मिट्टी की सेहत सुधारने की जरूरत
हमारे खेतों की मिट्टी का उपजाऊपन कम होते जा रहा है। खेती में खरपतवार रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है।

- बाबा मायाराम
मिट्टी में जैव पदार्थ और सूक्ष्म जीवाणु, मिट्टी को जीवित बनाए रखने के लिए जरूरी है। केंचुआ भूमि को भुरभुरा, पोला और हवादार बनाने में लगा रहता है। वह जमीन की एक सतह से दूसरी सतह में घूमता है जिससे जमीन हवादार बनती है। वह सदाबहार हलवाहा है। यानी वह बखरनी कर देता है। ऐसी जमीन में ही पौधों को हवा-पानी मिलता है जिससे उनमें बढ़वार होती है।
हमारे खेतों की मिट्टी का उपजाऊपन कम होते जा रहा है। खेती में खरपतवार रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है। इससे हमारी खेती का जो नुकसान पिछले कई सालों में नहीं हुआ, वह चार-पांच दशकों में हो गया। आज के कॉलम में इसी पर बात करना चाहूंगा, जिससे हम खेती को हरा-भरा और उपजाऊ बना सकें।
मेरे पिता एक छोटे किसान थे। बचपन से ही मैं उनके साथ खेत में जाता रहता था। मैंने बिना रासायनिक खेती भी देखी है, जब खेतों में केंचुआ, भौरे, तितलियां हुआ करती थीं, और रासायनिक खेती भी देखी है, जहां यह सब नहीं के बराबर हैं।
एक दिन एक पड़ोसी किसान ने मुझे बातचीत में बताया कि उनके खेत में फसल नहीं हो रही है। मैंने उनसे इसका कारण जानने की कोशिश की, तो बताया कि ज्यादा रासायनिक खाद से उसके खेती की मिट्टी का उपजाऊपन खत्म हो गया। यह स्थिति सिर्फ उसी किसान की नहीं है, कई किसान इस समस्या से जूझ रहे हैं।
मुझे लेखन के सिलसिले में देश के कई कोनों में जाने का और वहां के किसानों से मिलने और बात करने का मौका मिला है। उन्होंने मुझे बताया कि खेती की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। उन्हें धीरे-धीरे रासायनिक खाद, कीटनाशकों की मात्रा बढ़ानी पड़ती है। कई बार तो इससे भी उपज नहीं बढ़ती है।
दरअसल, मिट्टी कोई मृत वस्तु नहीं बल्कि जीवित संरचना है। इसमें प्राकृतिक रसायनों के साथ असंख्य जैव पदार्थ हैं। इसमें अनगिनत जीव-जंतु, बैक्टीरिया, फफंूद, शैवाल आदि मौजूद हैं। ये जैव पदार्थ या सूक्ष्म जीवाणु मिट्टी में ही पोषित और बढ़ते जाते हैं और सभी मिल-जुलकर अपना-अपना काम चुपचाप नि:स्वार्थ भावना से करते रहते हैं, जिससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनी रहती है। अच्छी मिट्टी बनने में कई साल का समय लगता है और उतना ही समय बंजर जमीन की जगह लेने में उसे लगता है। मिट्टी में जीवन सूक्ष्म जीवाणु प्रदान करते हैं और वे ही फसल की बढ़वार में मददगार होते हैं।
मिट्टी का जीवन उसमें प्रवाहित वायु और जैव पदार्थों की मात्रा पर ही निर्भर करता है। जैव पदार्थों की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि मिट्टी में वायु की प्रचुरता, जल ग्रहण और जल निकासी ठीक ढंग से हो। मिट्टी में मौजूद ये सूक्ष्म जीव जैव पदार्थों को गलाकर उसको पौष्टिक मृदा में परिवर्तित कर देते हैं। यह पौष्टिकता-संपन्न मृदा ही भूमि की ऊपरी सतह बनाती है और यही जमीन का सबसे उर्वर भाग होता है। कृषि में मिट्टी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कृषि इसी पर आधारित है। भूमि की उचित देखभाल न होना उत्पादकता की कमी का एक प्रमुख कारण है।
हमारे मध्यप्रदेश के नर्मदा कछार की काली कपासीय मिट्टी (ब्लैक कॉटन सॉइल) है। इसका रंग कहीं भूरा तो कहीं गहरा काला होता है। मिट्टी की रचना मटियारी है। यहां कम पानी या असिंचित अवस्था में भी अच्छी फसलें होती थी। काली मिट्टी गेहूं, चना और अन्य फसलों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। इसमें गहरी जुताई की जरूरत नहीं होती तथा जहां बिना सिंचाई की खेती होती थी। लेकिन अब इसमें काफी कमी आई है।
