चिंता पैदा करती है 'न्याय की भाषा'
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत शर्मा द्वारा भरी अदालत में कुछ समूहों को 'परजीवी' और 'तिलचट्टे' के रूप में वर्गीकृत करना दुर्भाग्यपूर्ण, चिंताजनक और परेशान करने वाला है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत शर्मा द्वारा भरी अदालत में कुछ समूहों को 'परजीवी' और 'तिलचट्टे' के रूप में वर्गीकृत करना दुर्भाग्यपूर्ण, चिंताजनक और परेशान करने वाला है। ये टिप्पणियां पिछले सप्ताह एक वकील द्वारा 'वरिष्ठ अधिवक्ता' का पदनाम प्राप्त करने के प्रयास से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान की गईं। इसके बाद मचे बवाल के बाद सीजेआई ने तुरंत स्पष्टीकरण देते हुए कहा- 'मैंने विशेष रूप से उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने धोखेबाजी और फर्जी डिग्रियों की सहायता से बार (कानूनी पेशा) जैसे व्यवसायों में प्रवेश किया है। ऐसे ही लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य प्रतिष्ठित व्यवसायों में भी घुसपैठ कर चुके हैं इसलिए वे परजीवियों के समान हैं... यह कहना पूरी तरह निराधार है कि मैंने हमारे देश के युवाओं की आलोचना की।' हालांकि हमें सीजेआई के इस बात को स्वीकार करना होगा कि जैसा बताया गया था, उन्होंने भारत के युवाओं की आलोचना नहीं की और उनकी मूल टिप्पणी एक संकीर्ण वर्ग को लक्षित करती थी जिनके बारे में उन्हें लगता था कि इन लोगों के पास फर्जी शैक्षणिक योग्यताएं हैं लेकिन मौजूदा समस्या की जड़ व्यापक रूप से की गई टिप्पणियां और विशेष रूप से शब्दों का चयन है।
भाषा विचारों को प्रकट करती है और अक्सर आगे आने वाली घटनाओं की नींव रखती है। जेन बौद्ध भिक्षु थिच न्हाट हान ने कहा था कि प्रत्येक संदेश पर उसे भेजने वाले व्यक्ति की छाप होती है। उन्होंने लिखा कि हम उस बादल की तरह हैं जो वर्षा उत्पन्न करता है इसलिए बादल फटने के बाद भी वर्षा का प्रभाव स्थायी रहता है क्योंकि यह रिसकर धरती में समा जाती है। इसी तरह महात्मा गांधी ने यह मानते हुए अहिंसा की बात 'विचार, शब्द और कर्म' में की, कि ये तीनों तत्व परस्पर जुड़े हुए हैं और आपस में मिलकर संपूर्ण मानवीय अनुभव का निर्माण करते हैं। यहां तक कि गांधी ने किसी दुष्ट व्यक्ति के विरुद्ध भी इस प्रकार की अपमानजनक भाषा का प्रयोग न करने के प्रति आगाह किया था।
इस परिप्रेक्ष्य और कई अन्य मानकों के आधार पर देखा जाए तो मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियां और उसके बाद जारी किया गया स्पष्टीकरण स्पष्ट रूप से अपर्याप्त हैं। भले ही मुख्य न्यायाधीश का निश्चित रूप से ऐसा कोई इरादा न रहा हो, लेकिन शब्दों में निहित हिंसा, भाषा का अमानवीय स्वरूप और समाज के कुछ वर्गों को अलग-थलग करने का इसका सुस्थापित इतिहास, इसे देश के सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण से एक विशेष रूप से अवांछनीय प्रस्तुति बनाता है। इसके अलावा भले ही ये टिप्पणियां आकस्मिक रूप से की गई हों लेकिन इनका प्रभाव आगे चलकर अज्ञात और जटिल तरीकों से देश की संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
यह पहली बार नहीं है कि मुख्य न्यायाधीश ने विवादित मामलों में टिप्पणियां की हैं। जनवरी में, घरेलू कामगार संघों द्वारा न्यूनतम मजदूरी कानून के दायरे में शामिल किए जाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की थी कि औद्योगिक विकास को रोकने के लिए ट्रेड यूनियनवाद जिम्मेदार है, श्रमिक संघ सुधारों का विरोध करते हैं और निवेश को हतोत्साहित करते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा था- 'देश में कितनी औद्योगिक इकाइयां ट्रेड यूनियनों की वजह से बंद हो गई हैं?' इसी तरह पर्यावरणविदों पर हालिया टिप्पणियों ने चिंता पैदा की है। रिपोर्टों में मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की बेंच के हवाले से कहा गया है: 'हमें एक भी ऐसी परियोजना दिखाएं जहां इन पर्यावरणविदों ने कहा हो कि हम इसका स्वागत करते हैं' और 'आप पर्यावरण के नाम पर सब कुछ रोकना चाहते हैं... बुनियादी ढांचे के बिना देश का विकास कैसे हो सकता है?' ये टिप्पणियां राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के उस आदेश के खिलाफ अपील में आईं जिसमें गुजरात में पीपावाव बंदरगाह परियोजना के विस्तार को दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती दी गई थी। