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उलटा पड़ सकता है किताब को लेकर मुकदमे का दांव

सर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की कथित रूप से प्रकाशित/अप्रकाशित किताब सरकार के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन गई है, जिससे उबरने के लिए उसे पुलिसिया कार्रवाई का सहारा लेना पड़ा है।

उलटा पड़ सकता है किताब को लेकर मुकदमे का दांव
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राजेंद्र शर्मा

राहुल गांधी का आरोप है कि मोदी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई और सेनाध्यक्ष को अकेला छोड़ दिया। राहुल गांधी का कहना है कि किताब से चीन के आक्रामक रवैये पर प्रधानमंत्री की ठंडी प्रतिक्रिया की पोल खुल रही है इसीलिए लोकसभा में स्पीकर ने उन्हें नहीं बोलने दिया और पीएम भी इसी वजह से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देने नहीं आए।

सर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की कथित रूप से प्रकाशित/अप्रकाशित किताब सरकार के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन गई है, जिससे उबरने के लिए उसे पुलिसिया कार्रवाई का सहारा लेना पड़ा है। चूंकि उस किताब की सॉफ्ट कॉपी ऑनलाइन सर्कुलेट हो चुकी है और अभी भी हो रही है, लिहाजा दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है। दिल्ली में संगीन अपराधों पर नियंत्रण पाने में नाकाम दिल्ली पुलिस अब इस मामले की जांच-पड़ताल में अपनी ऊर्जा खपाएगी कि आखिर यह किताब पीडीएफ फार्मेट में कैसे ऑनलाइन लोगों तक पहुंच रही है। जनरल नरवणे की यह वही किताब है जिसके हवाले से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर लोकसभा में सरकार से सवाल पूछना चाहते थे लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई और उसने किताब के अस्तित्व को ही नकार दिया।

दरअसल जनरल नरवणे की किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' के प्रकाशित होने या नहीं होने को लेकर स्थिति अभी साफ नहीं है। सरकार का कहना है कि उसने अभी किताब को छापने की मंजूरी नहीं दी है। विवाद बढ़ने पर प्रकाशक पेंग्विन इंडिया की ओर से भी कहा गया कि उसने अभी किताब नहीं छापी है। मुकदमा दर्ज करने के बाद दिल्ली पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों और कुछ वेबसाइटों पर किताब की पूर्व प्रकाशित पीडीएफ कॉपी मिल रही है। किताब का आवरण भी ऑनलाइन मार्केटिंग एजेंसी अमेज़न के प्लेटफॉर्म पर दिखाया जा रहा है, जैसे कि किताब खरीदी-बिक्री के लिए उपलब्ध है। चूंकि किताब को प्रकाशित करने की जरूरी मंजूरी रक्षा मंत्रालय से नहीं मिली है, इसलिए किताब का लीक होना सुरक्षा नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।

इस मामले में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने एफआईआर दर्ज की जब पिछले दिनों संसद में भारी हंगामा हुआ। 'द कारवां' मैगज़ीन में प्रकाशित हुए किताब के कुछ अंशों का हवाला देते हुए राहुल गांधी 2 फरवरी को लोकसभा में कुछ बोलना चाहते थे। किताब के उन अंशों के मुताबिक जनरल नरवणे ने लिखा है कि 2020 में गलवान घाटी में चीन से टकराव के दौरान जब उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को जानकारी दी कि 'चीनी टैंक हमारी ओर आ रहे हैं', तो लंबे समय तक उन्हें किसी की भी ओर से कोई निर्देश नहीं मिला। बाद में रक्षा मंत्री के मार्फत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संदेश आया- 'जो उचित समझो, वैसा करो'।

राहुल गांधी का आरोप है कि मोदी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई और सेनाध्यक्ष को अकेला छोड़ दिया। राहुल गांधी का कहना है कि किताब से चीन के आक्रामक रवैये पर प्रधानमंत्री की ठंडी प्रतिक्रिया की पोल खुल रही है इसीलिए लोकसभा में स्पीकर ने उन्हें नहीं बोलने दिया और पीएम भी इसी वजह से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देने नहीं आए। बहरहाल किताब को लेकर दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने जांच शुरू कर दी है कि किताब पीडीएफ फार्मेट में सोशल मीडिया तक कैसे पहुंची। जांच की आंच राहुल गांधी तक भी पहुंचनी तय है क्योंकि उन्होंने संसद परिसर में किताब की प्रकाशित प्रति भी दिखाई है। कहने की आवश्यकता नहीं कि एफआईआर राहुल को निशाना बनाकर ही दर्ज की गई है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से देश में 'एफआईआर क्रांति' चल रही है। खास तौर से उत्तर-पश्चिमी भारत के राज्यों में पिछले कुछ वर्षों से मु_ी भर लोगों ने अपनी भावनाएं आहत होने के नाम पर तांडव मचा रखा है और सत्ता के प्रभावशाली पदों पर बैठे उनके आका अपने घटिया स्वार्थों के लिए उनकी आहत भावनाओं को शह देने का काम कर रहे हैं। इन लोगों की ये भावनाएं कभी अखबारों या सोशल मीडिया में आए किसी कार्टून, तस्वीर, लेख या विज्ञापन से, तो कभी किसी फिल्म, नाटक, कॉमेडी शो, मिमिक्री, किताब या किसी गीत से आहत हो जाती है। सरकार की आलोचना को देशद्रोह मानकर उससे भी कई लोगों की भावनाएं आहत होने के मामले सामने आते रहते हैं।

