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बहू-मां की जीवन-गाथा

भारतीय राजनीति में सोनिया गांधी का जीवन हमेशा ही चर्चा का विषय रहा है।

बहू-मां की जीवन-गाथा
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प्रेम करना और प्रेम निभाना किसे कहा जाता है, सोनिया गांधी ने इसकी अद्भुत मिसाल पेश की है। उनके जीवन को राजनीति का चश्मा हटाकर अगर देखें तो इसमें नजर आएगा कि कैसे उन्होंने अपने प्रेम को निभाने के लिए हमेशा बलिदान दिया। वे न केवल भारत की बहू बनीं, बल्कि यहां का हिस्सा बनने के लिए उन्होंने हिंदी सीखी, खान-पान, रीति-रिवाजों को अपनाया।

भारतीय राजनीति में सोनिया गांधी का जीवन हमेशा ही चर्चा का विषय रहा है। उनके समर्थक और उनके विरोधी दोनों ही इस बात को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि सोनिया गांधी के निजी जीवन में क्या कुछ चल रहा है। इटली में जन्म लेने वाली सोनिया गांधी की राजीव गांधी से मुलाकात ब्रिटेन के केम्ब्रिज में हुई और उसके बाद उनका जीवन साधारण लड़कियों की तरह बिल्कुल नहीं रहा, क्योंकि वे एक असाधारण परिवार का हिस्सा बन गईं और फिर उनका पूरा जीवन असाधारण घटनाओं का गवाह बन गया। अपने जीवन के इन्हीं तमाम उतार-चढ़ावों को सोनिया गांधी अब अपनी किताब में उतार चुकी है। सोनिया गांधी के संस्मरणों पर लिखी गई किताब 'Belonging: A Journey of Love' 10 नवंबर को उपलब्ध होगी। अमेरिकी प्रकाशक अल्फ्रेड ए नॉफ ने मंगलवार को इसकी घोषणा की और इसका कवर पेज भी साझा किया। प्रकाशक ने लिखा 'Belonging' असल में एक हिम्मत वाली महिला की कहानी है, जिसने अपनी ज़िंदगी को नए सिरे से बनाने और देश की सेवा करने की हिम्मत जुटाई। यह 10 नवंबर को बिक्री के लिए उपलब्ध होगी। इस किताब का शीर्षक और मुखपृष्ठ दोनों ही अनूठे हैं।

मुखपृष्ठ पर सोनिया गांधी की युवा दिनों की तस्वीर हैं, यानी जिस तरह वे राजीव गांधी से मुलाकात के वक्त दिखती रही होंगी। जबकि अभी सोनिया गांधी का नाम लेते ही करीने से पहनी हुई सूती साड़ी वाली उनकी छवि उभर कर आती है। सोनिया गांधी पर कम से कम एक दर्जन किताबें लिखी जा चुकी हैं, लेकिन किसी के कवर पेज पर ऐसी तस्वीर देखने नहीं मिली। इस तस्वीर के मायने यही हैं कि जर्नी ऑफ लव यानी प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए उनका जीवन जिस रूप में ढला, वो इस किताब में पढ़ने मिलेगा। लेकिन इस जर्नी ऑफ लव से पहले एक और शब्द लिखा हुआ है- बिलॉन्गिंग।

अंग्रेजी के बिलॉन्गिंग शब्द का हिन्दी में अर्थ है अपनापन, भावनात्मक जुड़ाव या फिर किसी चीज पर अपना हक। बोलचाल में पूछा जाता है आप कहां से बिलॉन्ग करते हैं, यानी आप कहां से आते हैं, आपकी जड़ें कहां हैं। सोनिया गांधी के संदर्भ में यह सवाल सियासी तौर पर कितना जटिल और विवादास्पद बनाया गया है, यह बताने की जरूरत नहीं है।