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को एनजीटी के समक्ष पुनर्विचार अपील दायर करने की अनुमति दी और याचिका का निपटारा कर दिया।
नागरिकों को जरूरत से ज़्यादा श्रेणियों में बांटने और उन्हें अलग-अलग लेबल लगाकर समूहबद्ध करने की प्रवृत्ति खतरनाक है। यह 'वे बनाम हम' के विभाजन को जन्म देती है जो हमारे समय के प्रमुख विचारों के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ों को दबा देती है, जटिल मुद्दों को कुछ ज्यादा ही सरल बना देती है और अंतत: न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती। सभी पर्यावरणविदों, सभी ट्रेड यूनियनों या युवाओं को सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप से वर्गीकृत करना एक पूर्वाग्रह को दर्शाता है जिससे मामले की विशिष्टताओं और वर्तमान स्थिति की जटिलताओं को समझना मुश्किल हो जाता है। 1950 के दशक की प्रसिद्ध पुस्तक 'द नेचर ऑफ प्रेजुडिस' में गॉर्डन ऑलपोर्ट ने लिखा था कि मनुष्य में पूर्वाग्रह की प्रवृत्ति होती है। यह 'सामान्यीकरण, अवधारणाओं और श्रेणियों को बनाने की सामान्य और स्वाभाविक प्रवृत्ति' में निहित है जिनकी सामग्री अनुभव की दुनिया का सरलीकरण प्रस्तुत करती है। ऑलपोर्ट ने लिखा कि निश्चित रूप से कुछ तर्कसंगत श्रेणियां हैं जो अनुभव के करीब हैं लेकिन उतनी ही अतार्किक श्रेणियां भी हैं जो 'पूरी तरह से सुनी-सुनाई बातों, भावनात्मक अनुमानों और कल्पनाओं से बनी हैं।'
इतिहास गवाह है कि जब इस तरह की अतार्किक कल्पनाओं को उड़ान भरने की अनुमति दी जाती है तो भयानक परिणाम सामने आते हैं। नाज़ियों ने होलोकॉस्ट के दौरान यहूदियों को परजीवी और इससे भी बदतर नामों से पुकारा; रवांडा में 1994 के हुतू नरसंहार में मारे गए तुत्सी लोगों को 'इन्येन्ज़ी' (स्थानीय किन्यारवांडा भाषा में तिलचट्टे) कहा गया; वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकियों ने वियतनामियों को 'डिंक्स, गूक्स, स्लोप्स, स्लैंट्स' कहा और हाल ही में इज़राइलियों ने फ़िलिस्तीन में अपने नरसंहार को आगे बढ़ाने के लिए फिलिस्तीनियों के खिलाफ अमानवीय भाषा का इस्तेमाल किया है।
मुख्य न्यायाधीश के स्पष्टीकरण में फर्जी डिग्रियों वाले उन लोगों का जिक्र है जो 'मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य प्रतिष्ठित पेशों में घुसपैठ कर चुके हैं'। इससे संकेत मिलता है कि पकड़े जाने से बचने और कुछ नुकसान पहुंचाने के लिए गुप्त गतिविधियां चल रही हैं। ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब कांग्रेस पार्टी के शब्दों में, देश 'हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे बड़े हमले' का सामना कर रहा है। यह देश की 2026 की विश्व स्वतंत्रता सूचकांक रैंकिंग में और गिरावट से भी परिलक्षित होता है जो 151वें स्थान से गिरकर 157वें स्थान पर आ गई है।
न्याय की प्रक्रिया में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह किस प्रकार बाधा डालते हैं, यह दर्शाने के लिए '12 एंग्री मेन' नामक उत्कृष्ट फिल्म और नाटक को याद करना उपयोगी हो सकता है जिसमें एक कमरे में 12 जूरी सदस्य होते हैं। फिल्म में जूरी सदस्य संख्या 8 की भूमिका निभाने वाले हेनरी फोंडा कहते हैं- 'इस तरह के मामले में व्यक्तिगत पूर्वाग्रह को दूर रखना हमेशा मुश्किल होता है; और जहां भी यह सामने आता है, पूर्वाग्रह हमेशा सत्य को धुंधला कर देता है।'
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)


