मक्का समझौता : बदलता शक्ति-संतुलन और भारत की चुनौती
नई परिस्थितियों में भारत को यही बढ़त बनाए रखनी होगी—शोर से नहीं, शक्ति और रणनीति से।

- मिर्ज़ा ज़ाहिद बेग़
नई परिस्थितियों में भारत को यही बढ़त बनाए रखनी होगी—शोर से नहीं, शक्ति और रणनीति से। उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि हम इस नए गठबंधन से उपजी नई सामरिक और आर्थिक चुनौतियां का सामना करने के लिए देश में अमन और प्रेम को बनाएं रखें, फसादी फिरकापरस्त ताकतों का समूल उन्मूलन करें ताकि भविष्य की आवश्यकताओं के मद्देनज़र दूरदर्शी निर्णय लिए जा सकें।
मक्का में 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ 'संयुक्त रक्षा समझौता' महज तीन देशों के बीच सैन्य सहयोग का ही दस्तावेज नहीं है बल्कि पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण और मध्य एशिया तक उभरती नई सामरिक तस्वीर का संकेत भी है। समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। यह व्यवस्था गत वर्ष 17 सितंबर 2025 के पाकिस्तान-सऊदी स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट को एक नए, त्रिपक्षीय आयाम में ले जाती है।
इस गठजोड़ की असली ताकत तीनों देशों की अलग-अलग क्षमताओं के मेल में है। सऊदी अरब के पास अपार आर्थिक संसाधन और ऊर्जा-सम्पदा है। विश्व बैंक के अनुसार 2025 में उसकी नॉमिनल जीडीपी करीब 1.28 ट्रिलियन डॉलर रही। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उसकी सैन्य क्षमता में निवेश की क्षमता। एसआईपीआरआई के अनुसार 2025 में सऊदी अरब ने रक्षा पर लगभग 83.2 अरब डॉलर खर्च किए और वह दुनिया का आठवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश रहा।
तुर्किये इस गठजोड़ को सैन्य तकनीक, रक्षा उद्योग और युद्ध-अनुभव देता है। 2025 में उसका सैन्य व्यय करीब 30 अरब डॉलर था। ड्रोन, मिसाइल, बख्तरबंद वाहन, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और स्वदेशी रक्षा उत्पादन में तुर्किये ने उल्लेखनीय क्षमता विकसित की है। उसका मध्य एशिया में बढ़ता राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव भी इस समीकरण को केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहने देता। तुर्किये लंबे समय से तुर्क भाषी मध्य एशियाई देशों के साथ परिवहन और व्यापार गलियारों के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।
तीसरा और सबसे संवेदनशील स्तंभ पाकिस्तान है। पाकिस्तान की आर्थिक क्षमता सऊदी अरब और तुर्किये की तुलना में बहुत छोटी है—2025 में उसका सैन्य खर्च लगभग 11.9 अरब डॉलर था—लेकिन उसके पास परमाणु हथियार और बड़ा, युद्ध-अनुभवी सैन्य ढांचा है। स्वतंत्र विशेषज्ञ आकलन पाकिस्तान के परमाणु भंडार को लगभग 170 वारहेड मानते हैं।
यानी समीकरण मोटे तौर पर ऐसा है—सऊदी अरब-पैसा और ऊर्जा, तुर्किये-रक्षा तकनीक और सैन्य औद्योगिक क्षमता, जबकि पाकिस्तान-परमाणु क्षमता और सैनिक अनुभव। यही इस गठजोड़ को साधारण द्विपक्षीय समझौते से अलग बनाता है।
लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ा प्रश्न है—इसका असर कितना गंभीर है?
