है तो प्रधानमंत्री द्वारा दिया 'जवाब' उससे भी हल्का है।
अगर राजनैतिक परिणामों की बात करें तो साफ है कि लोक सभा चलने न चलने की इस लड़ाई में पलड़ा फिलहाल विपक्ष और राहुल की तरफ झुका है। राहुल अपने साथ सारे विपक्ष को सदन से बाहर ले जाने में सफल रहे। और जब हफ्ता बीतने के बाद लोक सभा अध्यक्ष ने राहुल की जगह कांग्रेस के ही शशि थरूर को बोलने का अवसर दिया तो उन्होंने भी पहले राहुल को बुलाने की बात कहकर भाषण देने से मना कर दिया। हम जानते हैं कि इधर थरूर हर बात में कांग्रेस और राहुल को परेशान करने में ही आनंद महसूस करते थे और भाजपा का खेल खेलने के लिए जाने जाते थे। इतना ही नहीं विपक्ष लोक सभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने पर भी विचार कर रहा है। अगर मोदी जी और भाजपा सदन की अपनी लड़ाई को एक राजनैतिक रूप देने की रणनीति से चल रही है तो विपक्षी एकजुटता जैसा नतीजा सामने आना उसकी आंख खोलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। राहुल की रणनीति हल्की होगी लेकिन अगर वे बिखरे विपक्ष को साथ ले जाते हैं तो यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं होगी। हमने जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और सरकारी पक्ष की परेशानियां पहले देखी हैं।
सरकार ने भी राहुल गांधी के खिलाफ अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ने और इस किताब को वितरित करने जैसे सवालों को उठाते हुए प्राथमिकी दर्ज की है लेकिन उससे राजनैतिक लड़ाई पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। सदन में किताब की जानकारी पर चर्चा नहीं हो सकती जैसा तर्क भी लचर है पर ये छोटी बातें हैं बड़ी बात सदन न चलना और संसदीय कामकाज का पटरी से उतरना है। सदन की कमेटियों में काम नहीं हो रहा है। बिल को चुपचाप और झटपट लाकर बहुमत के जोर से पास कराया जाता है। मात्र दो संयुक्त संसदीय समितियां काम कर रही हैं, वक्फ बिल पर बनी समिति ने विपक्ष के एक भी सुझाव को नहीं माना और सबको खारिज किया। जब यही करना हो तो समिति बनाने का नाटक क्यों? उधर एक-एक दिन में जाने कितने बिल पास करने का रिकार्ड बन रहा है। विपक्ष को बोलने से रोका जा रहा है। कभी आडवाणी जैसे वरिष्ठ भाज्यपाई को ही बोलने से रोका गया और जब लोक सभा अध्यक्ष तथा राज्यसभा के सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की स्थिति हो तो निष्पक्षता किस चिड़िया का नाम है, यह सवाल उठेगा ही। सात साल से लोक सभा का उपाध्यक्ष ही नदारद है क्योंकि सदन की परंपरा के हिसाब से यह पद विपक्ष को मिलना चाहिए भाजपा पक्ष-विपक्ष दोनों कुर्सियों पर पांव फैलाए रखना चाहती है। जब इतनी सारी शिकायतें हों तो मौजूदा गतिरोध छोटी चीज है और दिखावटी भी।


