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एलपीजी संकट पर मोदी सरकार का शुतुरमुर्गी रवैया

देश में रसोई गैस सिलेंडर को लेकर चौतरफा हाहाकार मचा हुआ है

एलपीजी संकट पर मोदी सरकार का शुतुरमुर्गी रवैया
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  • अनिल जैन

दरअसल भारत में रसोई गैस सिलेंडर की समस्या आज की नहीं है। पहले की सरकारों के समय भी यह समस्या रही है। इस समस्या की मूल वजह है सरकार के पास गैस भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होना। चूंकि गैस का भंडारण महंगा पड़ता है, इसलिए भारत ने खुद को लगातार आपूर्ति पर ही निर्भर बनाए रखा। मौजूदा सरकार ने भी गैस के भंडारण की समुचित व्यवस्था करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया।

देश में रसोई गैस सिलेंडर को लेकर चौतरफा हाहाकार मचा हुआ है। यह हाहाकार बिल्कुल वैसा ही है जैसा छह साल पहले 2020 से 2021 के दौरान कोरोना महामारी के चलते अस्पतालों में इलाज और ऑक्सीजन सिलेंडर को लेकर मचा था, जिसमें 50 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। यह हाहाकार वैसा ही है जैसा दस साल पहले नोटबंदी के समय नोट बदलवाने के लिए मचा था और 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इस समय ईरान और अमेरिका-इज़रायल युद्ध के चलते रसोई गैस सिलेंडर को लेकर भी पूरा देश हलाकान है। गैस एजेंसियों के दफ्तरों और गोदामों पर लोगों की लंबी-लंबी कतारें लगी हुई हैं। कतारों में खड़े लोगों के मरने की खबरें आ रही हैं। लोग खाली गैस सिलेंडर लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। 'आपदा में अवसर' तलाशते हुए गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी भी जोरों पर हो रही है।

इस सबके बावजूद न तो केंद्र सरकार और न ही भाजपा शासित राज्यों की सरकारें यह मान रही हैं कि देश में गैस सिलेंडरों की किल्लत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और असम में धुआंधार दौरे करते हुए चुनावी रैलियों में रसोई गैस के संकट को नकारते हुए कह रहे हैं कि 'देश में रसोई गैस सिलेंडरों की कोई कमी नहीं है।' अपनी हर गलती और असफलता के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने के अभ्यस्त मोदी इस गैस संकट से लोगों को हो रही परेशानी के लिए भी कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। वे कांग्रेस पर अफवाहें फैलाने और लोगों को डराने का आरोप लगा रहे हैं।

मज़ेदार बात यह है कि मोदी एक तरफ तो किसी तरह का संकट होने की बात से ही इनकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे यह भी कह रहे हैं कि, 'जिस तरह भारत से कोरोना महामारी के चलते पैदा हुए संकट से उबरा था, उसी तरह एलपीजी के संकट से भी उबर जाएगा।' सवाल है कि जब आप संकट मान ही नहीं रहे हैं तो फिर किस संकट से उबरने की बात कर रहे हैं? कोरोना महामारी के दौरान पूरे देश ने देखा है कि किस तरह लोग समुचित इलाज के अभाव में मर रहे थे, अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती होने वाले मरीजों की कतारें लगी हुई थीं, ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए लोग मारे-मारे घूम रहे थे, शमशान घाटों में शवों के अंबार लगे हुए थे, गंगा और यमुना नदी में लाशें तैर रही थीं, नदियों के तटों पर पड़े शवों को गिद्ध, चील-कौवे और कु त्ते नोंच रहे थे, महानगरों और बड़े शहरों में काम करने वाले प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे अपने बच्चों के साथ अपने घर-गांव लौटने के लिए सैकड़ों-हजारों किलोमीटर का पैदल सफर कर रहे थे और इस सबके बीच प्रधानमंत्री मोदी लोगों से ताली-थाली बजवा रहे थे, मोमबत्ती और दीये जलवा रहे थे। यही नहीं, इस पूरी दर्दनाक स्थिति के प्रति बेपरवाह होकर वे पश्चिम बंगाल में चुनावी रैलियां व रोड शो भी कर रहे थे और बेहद भौंडे अंदाज में 'दीदी ओ दीदी' करते हुए ममता बैनर्जी की खिल्ली उड़ा रहे थे। अभी जब देश रसोई गैस के संकट से जूझ रहा है तब भी मोदी खुद को चुनाव प्रचार में झोंके हुए हैं।

केंद्र सरकार की ओर से पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा से बीते एक सप्ताह में तीन बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करा कर यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि सब कुछ सामान्य है, देश में गैस की कोई कमी नहीं है और सरकार ने गैस उत्पादन बढ़ाने के आदेश भी दे दिए हैं। कुल मिलाकर मोदी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी शुतुरमुर्गी रवैया अपनाए हुए हैं और उनका साथ देने के लिए टीवी चैनलों के बेशर्म और उजड्ड एंकरों तथा दलाल पत्रकारों की फौज हमेशा की तरह सेवा में हाजिर है ही।

