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मरूभूमि में आत्मनिर्भरता की राह

उरमूल यानी उत्तरी राजस्थान मिल्क यूनियन लिमिटेड। 90 के दशक में उरमूल का विकेन्द्रीकरण हुआ। उरमूल ट्रस्ट बना।

मरूभूमि में आत्मनिर्भरता की राह
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  • बाबा मायाराम

उरमूल यानी उत्तरी राजस्थान मिल्क यूनियन लिमिटेड। 90 के दशक में उरमूल का विकेन्द्रीकरण हुआ। उरमूल ट्रस्ट बना। उरमूल सीमांत समिति नेटवर्क संस्था है। उरमूल की और शाखाएं हैं, पर अब सभी स्वतंत्र ढंग से काम कर रही हैं। विकेन्द्रीकरण की सोच से किया। उरमूल सीमांत का केन्द्र बज्जू गांव (बीकानेर जिला) में स्थित है। इस संस्था द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा, कशीदाकारी, कढ़ाई-बुनाई और स्थायी आजीविका, टिकाऊ कृषि, किचन गार्डन जैसे कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।

पश्चिमी राजस्थान का यह इलाका थार का मरुस्थल कहलाता है। यहां की मुख्य आजीविका कृ षि और पशुपालन है। इस इलाके में मैं कई बार गया हूं, आज इस यहां की खेती,पशुपालन और आजीविका के बारे में चर्चा करना चाहूंगा, जिससे यह समझा जा सके कि कठिन परिस्थितियों में भी कैसे बेहतर जीवनयापन किया जा सकता है।

इस इलाके में उरमूल सीमांत समिति करीब चार दशक से कार्यरत है। उरमूल यानी उत्तरी राजस्थान मिल्क यूनियन लिमिटेड। 90 के दशक में उरमूल का विकेन्द्रीकरण हुआ। उरमूल ट्रस्ट बना। उरमूल सीमांत समिति नेटवर्क संस्था है। उरमूल की और शाखाएं हैं, पर अब सभी स्वतंत्र ढंग से काम कर रही हैं। विकेन्द्रीकरण की सोच से किया।

उरमूल सीमांत का केन्द्र बज्जू गांव ( बीकानेर जिला) में स्थित है। इस संस्था द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा, कशीदाकारी, कढ़ाई-बुनाई और स्थायी आजीविका, टिकाऊ कृषि, किचन गार्डन जैसे कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।

यहां जब मैं पहली बार गया था, तो यह इलाका मैदानी इलाकों से अलग लगा। मरुस्थल यानी शुष्क क्षेत्र। थार के मरुस्थल में दूर-दूर तक रेत के मैदान हैं। रेत के पहाड़ हैं, जिन्हें यहां धौरे कहा जाता है। छोटी कंटीली झाड़ियां हैं। विरल पेड़ पौधे हैं। यहां कम पानी और बहुत गरमी होती है।

यहां मैं संस्था से जुड़ी कई महिलाओं से मिला था, जो कशीदाकारी का काम करती थीं, और उन्हें घर बैठे कुछ कमाई हो जाती थी। उरमूल ने अच्छी डिजाइन से लेकर मार्केटिंग तक की कड़ी जोड़ी है, जिससे सैकड़ों महिलाओं को रोजगार उपलब्ध हुआ है। यह सिलसिला आगे बढ़ रहा है।

यहां के कार्यकर्ताओं ने बताया था कि साल 1991 के आसपास एक दूसरे क्षेत्र में कशीदाकारी का काम शुरू किया गया। उरमूल से जुड़ी प्रेरणा अग्रवाल बताती हैं कि हम कारीगरों को कपड़े देते हैं, धागा और सुई उपलब्ध कराते हैं, उनसे कशीदाकारी करवाते हैं और फिर बाजार में आपूर्ति करते हैं। महिलाओं को उनके काम का मेहनताना मिल जाता है। कशीदाकारी के काम से कई ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं। आज यह थार डेजर्ट क्राफ्ट या थार मरूज कला या थारी कशीदाकारी के नाम से देश-दुनिया में विख्यात है।

बाजार की मांग व नित बदलते फैशन के दौर में कशीदा उत्पादों में विविधता बढ़ी। पहले कच्छी भरत व सिंधी टांका ही काम में लिए जाते थे। कढ़ाई के बीच कांच लगाए जाते थे। समय के साथ इसमें बदलाव किया गया।

यहां की प्रेरणा अग्रवाल बताती हैं कि जब कुछ साल पहले कोविड के दौरान तालाबंदी हुई थी, तब होली के बाद का समय था। गांव के लोग खेती-किसानी के काम में लगे हुए थे। हमने तत्काल स्थिति की गंभीरता को समझा और ग्रामीण कार्यकर्ताओं की मदद के लिए टीम बनाई और पहल शुरू की।

वे आगे बताती हैं कि सबसे पहले हमने महिलाओं को मास्क बनाने का प्रशिक्षण दिया। बीकानेर, गंगानगर और हनुमानगढ़ जिले के गांवों में कई केन्द्र बनाए थे। बुनकरों समूहों से सूत बनवाया, और उस कपड़े से सिलाई प्रशिक्षण केन्द्रों में मास्क तैयार करवाए।

