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मिडिल ईस्ट युद्ध ने ट्रम्प की मुश्किलों को बढ़ाया

युद्ध के मामले में अमेरिका-इजरायल की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।

मिडिल ईस्ट युद्ध ने ट्रम्प की मुश्किलों को बढ़ाया
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— राजेश पांडेय

युद्ध के मामले में अमेरिका-इजरायल की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। इजरायल क्षेत्रीय ताकत है। वह मिडिल ईस्ट में अपने सामने किसी तरह की बड़ी चुनौती नहीं चाहता है। उसका लक्ष्य सीमित है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका को वैश्विक महाशक्ति होने के नाते पूरी दुनिया की स्थिति को ध्यान में रखकर फैसले करने पड़ते हैं। लेकिन, ईरान के मामले में वह दिशाहीनता शिकार है।

मिडिल ईस्ट युद्ध की लपटें अब दुनिया को झुलसाने लगी हैं। तेल, गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है। युद्ध लंबे समय तक चला तो ग्लोबल अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। हालांकि, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पांच दिन के युद्धविराम की पेशकश ने उम्मीदें जगाई हैं। जाहिर है, ट्रम्प अनिश्चय की स्थिति में हैं। युद्ध की दिशा उनके अनुमान के मुताबिक नहीं रही है। यही स्थिति इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की है। ट्रम्प-नेतन्याहू ने सोचा था कि उनके सामने इजरायल जल्द पस्त हो जाएगा। लेकिन 26 मार्च तक तो ऐेसा नहीं हुआ था। अमेरिका के शांति प्रस्तावों पर ईरान ने कड़ा रुख अपनाया है। भारी तबाही के बावजूद वह अपने कुछ मुद्दों पर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है।

मौजूदा युद्ध के उद्देश्यों पर हमेशा सवाल उठेंगे। हानि-लाभ का हिसाब लगाया जाएगा। पूछा जाएगा कि चीन, रूस और भारत जैसे देशों की भूमिका क्या रही? नेतन्याहू के बहकावे पर युद्ध में कूदे ट्रम्प के सामने तो कोई स्पष्ट लक्ष्य तक नहीं है। वैसे, अमेरिका की हथियार लॉबी का धंधा जोर पकड़ चुका है। अमेरिका को अब तक इजरायल और खाड़ी देशों से करोड़ों रुपए के हथियारों की सप्लाई के ऑर्डर मिले हैं। लेकिन कुछ वास्तविकताएं ट्रम्प की मुश्किलों को सामने रखती हैं। ट्रम्प बिजनेसमैन हैं। वे राजनीति को नफा-नुकसान के नजरिये से देखते हैं। लिहाजा, तेल, गैस की सप्लाई में रुकावट से बिजनेस पर पड़ने वाला असर उनके लिए चिंता पैदा कर रहा है।

युद्ध से ट्रम्प और अमेरिका की राजनीतिक स्थिति प्रभावित होगी। वे जब से दोबारा राष्ट्रपति बने हैं, कई जगह अमेरिकी ताकत का दुरुपयोग कर चुके हैं। उन्होंने वेनेजुएला के तानाशाह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का रातों-रात अपहरण कर लिया था। ट्रम्प नोबल शांति पुरस्कार पाने की लालसा रखते हैं लेकिन उन्होंने ईरान के बहुत बड़े हिस्से को उजाड़ डाला है। वहां वियतनाम और गाजा पट्टी जैसी सघन बमबारी हुई है। स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, पुलों और रिहायशी इलाकों को तहस-नहस करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई है।

ईरान के डटे रहने से ट्रम्प के राजनीतिक प्रभाव में सेंध लग रही है। उनकी दुनिया को दबाने की ताकत क्षीण होगी। चीन, रूस जैसे देशों के सामने असहाय महसूस करने वाले देश सोच सकते हैं कि जब ट्रम्प ईरान जैसे देश को नहीं झुका पाए तो वे इन देशों का क्या कर लेंगे? ट्रम्प यदि जीतते नहीं हैं तो अमेरिकी में उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर होगी। अमेरिका तेल, गैस का निर्यातक है। फिर भी, वहां गैस के मूल्य बढ़ रहे हैं। अक्सर जनमत के निर्धारण में महंगाई की अहम भूमिका होती है। इसलिए अनुमान लगाए जा रहे हैं कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी संसद के मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति की रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान हो सकता है।

लगता है, स्थिति संभालने के लिए ट्रम्प ने पहले 48 घंटे और फिर पांच दिन के युद्धविराम का पांसा फेंका है।

