Top
Begin typing your search above and press return to search.

बदलते राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथ को अपनानी होगी नई रणनीति

26 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है।

बदलते राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथ को अपनानी होगी नई रणनीति
X
  • सोभनलाल दत्त गुप्ता

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बने इस नए राजनीतिक रिक्त स्थान ने वामपंथ को एक अवसर दिया है, लेकिन केवल टीएमसी के पतन से उसकी वापसी सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए उसे लोकतांत्रिक विपक्ष की विश्वसनीय भूमिका निभानी होगी, विकास का व्यावहारिक वैकल्पिक एजेंडा प्रस्तुत करना होगा।

26 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल में पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला है, जबकि लंबे समय तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच गई है। इस परिणाम को केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, भय और प्रशासनिक अव्यवस्था के खिलाफ मतदाताओं की तीखी प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है। चुनाव के बाद जिस तेजी से टीएमसी में टूट-फूट और राजनीतिक अस्थिरता दिखाई दी है, उसने पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को भी उजागर कर दिया है।

यह स्थिति भाजपा के लिए निश्चित रूप से राजनीतिक बढ़त लेकर आई है, लेकिन इससे सबसे बड़ा अवसर वामपंथ के सामने भी पैदा हुआ है। पिछले डेढ़ दशक में टीएमसी ने वामपंथ को अपना प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानते हुए उसे हाशिए पर धकेलने की लगातार कोशिश की। अब जब टीएमसी का प्रभाव तेजी से घटा है और उसके विभाजित समूह प्रभावी विपक्ष बनने की स्थिति में नहीं हैं, तब वामपंथ स्वयं को भाजपा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। हाल के दिनों में वाम दलों की रैलियां, बंद पड़े पार्टी कार्यालयों का फिर सक्रिय होना और सार्वजनिक जीवन में उनकी बढ़ती मौजूदगी इसी संभावना का संकेत देती है।

यह अवसर जितना महत्वपूर्ण है, चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। भाजपा को व्यापक जनादेश मिला है, इसलिए केवल वैचारिक विरोध या उसे प्रतिक्रियावादी अथवा फासीवादी कहकर राजनीतिक जमीन तैयार नहीं की जा सकती। लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाते हुए वामपंथ को सरकार के सामने विकास के ऐसे वैकल्पिक मॉडल रखने होंगे, जिनमें गरीबों, श्रमिकों, किसानों और वंचित वर्गों के हितों को प्राथमिकता मिले। साथ ही उसे यह भी मांग करनी चाहिए कि टीएमसी शासन के दौरान राजनीतिक दमन के शिकार सभी लोगों को न्याय मिले, चाहे उनकी राजनीतिक पहचान कुछ भी रही हो। इससे वामपंथ की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता अधिक विश्वसनीय रूप में सामने आएगी।

इसी के साथ सरकार की उन कार्रवाइयों का भी विरोध जरूरी होगा जो लोकतांत्रिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों या कमजोर वर्गों के हितों के विरुद्ध हों। यदि इतिहास लेखन को वैचारिक दृष्टि से बदला जाता है, धार्मिक आधार पर भेदभाव होता है, पुनर्वास के बिना अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाई की जाती है या सांप्रदायिक धु्रवीकरण को बढ़ावा मिलता है, तो वामपंथ को इन मुद्दों पर स्पष्ट और सुसंगत राजनीतिक हस्तक्षेप करना होगा।

वामपंथ के सामने सबसे कठिन चुनौती भाजपा की उस रणनीति को समझने की है, जिसके माध्यम से उसने बड़ी संख्या में हिंदू मतदाताओं का समर्थन हासिल किया। भाजपा ने सीमा पार से अवैध घुसपैठ, मुस्लिम आबादी में वृद्धि और टीएमसी की कथित तुष्टिकरण की राजनीति जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाकर हिंदू समाज के एक हिस्से में असुरक्षा की भावना पैदा की। चुनाव परिणाम बताते हैं कि भाजपा के पक्ष में पड़ा मत केवल टीएमसी विरोधी नहीं था, बल्कि उसमें हिंदुत्व आधारित समर्थन भी शामिल था। इन दोनों तत्वों को अलग-अलग समझना वामपंथ के लिए आसान नहीं होगा, लेकिन भविष्य की रणनीति के लिए यह आवश्यक है।

लंबे समय तक यह मान लिया गया था कि बंगाल का समाज स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्ष है और सांप्रदायिक राजनीति यहां गहरी जड़ें नहीं जमा सकती। लेकिन हाल की राजनीतिक घटनाओं ने इस धारणा को चुनौती दी है। बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के बावजूद समाज में धार्मिक अविश्वास और पूर्वाग्रह की अंतर्धाराएं मौजूद रही हैं। वाम शासन के लंबे दौर में भी ऐसी सांस्कृतिक पहल पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो सकी, जो समाज में धार्मिक सहअस्तित्व और साझी विरासत की समझ को मजबूत कर पाती।

भाजपा ने इसी खाली स्थान का लाभ उठाते हुए बंगाल के अनेक सांस्कृतिक प्रतीकों को अपनी वैचारिक व्याख्या के अनुरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। स्वामी विवेकानंद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, श्री अरविंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और यहां तक कि रवींद्रनाथ टैगोर जैसे व्यक्तित्वों के विचारों को उनके व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत किया गया। दूसरी ओर, वामपंथ ने भी लंबे समय तक इन विभूतियों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया और उन्हें मुख्यत: धार्मिक, साहित्यिक या सांस्कृतिक व्यक्तित्व मानकर राजनीतिक विमर्श से दूर रखा।

अब आवश्यकता इस बात की है कि वामपंथ इन ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के विचारों को उनकी संपूर्णता में समाज के सामने रखे। राजा राममोहन राय और विवेकानंद की धार्मिक समन्वय की भावना, श्री अरविंद का मानव एकता का विचार, बंकिमचंद्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक चिंतन, तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय सोच आज भी प्रासंगिक हैं। इनकी संतुलित और ऐतिहासिक व्याख्या के माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एकांगी दृष्टिकोण का लोकतांत्रिक जवाब दिया जा सकता है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बने इस नए राजनीतिक रिक्त स्थान ने वामपंथ को एक अवसर दिया है, लेकिन केवल टीएमसी के पतन से उसकी वापसी सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए उसे लोकतांत्रिक विपक्ष की विश्वसनीय भूमिका निभानी होगी, विकास का व्यावहारिक वैकल्पिक एजेंडा प्रस्तुत करना होगा और सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर भी नई दृष्टि के साथ सक्रिय हस्तक्षेप करना होगा। यदि वामपंथ इन चुनौतियों का उत्तर देने में सफल होता है, तभी वह राज्य की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता दोबारा स्थापित कर सकेगा।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it