मास्क तैयार करने के लिए महिलाओं की पुरानी साड़ियों का इस्तेमाल किया। नापासर, लूनकरणसर के बुनकरों से कपड़ा खरीदा। कपड़े की डोरियां बनवाईं। इस तरह हमने ढाई-तीन लाख मास्क बनाए। उनमें कढ़ाई व कशीदाकारी भी करवाई। इससे हमारे शिल्प इकाई के कर्मचारियों की आजीविका चली। संस्था से करीब 4-5 हजार कारीगर जुड़े हैं, उन्हें लगातार रोजगार मिला, और मास्क से कोविड-19 से बचाव हुआ।

उरमूल संस्था शिल्प इकाई से जुड़ी कार्यकर्ता बताती है कि इसका अच्छा असर हुआ। साथ ही उन्हें शिल्प इकाई के माध्यम से दुपट्टे रंगाई का काम दिया गया, जिससे उनके हाथ में कुछ पैसा आए। शिल्प इकाई से जुड़ी महिलाओं ने अपने स्तर पर मास्क बनाकर बेचे। रूनिया बड़ावास गांव की गोगा जी और चाड़ासर गांव की रचना जी ने बड़े पैमाने पर मास्क बनाए और बेच कर कुछ कमाई की। गडियाला की नसीम बानो ने सूती दुपट्टों को रंगाई कर बेचा और कुछ पैसे कमाए।

इसी प्रकार, पशुपालन और कृषि यहां की प्रमुख आजीविका है। ऊंट यहां की जीवनरेखा है, किस तरह ऊंटपालकों को मदद की जाए, इसकी कोशिश की जा रही है।

डिजर्ट रिसोर्स सेंटर के अंशुल ओझा बताते हैं कि हम न केवल तत्कालीन राहत का करते हैं बल्कि दीर्घकालीन काम भी किया जा रहा है। इसमें चारागाह विकास कार्यक्रम, शिल्प इकाई, टिकाऊ कृषि, किचन गार्डन व दूध डेयरी की गतिविधियां शामिल हैं।

टिकाऊ कृ षि कार्यक्रम के तहत जैविक खेती, केंचुआ खाद, जैव कीटनाशक, राठी नस्ल की दुधारू गायों की देखभाल, पशु आहार, चारागाह विकास, बागवानी ( किचन गार्डन) आदि के प्रशिक्षण दिए जाते हैं। इसके अलावा, उरमूल परिसर में कृषि डेमो फार्म भी बनाया गया है, जिसमें केंचुआ खाद, जैव कीटनाशक, फलदार पेड़, बागवानी ( किचन गार्डन), गोबर गैस प्लांट, ड्राई सोलर यूनिट, पशु आहार, चारागाह आदि हैं, जिसे देखकर और सीखकर किसान खुद कर सकें। इससे उनकी खेती की लागत भी कम होगी और जमीन की उर्वरा शक्ति भी बनी रहेगी।

इसी प्रकार, उरमूल ने तालाबों को पुनर्जीवित करने और उनका दस्तावेजीकरण करने का अनूठा काम किया है। कुछ वर्ष पहले उन्नति संस्था के साथ मिलकर उरमूल ने तालाबों को बचाने और उनके रखरखाव का दस्तावेजीकरण व जागरूकता का कार्यक्रम चलाया था, जिसमें मैं भी शामिल हुआ था। हमने 5 जिलों के तालाबों का अवलोकन किया था। गांवों में ग्रामीणों से बातचीत की थी। तालाबों के सार-संभाल पर ग्रामीणों की परंपराओं से हम सब प्रभावित हुए थे, जिस पर मैंने कुछ लेख भी लिखे थे।

मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ था कि हमें एक भी तालाब में गंदगी नहीं मिली। साफ-सुथरे व स्वच्छ तालाब मिले थे। कई तो सैकड़ों साल पुराने तालाब हैं, ग्रामीण इन तालाबों का न केवल पानी पीते हैं, बल्कि इनकी सार-संभाल का जिम्मा खुद उठाते हैं। उन्होंने तालाबों का साफ रखने के कई अलिखित नियम भी बनाए हुए हैं। संस्था ने गांवों में टंकी निर्माण के लिए भी सहायता की है। इस काम में संस्था के सुनील लहरी ने महती भूमिका निभाई है। उन्होंने मुझे कई गांवों में भी घुमाया था, और ग्रामीणों से मिलवाया था। तालाबों के महत्व, सार संभाल, उसके भंडारण के तरीके बताए थे।

कुल मिलाकर, इस थार के मरुस्थल में उरमूल सीमांत का काम कई मायनों में अनूठा है। हस्तशिल्प कशीदाकारी के साथ टिकाऊ कृषि कार्यक्रम, जैविक खेती, बागवानी, चारागाह विकास कार्यक्रम जारी रखे गए, जिससे समुदायों को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिल सके। तालाबों को बचाने का भी महत्वपूर्ण और उपयोगी है। यह पूरी पहल उपयोगी व अनुकरणीय है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


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