मिट्टी में जैव पदार्थ और सूक्ष्म जीवाणु, मिट्टी को जीवित बनाए रखने के लिए जरूरी है। केंचुआ भूमि को भुरभुरा, पोला और हवादार बनाने में लगा रहता है। वह जमीन की एक सतह से दूसरी सतह में घूमता है जिससे जमीन हवादार बनती है। वह सदाबहार हलवाहा है। यानी वह बखरनी कर देता है। ऐसी जमीन में ही पौधों को हवा-पानी मिलता है जिससे उनमें बढ़वार होती है।
इसी सिलसिले में मुझे महाराष्ट्र के प्रयोगधर्मी किसान बसंत फुटाणे की याद आ रही है। वे खुद भी प्राकृतिक खेती करते हैं, और किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। बसंत फुटाणे बताते हैं कि 'वर्ष 1983 में उन्होंने खेती की शुरूआत की।
वे आगे बताते हैं कि 'जब हमने विषमुक्त और प्रकृति के साथ बिना छेड़छाड़ वाली प्राकृतिक खेती की शुरूआत की, उस समय रासायनिक खाद की कीमतें बढ़ रही थी। विदर्भ के खेतों की मिट्टी की उर्वरता घट रही थी, भूजल का संकट गहराता जा रहा था, भोजन व पानी जहरीला हो रहा था, किसानों की स्थिति बिगड़ रही थी।'
उन्होंने बताया कि 'इस सबके मद्देनजर हमने वृक्ष खेती की शुरूआत की और मिट्टी व पानी के संरक्षण व प्रबंधन पर जोर दिया। प्राकृतिक खेती में बिना जुताई, बिना रासायनिक खाद, बिना कीट-नाशी के खेती की जाती है। मिट्टी प्रबंधन के लिए हरी खाद, जैविक पदार्थ, कंटूर बंडिंग, कंटूर बुआई, केंचुआ खाद का इस्तेमाल किया।
उन्होंने बताया कि उनके खेत में आम के 350 पेड़ हैं। इसमें कई देसी किस्में हैं, जो हमने खुद सलेक्शन पद्धति के द्वारा विकसित की हैं। जब कुछ साल पहले मैं उनके खेत देखने गया था, मैंने भी वहां के मीठे आम चखे थे। आम से बना अचार भी खाया था।
इसके अलावा, यहां संतरा के 500 पेड़ हैं। आंवला, रीठा, बेर, भिलावा, महुआ, दक्खन इमली, इमली, तेंदू, अगस्त, अमलतास, मुनगा, कचनार, चीकू, अमरूद, जामुन, सीताफल, करौंदा, पपीता, बेल, कैथ, इमली, रोहन, नींबू, नीम इत्यादि के फलदार व छायादार पेड़ हैं।
वे आगे कहते हैं कि 'मिट्टी के स्वास्थ्य से सभी सजीवों का स्वास्थ्य जुड़ा है। मिट्टी से वनस्पति तथा उससे अन्य प्राणी पोषण पाते हैं। जमीन की ऊपरी सतह ही उपजाऊ होती है। केंचुए से लेकर सभी छोटे, सूक्ष्म जीव जंतु जमीन में निवास करते हैं। जमीन का स्वास्थ्य बनाए रखने में उन भू-जीवों की विशिष्ट भूमिका होती है।Ó
इसी प्रकार, वनस्पति के अवशेष (बायोमास) भू-जीवों का भोजन है। फसल के अवशेषों को खेतों में जलाने की बजाय अगर उन्हें जमीन को खाद या आच्छादन के रूप में लौटाए जाएं तो धीरे-धीरे जमीन सुधरती जाती है। कंटूर बंडिंग से मिट्टी तथा बारिश के पानी का प्रभावी ढंग से संवर्धन किया जा सकता है। कंटूर बोआई से भूमि में नमी बनी रहती है, जिससे फसल को फायदा होता है। इसके अलावा, दलहनी फसलों को बोया- जैसे अरहर, मूंग, बरबटी, चना, मटर और मूंगफली इत्यादि। इससे खेतों को नत्रजन मिलती है, बाहरी निवेशों की जरूरत नहीं पड़ती।
वृक्षों की जल संवर्धन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। वृक्षों के कारण ही बारिश की सीधी मार जमीन पर नहीं पड़ती। कुछ बारिश की बूंदें पत्तियों पर ही ठहर जाती हैं। हवा के हल्के झोकों के साथ बूंदें धीरे-धीरे नीचे जाकर भूजल में तब्दील हो जाती हैं। वृक्षों के नीचे केंचुए सक्रिय होते हैं, वे जमीन को हवादार व पोला बनाते हैं। इस कारण वर्षा जल अधिक मात्रा में भूजल में परिवर्तित होता है। पेड़ खुद भी पानीदार होते हैं। इस तरह उन्होंने मिट्टी व पानी का प्रबंधन किया।
कु ल मिलाकर, अब हमें मिट्टी के संरक्षण और संवर्धन पर जोर देना चाहिए। टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना चाहिए। गोबर खाद, हरी खाद, कम्पोस्ट खाद, केंचुआ खाद, जीवामृत आदि से जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है। मेड़बंदी व भू तथा जल संरक्षण के उपाय करने होंगे। हमारी खेती में पशुओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसी विविधीकरण की टिकाऊ खेती में अपार संभावनाएं हैं। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