आहत होने वाली ऐसी तमाम भावनाओं को सहलाने के लिए पुलिस भी बिल्कुल तैयार बैठी रहती है। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए चोरी, डकैती, लूट, जानलेवा हमला, ठगी, धोखाधड़ी, बच्चे की गुमशुदगी, वाहन चोरी या वाहन दुर्घटना, यहां तक कि गंभीर से गंभीर यौन अपराध की एफआईआर लिखवाना भी आसान काम नहीं है। इसके लिए पुलिस की मिन्नतें करना पड़ती हैं या किसी प्रभावशाली नेता से सिफारिश करानी पड़ती है; और कभी-कभी पुलिस की जेब भी गरम करना पड़ती है। अगर पीड़ित व्यक्ति की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो उसे पुलिस से अपमानित भी होना पड़ता है। किसी तरह से अगर एफआईआर दर्ज हो भी जाए तो इस बात की गारंटी नहीं कि आवश्यक कार्रवाई पुलिस मुस्तैदी और ईमानदारी से करेगी।

... लेकिन भावना आहत होने की शिकायत मिलते ही पुलिस तत्परता से एफआरआई दर्ज कर लेती है। थाना प्रभारी भी बगैर किसी जांच-पड़ताल के मीडिया को बुलाकर टीवी कैमरों के सामने आरोपित व्यक्ति को प्रथमदृष्टया दोषी भी करार दे देता है। ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने में भी पुलिस बिल्कुल लापरवाही नहीं दिखाती है। ऐसे सभी मामले जब कोर्ट में पेश होते हैं तो वहां भी पुलिस की तर्ज पर ही काम होता है। निचली अदालतों के जज अपने पास वर्षों से लंबित मुकदमों की कार्रवाई आगे बढ़ाने के बजाय आहत भावनाओं के मामलों की सुनवाई प्राथमिकता से करते हैं और आरोपी को सीधे जेल भेज देते हैं।

बहरहाल अभी तो मामला पूर्व सेनाध्यक्ष की किताब का है जो सीधे राहुल गांधी से जुड़ा है, सो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस उन्हें कैसे छोड़ सकती है! वैसे भी राहुल गांधी इस तरह के मुकदमे झेलने के आदी हो चुके हैं। एफआईआर क्रांति के चलते देश का शायद ही कोई राज्य होगा जहां उनके खिलाफ़ मुकदमा दर्ज न हुआ हो। इसलिए दिल्ली पुलिस ने जो नया मुकदमा दर्ज किया है वह कायदे से उनके लिए ज्यादा चिंता की बात नहीं होनी चाहिए। हालांकि सरकार को उम्मीद है कि वह इस मुकदमे के जरिए दबाव बढ़ाएगी। वह दबाव राहुल के साथ-साथ कुछ दूसरे लोगों पर भी हो सकता है। दिल्ली पुलिस अन्य तथ्यों के अलावा खास तौर से इस बात की जांच करेगी कि यह किताब राहुल गांधी को कहां से मिली।

यह सवाल तो है कि जब सरकार कह रही है कि उसने किताब छापने की मंजूरी नहीं दी है और प्रकाशन कंपनी भी कह रही है कि किताब छपी नहीं है, तो फिर राहुल गांधी कहां से उसकी प्रति लेकर संसद में पहुंचे थे? उन्होंने कहा था कि वे यह किताब लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देंगे। हालांकि उन्होंने यह भी दावा किया था कि प्रधानमंत्री सदन में नहीं आएंगे। दिलचस्प बात यह है कि सचमुच चार फरवरी को प्रधानमंत्री लोकसभा में नहीं पहुंचे, जहां शाम को पांच बजे उन्हें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई आधी-अधूरी चर्चा का जवाब देना था। स्पीकर ने कहा कि उन्होंने कुछ अप्रत्याशित घटित होने की आशंका के चलते मोदी को सदन में आने से रोक दिया था।

बहरहाल, दिल्ली पुलिस जब इस बात की जांच करेगी कि राहुल गांधी को किताब कहां से मिली, तो उसके साथ कई बातों की जांच होगी। जैसे कि, किताब कैसे छपी, किसने छापी और कहां छापी? राहुल गांधी को किताब कहां से मिली? कहा जा रहा है कि किताब विदेश में छपी है। तो सवाल होगा कि विदेश से किसने किताब लाकर उनको दी? प्रकाशक से भी पूछताछ होगी। हालांकि प्रकाशक ने कह दिया है कि उसने न तो किताब छापी है और न उसका कोई अंश लीक किया है। सो, इस बात की भी जांच होगी कि जिस पत्रिका ने किताब का अंश छापा उसे वह कहां से मिला था?

इसकी जांच की आंच जनरल नरवणे तक भी पहुंचेगी क्योंकि अगर प्रकाशक ने नहीं लीक की है, तो दूसरा स्रोत लेखक ही हो सकता है। सरकार के संसदीय प्रबंधक उम्मीद कर रहे हैं कि इससे वे विपक्ष पर दबाव बना पाएंगे। हालांकि उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं है कि इसका विपरीत भी हो सकता है। वे भूल रहे हैं कि यह विवाद जितना बढ़ेगा, सरकार को उतना ही नुकसान होगा। लोगों के मन में सवाल उठेगा कि आखिर सरकार क्यों एक पूर्व सेनाध्यक्ष द्वारा लिखी किताब की बातें बाहर आने से रोकना चाहती है? सेना का मामला भावनात्मक जुड़ाव वाला होता है। लोगों को यकीन हो गया है कि पूर्व सेना प्रमुख कुछ ऐसा बताना चाहते हैं, जिसे सरकार छिपाना चाहती है; तो उसका उलटा असर होगा। इसलिए किताब को लेकर मुकदमे का दांव सरकार को उलटा भी पड़ सकता है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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