इंडिया गठबंधन की बैठक का संदेश- 'हम नहीं सुधरेंगे'
लोकसभा में संख्याबल के लिहाज से जितना मजबूत विपक्ष इस समय है, उतना पहले कभी नहीं रहा,

- अनिल जैन
उम्मीद की जा रही थी कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर महीनों तक चली बहस और सुनवाई के बाद चुनाव आयोग के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एकतरफा फैसले और पश्चिम बंगाल व असम में चुनाव आयोग की पक्षपाती भूमिका स्पष्ट रूप से देख लेने के बाद विपक्षी दल इस बैठक में इंडिया गठबंधन को व्यावहारिक आकार देंगे।
लोकसभा में संख्याबल के लिहाज से जितना मजबूत विपक्ष इस समय है, उतना पहले कभी नहीं रहा, लेकिन इसी के साथ हकीकत यह भी है कि विपक्ष जितना दिशाहीन और निस्तेज आज है, उतना पहले कभी नहीं रहा। यही वजह है कि सरकार अल्प बहुमत में होने के बाद भी जो चाहती है, वह कर गुजरती है और विपक्ष देखता रह जाता है। विपक्षी एकता का प्रदर्शन कभी-कभार संसद में तो दिख जाता है परन्तु सरकार के खिलाफ जनहित के मुद्दों पर वह एकता आंदोलनात्मक कार्रवाई के रूप में सड़कों पर कभी दिखाई नहीं देती है। विपक्ष की यह दिशाहीनता और उदासीनता सोमवार को उसके इंडिया गठबंधन की बैठक में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाले कानून और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर दो महीने पहले सरकार और भारतीय जनता पार्टी को करारी शिकस्त देने के बाद हुई विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की बहुप्रतीक्षित बैठक काफी अहम मानी जा रही थी। उम्मीद की जा रही थी कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर महीनों तक चली बहस और सुनवाई के बाद चुनाव आयोग के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एकतरफा फैसले और पश्चिम बंगाल व असम में चुनाव आयोग की पक्षपाती भूमिका स्पष्ट रूप से देख लेने के बाद विपक्षी दल इस बैठक में इंडिया गठबंधन को व्यावहारिक आकार देंगे और सरकार को घेरने की कोई ठोस रणनीति व कार्यक्रम बनाएंगे। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
करीब ढाई घंटे तक चली बैठक में 25 दलों के नेताओं ने भाग लिया। ये 25 दल संसद में देश की लगभग 65 फीसदी जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और जिन्हें यह भी अच्छी तरह से अहसास होगा ही कि पेट्रोल-डीजल व रसोई गैस के लगातार बढ़ते दामों और सरकार की अन्य जनविरोधी नीतियों व फैसलों के चलते जनता इस समय किन मुश्किलों का सामना कर रही है। बैठक में इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ किसी साझा आंदोलन का फैसला करने के बजाय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मांग की गई कि वह आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाए।
प्रधानमंत्री से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग अपने आप में हास्यास्पद तो है ही, यह उसकी नासमझी भी है। सोचने वाली बात है कि विपक्ष उस प्रधानमंत्री से आर्थिक संकट पर सर्वदलीय बैठक बुलाने को कह रहा है, जिसने अमेरिकी दबाव में आकर दिशाहीन फैसले लेते हुए देश के समक्ष इस संकट को न्योता दिया है, जो अपने अहंकार के चलते विपक्ष के किसी सवाल का जवाब तक देना उचित नहीं समझता है और जो कभी सर्वदलीय बैठक में भी शामिल नहीं होता। सवाल है कि ऐसे प्रधानमंत्री के सामने यह मांग रख कर विपक्ष क्या हासिल करना चाहता है?
विपक्षी नेताओं की बैठक में चुनावी धांधली और एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की मनमानी पर भी चिंता जताई गई पर इस सवाल पर भी किसी साझा आंदोलन की योजना की बनाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को पत्र लिखने का फैसला किया गया, जो कि किसी मजाक से कम नहीं है। सवाल है कि जिस प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने महीनों तक चली बहस और सुनवाई के बाद भी चुनाव आयोग की मनमानी के खिलाफ एक नहीं सुनी, जो चीफ जस्टिस देश के बेरोजगार नौजवानों को कॉकरोच बता कर लंदन में गरमी की छुट्टियां मनाते हुए बेडमिंटन खेल रहे हैं, उन्हें अब आप पत्र में ऐसा क्या लिख देंगे जिससे उसकी अंतरात्मा जाग जाएगी और अपने संवैधानिक कर्तव्य याद आ जाएंगे?