सवाल है कि जब देश में रसोई गैस की कोई कमी नहीं है और लोगों को सामान्य रूप से गैस सिलेंडरों की आपूर्ति हो रही है तो क्या लोग शौक से भीषण गर्मी में गैस एजेंसियों के दफ्तरों और गोदामों पर कतारें लगाए खड़े हैं, मार-पीट एवं धक्का-मुक्की कर रहे हैं, बेहोश हो रहे हैं और मर रहे हैं? सवाल यह भी है कि अगर सब कुछ ठीक है, गैस सिलेंडरों की कमी नहीं है और आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह से सुचारू रूप से काम कर रही है तो सुप्रीम कोर्ट की कैंटीन में मेन कोर्स का खाना बनना क्यों बंद हो गया? अयोध्या में चलने वाली राम रसोई क्यों बंद हुई, जहां 25 हजार तीर्थयात्री प्रतिदिन नि:शुल्क भोजन करते हैं? स्वयं मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी के अन्नपूर्णा मंदिर में 35 साल से तीर्थयात्रियों के लिए चल रही रसोई क्यों बंद है? भारतीय रेलवे अपनी कैटरिंग सर्विस क्यों सीमित करने की तैयारी कर रहा है? कांग्रेस मुख्यालय में कैंटीन क्यों बंद हुआ? देश भर में होटल, रेस्तरां, भोजनालय और ढाबे क्यों बंद हो रहे हैं? इन सवालों के जवाब सरकार में किसी के पास नहीं है।

दरअसल भारत में रसोई गैस सिलेंडर की समस्या आज की नहीं है। पहले की सरकारों के समय भी यह समस्या रही है। इस समस्या की मूल वजह है सरकार के पास गैस भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होना। चूंकि गैस का भंडारण महंगा पड़ता है, इसलिए भारत ने खुद को लगातार आपूर्ति पर ही निर्भर बनाए रखा। मौजूदा सरकार ने भी गैस के भंडारण की समुचित व्यवस्था करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। मोदी की सरकार ने उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त में रसोई गैस के कनेक्शन बांटने शुरू किए और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने का अभियान शुरू किया तो उसके हिसाब से एलपीजी के भंडारण की व्यवस्था भी करनी चाहिए थी और आपूर्ति श्रृंखला को बेहतर करना चाहिए था। साथ ही आयात पर निर्भरता कम करनी चाहिए थी और अपना उत्पादन बढ़ाना चाहिए था।

स्थिति यह है कि भारत 10 साल पहले अपनी जरूरत का 41 फीसदी एलपीजी आयात करता था, जो अब बढ़कर 60 फीसदी हो गया है और इसमें भी ज्यादातर का आयात उसी क्षेत्र से होता है, जिस क्षेत्र में युद्ध चल रहा है। यह वास्तविक स्थिति है तो इसे स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। सरकार को भी अंदाजा है कि पश्चिम एशिया में युद्ध लंबा खिंचा तो समस्या और बढ़ेगी। इसीलिए उस स्थिति से निबटने के मकसद से एस्मा यानी आवश्यक सेवा संरक्षण कानून लागू किया गया है। लेकिन सरकार यह स्वीकार ही नहीं कर रही है कि देश में रसोई गैस का संकट है और लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

भारत की समस्या सिर्फ युद्ध के चलते आयात प्रभावित और खाड़ी के देशों में उत्पादन कम होने से नहीं है। भारत की असली समस्या यह है कि देश में एलपीजी के भंडारण की सुविधा बहुत मामूली है। भारत में हर दिन 80 हजार टन एलजीपी की आवश्यकता है परन्तु भारत की भंडारण क्षमता सिर्फ डेढ़ लाख टन है। यानी दो दिन की जरूरत के बराबर एलपीजी का भंडारण भारत में है। भारत में सिर्फ दो ही जगह भंडारण की सुविधा है। एक मेंगलुरू में है, जो 2007 में बनी थी। दूसरी, इस सरकार के समय विशाखापत्तनम में बनी।

गौरतलब है कि इस सरकार ने एलपीजी का इस्तेमाल बढ़ने का खूब ढिंढोरा पीटा है। यह सही भी है कि इस्तेमाल बढ़ा है। 2014 में जितने लोग एलपीजी का इस्तेमाल करते थे उससे दोगुने से ज्यादा अभी इस्तेमाल करते हैं लेकिन भंडारण की सुविधा सिर्फ एक विशाखापत्तनम में बनी, जिसकी क्षमता 80 हजार टन की है। यही समस्या है कि भारत अपनी आवश्यकता का सिर्फ 40 फीसदी एलपीजी उत्पादन करता है और बाहर से जो आयात होकर आता है उसके भंडारण की भी व्यवस्था भारत में नहीं है। इसीलिए आशंका जताई जा रही है कि अगर युद्ध लंबा खींचता है तो भारत को और गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है। दुर्भाग्य से सरकार के पास न तो जवाब है और न ही इस संकट का हल व ज़रूरी तैयारी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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