वे किसी समझौते की स्थिति में विजेता बनकर उभरने की कोशिश करेंगे। ट्रम्प भ्रम के अंधेरे में भटक रहे हैं तो नेतन्याहू का एजेंडा एकदम साफ है। उनका राजनीतिक कॅरियर दुस्साहस, जोखिम और निर्ममता का पर्याय है। 2023 के बाद गाजा में हजारों बेकसूर फिलिस्तीनियों की हत्या ने उनका हौसला बढ़ाया है। ईरान पर हमले के लिए उन्हें देश की जनता के बड़े हिस्से का समर्थन भी है। इजरायलियों के बीच धारणा है कि उनके देश के अस्तित्व को ईरान से सबसे ज्यादा खतरा है। नेतन्याहू गाजा में जनसंहार के बाद भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। राष्ट्रपति उन पर भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमा चलाने की अनुमति दे चुके हैं। इजरायल में इस साल चुनाव हैं। इस वक्त नेतन्याहू की सरकार कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों को समर्थन से चल रही है। लिहाजा, वे ईरान युद्ध से चुनाव में अपनी पार्टी के स्पष्ट बहुमत हासिल करने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। नेतन्याहू को भरोसा था कि हमले के बाद ईरान की जनता वर्तमान सरकार के खिलाफ बगावत कर देगी। दरअसल, ईरान में कट्टरपंथी धार्मिक नेतृत्व के खिलाफ जनता खासकर युवाओं ने लंबा आंदोलन छेड़ा था। खामेनेई सरकार ने आंदोलन का बेहद क्रूरता से दमन किया था। इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान में बगावत भड़काने की काफी कोशिश की लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पाई। बाहरी आक्रमण देश में एकजुटता पैदा करता है। लोगों में देशभक्ति की भावना जोर पकड़ती है। ईरान में ऐसा ही हुआ है।

युद्ध के मामले में अमेरिका-इजरायल की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। इजरायल क्षेत्रीय ताकत है। वह मिडिल ईस्ट में अपने सामने किसी तरह की बड़ी चुनौती नहीं चाहता है। उसका लक्ष्य सीमित है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका को वैश्विक महाशक्ति होने के नाते पूरी दुनिया की स्थिति को ध्यान में रखकर फैसले करने पड़ते हैं। लेकिन, ईरान के मामले में वह दिशाहीनता शिकार है। ट्रम्प के अप्रत्याशित व्यवहार के बावजूद भारत, रूस, चीन का रुख निर्णायक नहीं रहा है। ये तीनों देश चाहते तो अमेरिका, इजरायल पर दबाव डाल सकते थे।

भारत का कमजोर रुख: अमेरिका, इजराइल हमले के खिलाफ भारत की प्रतिक्रिया बेहद सतर्कता भरी रही है। ऐसा लगता है,वह किसी दबाव में है। विदेश नीति में पहले जैसी स्पष्टता, दूरदर्शिता का अभाव है। 140 करोड़ की आबादी का भारत आज पहले के मुकाबले आर्थिक और सैनिक रूप से बहुत मजबूत है। लेकिन उसका प्रभाव बहुत क्षीण है। उसके रुख में स्पष्टता और प्रखरता की कमी है। वह अमेरिका, इजरायल के पीछे खड़ा है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के समय वैश्विक मंच पर भारत की आवाज को अहमियत मिलती थी। भारत ने कई मौकों पर देशों की संप्रभुता का उल्लंघन होने पर कड़ा विरोध जताया है। उसने एशिया, अफ्रीका में साम्राज्यवाद के खिलाफ असरदार मुहिम चलाई थी। वह कमजोर देशों का सहारा था। कई मौकों पर अंतरराष्ट्रीय विवादों में भारत ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी। भारत की पहचान नैतिकता, सिद्धांतों और इंसाफ का साथ देने वाले देश की थी। जिन नेताओं और उनके समर्थकों ने भारत को विश्वगुरू और विश्वमित्र के खिताब से विभूषित कर रखा था, उनकी आवाज न जाने कहां गुम हो गई है।

ईरान युद्ध से दुनिया को काफी नुकसान हो चुका है। भावी विध्वंस को लेकर प्रभावशाली देश चिंतित नहीं हैं। लगता है, बड़े देशों के बीच अघोषित समझौता हो चुका है कि वे कुछ भी करें, दुनिया को अपने डंडे के बल पर कैसे भी हांकें, दूसरा कुछ नहीं बोलेगा। यूक्रेन पर रूसी हमले के चार साल बीत चुके हैं। चीन ने मध्यस्थता करने की बजाय रूस का साथ दिया है। अमेरिका और यूरोपीय देश देर से यूक्रेन की मदद के लिए आगे आए हैं। यूरोपीय देश चाहते तो अपनी सामूहिक ताकत के बूते रूस को सबक सिखा सकते थे। लेकिन, उन्होंने तत्काल निर्णायक कदम नहीं उठाए। इसलिए विशेषज्ञों को लगता है कि यूक्रेन, गाजा और ईरान युद्ध के समान ताइवान पर चीनी हमले के समय भी बड़े देश चुप बैठ सकते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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