नीट और सीबीएसई की परीक्षाओं में हुई गंभीर गड़बड़ियों को लेकर विपक्षी नेताओं ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की है, लेकिन इसके लिए कोई अल्टीमेटम नहीं दिया गया है। मानो विपक्ष के मांग करने भर से शिक्षा मंत्री इस्तीफा दे देंगे या मोदी उनसे इस्तीफा मांग लेंगे। विपक्ष से ज्यादा सटीक ढंग से तो यह मांग कॉकरोच जनता पार्टी के नाम पर जंतर-मंतर पर जुटे युवाओं ने सरकार से की है और इसके लिए एक हफ्ते का अल्टीमेटम दिया है। बहरहाल सवाल यह भी है कि अगर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो भी गया तो उससे क्या होगा? उनकी जगह किसी अन्य 'धर्मेंद्र प्रधान' को शिक्षा मंत्री बना दिया जाएगा।
द्रविड़ मुनैत्र कड़गम यानी डीएमके इंडिया गठबंधन का महत्वपूर्ण घटक रहा है, लेकिन उसने कांग्रेस से अपनी नाराजगी के चलते गठबंधन से नाता तोड़ लिया है। यही नहीं, उसने लोकसभा में कांग्रेस के साथ बैठने से इनकार करते हुए अपने 22 सदस्यों के बैठने के लिए अलग व्यवस्था करने का अनुरोध भी स्पीकर से किया है। इंडिया गठबंधन की बैठक में डीएमके को मनाने और उसे फिर से साथ में लाने पर चर्चा होनी चाहिए थी लेकिन नहीं हुई।
इंडिया गठबंधन की बैठक से पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने भी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को एक पत्र लिख कर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं द्वारा केरल में चुनाव प्रचार के दौरान लगाए गए सीपीएम और भाजपा के बीच सौदेबाजी के आरोप और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर सख्त आपत्ति और नाराजगी जताई। सीपीएम महासचिव ने अपने पत्र में कहा कि उनकी पार्टी ऐसे बेबुनियाद आरोपों को हल्के में नहीं ले सकती क्योंकि यह भाजपा के खिलाफ़ बनी विपक्षी एकता की बुनियाद पर हमला है। यह बात इंडिया गठबंधन की बैठक में सीपीएम के नेता जॉन ब्रिटास ने भी उठाई, जिस पर राहुल गांधी ने बेहद चलताऊ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि राज्यों में चुनाव के दौरान स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों और पार्टी इकाइयों के सुझावों को भी ध्यान में रखना होता है।
इंडिया गठबंधन को अस्तित्व में आए तीन साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक गठबंधन का कोई संगठनात्मक ढांचा नहीं बन पाया है। न तो उसका कोई अध्यक्ष या संयोजक चुना जा सका है और न ही कोई संचालन या समन्वय समिति गठित हो सकी है। गठबंधन का कोई सचिवालय और उसके प्रवक्ताओं का पैनल भी आज तक नहीं बन पाया है। चूंकि पिछले तीन सालों के दौरान गठबंधन में शामिल सभी पार्टियां ठोकर खा चुकी हैं, इसलिए इस बार उम्मीद की जा रही थी कि गठबंधन के नेता जब बैठेंगे तो इन सभी मसलों पर कोई ठोस निर्णय लेंगे। कांग्रेस गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए ऐसे मसलों पर पहल की उम्मीद उससे ही की जाती है, लेकिन इस बैठक में न तो कांग्रेस ने और न ही बाकी दलों ने इस बारे में कोई बात की।
अलबत्ता बैठक में यह जरूर तय हुआ कि अब से हर दो महीने में गठबंधन में शामिल दलों की बैठक हुआ करेगी और अगली बैठक आगामी अगस्त महीने में हैदराबाद में होगी। इसके अलावा संसद के मानसून सत्र के दौरान संसदीय समन्वय भी जारी रहेगा और हर सुबह नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय में समन्वय बैठक होगी। लेकिन सवाल है कि इन सब बातों के ढाई घंटे तक बैठक करने की क्या जरूरत थी। यह सब बातें तो फोन पर चर्चा के जरिये भी तय हो सकती थीं। दो साल तक कई ठोकरें खाने के बाद गठबंधन की बैठक करने की जरूरत महसूस हुई, बैठक हुई लेकिन नतीजा आया- 'खोदा पहाड़, निकली मरी हुई चुहिया।'
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