सब जानते हैं कि उनका जन्म इटली में हुआ, इसी पर उन्हें अनगिनत बार अपमानजनक तरीके से विदेशी कहा गया। भारतीय संस्कृति की ओट लेकर ऐसा कहने वाले भूल गए कि सोनिया गांधी ने भारतीय मूल के राजीव गांधी से शादी कर भारत को ही अपना घर बना लिया, क्योंकि भारतीय परंपरा आमतौर पर यही चली आई है कि विवाह के बाद पति का घर ही लड़की का घर कहलाता है। इसके बाद बहू यदा-कदा अपने मायके जाती है, वहां बसती नहीं है। सोनिया गांधी ने भी विवाह के बाद कभी इटली बसने की बात नहीं कही। जब राजीव गांधी जिंदा थे, राजनीति से दूर थे और कमर्शियल पायलट की नौकरी कर रहे थे, तब भी सोनिया गांधी भारत में रहीं। राजीव गांधी की हत्या के बाद जब उनके बच्चों पर भी बड़ा खतरा था, उस समय भी सोनिया गांधी ने इस देश को नहीं छोड़ा। तो सोनिया गांधी कहां से बिलॉन्ग करती हैं, इसका जवाब उन्होंने बखूबी दे दिया है। इसके बावजूद उन्हें जितनी बार, जितने तरीकों से अपमानित किया गया, उन पर कई किस्म के लांछन लगाए गए, मगर उन्होंने न इस देश के लोगों के लिए अपनेपन की भावना को भुलाया, न कभी निचले स्तर पर उतरकर जवाब दिया। क्योंकि सोनिया गांधी का स्तर हमेशा आदर्श बना रहा, जिसमें ओछेपन की जगह न थी, न है।

प्रेम करना और प्रेम निभाना किसे कहा जाता है, सोनिया गांधी ने इसकी अद्भुत मिसाल पेश की है। उनके जीवन को राजनीति का चश्मा हटाकर अगर देखें तो इसमें नजर आएगा कि कैसे उन्होंने अपने प्रेम को निभाने के लिए हमेशा बलिदान दिया। वे न केवल भारत की बहू बनीं, बल्कि यहां का हिस्सा बनने के लिए उन्होंने हिंदी सीखी, खान-पान, रीति-रिवाजों को अपनाया। जिस वक्त महिलाओं के लिए पर्दा जरूरी नहीं था, उस समय भी सिर पर आंचल रखकर उन्होंने सहजता से पारिवारिक-सामाजिक संबंधों को निभाया। इन दिनों भारतीय समाज में प्रेम से लेकर विवाह संबंधों तक कई किस्म की खबरें सुनने-पढ़ने मिल रही हैं। अपने जीवनसाथी, प्रेमी या प्रेमिका का नृशंस तरीके से कत्ल करने की कई घटनाएं सामने आई हैं। इन्हें देख-पढ़ कर बहुत से लोगों का विश्वास ही प्रेम और विवाह से उठता जा रहा है। लोग स्वार्थ के लिए किसी के साथ हो रहे हैं या अलग हो रहे हैं। निस्वार्थ प्रेम कई बार बेवकूफी की श्रेणी में रख दिया जाता है। ऐसे में सोनिया गांधी ने प्रेम की अपनी यात्रा का जो वर्णन किया होगा, उसे पढ़ना दिलचस्प होगा ही, संभवत: बहुत से लोगों के लिए प्रेरणादायी भी बने कि निस्वार्थ प्रेम आपके जीवन को कितना अनूठा बना देता है।

