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ललित सुरजन की कलम से संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की जरूरत

'एक आम धारणा बन गई है कि अगर देश में स्थितियां बिगड़ती हैं तो उन्हें न्यायपालिका का सहारा लेकर ही सुधारा जा सकता है।

ललित सुरजन की कलम से संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की जरूरत
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'एक आम धारणा बन गई है कि अगर देश में स्थितियां बिगड़ती हैं तो उन्हें न्यायपालिका का सहारा लेकर ही सुधारा जा सकता है। यह भावना इस नाते तो ठीक है कि जनतंत्र के एक आधार स्तंभ की विश्वसनीयता अब भी कायम है; लेकिन इससे यह प्रश्न भी उठता है कि सिर्फ एक खंभे के आधार पर इमारत कब तक खड़ी रह सकती है। दूसरे शब्दों में, जनता को यह विचार करना ही होगा कि अन्य दो स्तंभों की विश्वसनीयता को दुबारा कायम कैसे किया जाए!'

'यह जो स्थिति है, इसमें न्यायपालिका के प्रति ऐसी अंधश्रध्दा रखना भी शायद उचित नहीं है। कहीं हम अपनी निराशा के चलते न्यायतंत्र में जो कमजोरियां घर कर गई हैं उनकी अनदेखी तो नहीं कर रहे हैं, यह प्रश्न अपने आपसे हमें करना चाहिए। इस बारे में हाल के बरसों में जो सूचनाएं और प्रमाण मिले हैं उनका संज्ञान लेना भी उतना ही आवश्यक है, जितना विधायिका और कार्यपालिका की गड़बड़ियों के बारे में। याद करें कि 13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हमला हुआ था तब उसे सीधे-सीधे लोकतंत्र पर हमला माना गया था इसलिए कि संसद सिर्फ एक इमारत नहीं है, वह हमारी जनतांत्रिक महत्वाकांक्षा का कोरा प्रतीक भी नहीं है, बल्कि संसद ही वह मंच है जिसके माध्यम से हम अपने लिए शक्ति पाते हैं। जब हम अभिमान से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तब यह याद रखना उचित होगा कि इसका स्रोत और आधार कहां है।'

(देशबन्धु में 3 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/10/blog-post_2.html


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