भारत के लिए यह समझौता कोई ख़ास चिंताजनक नहीं है, पर इसे हल्के में लेना भी भूल होगी। पाकिस्तान के साथ भारत का संघर्ष केवल सीमित सैन्य विवाद नहीं है। आतंकवाद, सीमा-पार घुसपैठ और कश्मीर सहित अनेक मुद्दों पर दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक तनाव है। ऐसे में यदि पाकिस्तान को सऊदी वित्तीय समर्थन, तुर्की की उन्नत रक्षा तकनीक और एक औपचारिक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था मिलती है तो इस्लामाबाद की सामरिक स्थिति निश्चित रूप से मजबूत हो सकती है।
विशेष चिंता इस बात की है कि तुर्किये का जुड़ना पाकिस्तान को केवल पश्चिम एशिया की राजनीतिक छतरी नहीं देता, बल्कि भूमध्यसागर, काकेशस और मध्य एशिया तक फैले एक व्यापक नेटवर्क से जोड़ता है। भविष्य में रक्षा उत्पादन, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, खुफिया साझेदारी और सैन्य प्रशिक्षण में सहयोग बढ़ा तो इसका प्रभाव दक्षिण एशिया तक पहुंच सकता है।
फिर भी इस गठजोड़ को तत्काल 'इस्लामिक एनएटीओ' मान लेना अतिशयोक्ति होगी। समझौते में सामूहिक रक्षा की राजनीतिक प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण है, लेकिन वास्तविक युद्ध की स्थिति में प्रत्येक देश किस स्तर तक सैन्य हस्तक्षेप करेगा, इसकी विस्तृत व्यावहारिक शर्तें अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं। विशेषज्ञ संस्था आईआईएसएस ने भी पाकिस्तान-सऊदी समझौते के विवरण को अस्पष्ट बताते हुए उसके व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव की संभावना पर जोर दिया था।
भारत की रणनीति इसलिए प्रतिक्रिया-प्रधान नहीं, बल्कि बहुस्तरीय और दीर्घकालिक होनी चाहिए।
पहला, सऊदी अरब से भारत के गहरे आर्थिक और ऊर्जा संबंधों को और मजबूत करना होगा। भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पाकिस्तान के साथ सऊदी रणनीतिक संबंध भारत-सऊदी साझेदारी की कीमत पर न बढ़ें।
दूसरा, तुर्किये के साथ संवाद के रास्ते खुले रखने चाहिए। मतभेदों के बावजूद अंकारा को पूरी तरह पाकिस्तान के खेमे में धकेल देना भारत के हित में नहीं होगा। व्यापार, निवेश और बहुपक्षीय मंचों पर संवाद जारी रखना आवश्यक है।
तीसरा, मध्य एशिया में भारत को अपनी उपस्थिति कहीं अधिक मजबूत करनी होगी। कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ संपर्क, ऊर्जा, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और व्यापारिक संबंधों को प्राथमिकता देनी होगी। चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भारत के लिए केवल व्यापारिक परियोजनाएं नहीं, बल्कि सामरिक संपर्क के साधन भी हैं।
चौथा, भारत को अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता और समुद्री शक्ति पर और तेजी से काम करना होगा। एसआईपीआरआई के अनुसार 2025 में भारत का सैन्य व्यय 92.1 अरब डॉलर था—सऊदी, तुर्किये और पाकिस्तान के संयुक्त खर्च से अधिक। इसलिए चुनौती संसाधनों की कमी की नहीं, बल्कि संसाधनों के अधिक प्रभावी और तकनीकी उपयोग की है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि भारत को इस नए गठजोड़ को किसी धार्मिक धु्रवीकरण के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु से अधिक स्थायी होते हैं—राष्ट्रीय हित।
मक्का समझौता यदि नई सामरिक धुरी का आरंभ है तो भारत के लिए उसका उत्तर किसी जल्दबाजी या उत्तेजना में नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता, कूटनीतिक पहुंच और क्षेत्रीय साझेदारियों को एक साथ मजबूत करने में है। भारत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह आज केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और हिंद-प्रशांत—तीनों को जोड़ने वाली एक उभरती वैश्विक शक्ति है।
नई परिस्थितियों में भारत को यही बढ़त बनाए रखनी होगी—शोर से नहीं, शक्ति और रणनीति से। उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि हम इस नए गठबंधन से उपजी नई सामरिक और आर्थिक चुनौतियां का सामना करने के लिए देश में अमन और प्रेम को बनाएं रखें, फसादी फिरकापरस्त ताकतों का समूल उन्मूलन करें ताकि भविष्य की आवश्यकताओं के मद्देनज़र दूरदर्शी निर्णय लिए जा सकें।