सोनिया गांधी भारतीय राजनीति का हिस्सा तो बाद में बनीं, पहले तो वे भारत का हिस्सा बनीं। लेकिन क्या भारतीय समाज ने उन्हें खुले दिल से अपनाया। इसका जवाब ईमानदारी से भारतीय संस्कृति और समाज के ठेकेदारों को देना चाहिए। सोनिया गांधी के राजनैतिक विरोधियों ने तो हमेशा ही उनके चरित्र पर ओछी टिप्पणियां कीं, यह सिलसिला अब भी थमा नहीं है, जबकि उम्र के जिस पड़ाव पर वे हैं, वहां अपने घर की ही नहीं, दूसरी स्त्रियों को भी दादी-नानी कहकर सम्मान से पुकारा जाता है। बहरहाल, सोनिया गांधी की हिंदी बोलने की शैली का खूब मजाक बनाया गया, इसमें समाज की परपीड़क प्रवृत्ति को शायद संतुष्टि मिली हो। लेकिन मजाक बनाने वालों को कभी ठहर कर सोचना चाहिए कि आखिर इससे उन्हें कौन सी उपलब्धि हासिल हुई। क्या वसुधैव कुटुंबकम का उद्घोष करने वाले ऐसे होते हैं कि अपने परिवार में शामिल एक स्त्री का ही मजाक उड़ाएं। खैर, अपने अपमान को सोनिया गांधी ने खुद पर वैसे ही टिकने दिया, जैसे कमल की पंखुड़ियां खुद पर जल की बूंदों को टिकने देती है। क्षण भर में ही कमल की पत्तियां जल की बूंदों को साथ आई गंदगी के साथ उछालकर गिरा देती हैं। ऐसा ही व्यवहार सोनिया गांधी का रहा। उनके पास अपने अपमानों, प्रताड़नाओं की शिकायतें करने और रोने के सैकड़ों अवसर रहे। लेकिन उन्होंने कभी पीड़ित की तरह खुद को पेश नहीं किया। कभी इमोशनल कार्ड चलकर वोट बटोरने की कोशिश नहीं की। बल्कि जब, जहां मौका मिला, वे पीड़ितों के साथ, उनके पक्ष में खड़ी नजर आईं।

भाजपा और संघ के उनके राजनैतिक विरोधियों ने सोनिया गांधी पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। नेशनल हेराल्ड ऐसा ही मामला है, जिसमें उन्हें घंटों ईडी के सामने पूछताछ के लिए बिठाया गया। लेकिन सोनिया गांधी अविचलित रहीं। 2015 में उन्होंने कहा था कि वह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बहू हैं और किसी से डरती नहीं हैं। इसी तरह 1999 में वे पहली बार अमेठी से सांसद बनीं और तब उन्होंने कहा था कि 'मैं सुहागन यहीं बनी, मां यहीं बनी, मैं विधवा आपकी आंखों के सामने हुई और इस देश की सबसे महान पुत्री इंदिरा जी ने अपनी सांस मेरी बांहो में तोड़ी'।

2024 के चुनाव में उन्होंने अपनी सीट रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि राज्यसभा में जाने का फैसला लिया, उस समय उन्होंने रायबरेली के लोगों के लिए एक भावुकता भरी चिठ्ठी में लिखा था कि उनकी सास इंदिरा गांधी और पति राजीव गांधी के निधन के बाद रायबरेली के लोगों ने उन्हें संभाला और अपना आंचल फैलाया। उन्होंने विश्वास जताया कि रायबरेली के लोग भविष्य में भी उनके परिवार को वैसे ही संभालेंगे जैसे पहले संभालते आए हैं।

1968 में सोनिया गांधी और राजीव गांधी की शादी हुई थी और इन 58 सालों में उन्होंने लगातार गांधी परिवार की बहू और मां होने का दायित्व बखूबी निभाया। 2004 में जब यूपीए की जीत पर सारे सांसद चाह रहे थे कि सोनिया गांधी ही प्रधानमंत्री बनें, तब उन्होंने बड़ी दृढ़ता और शालीनता के साथ सबके आग्रह को अस्वीकार किया। उस समय देशबन्धु के प्रधान संपादक ललित सुरजन ने सोनिया गांधी के इस फैसले को बहू-मां का फैसला बताया था। अब वही बहू-मां अपनी इस जीवनयात्रा के कई पन्नों को सार्वजनिक तौर पर रखने जा रही हैं। प्रेम, त्याग और गरिमा इन्हीं के इर्द-गिर्द उनका निजी और राजनैतिक जीवन संचालित हुआ। अब उन्हीं जीवन गाथाओं को और विस्तार से पढ़ने का इंतजार रहेगा।


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